Category Archives: Social Media

My Recent Write-Ups Which Appeared In Blogosphere As Well As In Mainstream Media!

It’s quite a strenuous affair to be sandwiched between demands of social media and mainstream media. Both the mediums in our times have attained new heights. However, it’s a great accomplishment if a writer/journalist is getting sufficient space in both the mediums at the same time. Fortunately, my writings managed to appear in mainstream publications without much canvassing on my part. I never had to heed to confrontational attitude to convince the editors from mainstream media to understand the relevance of writings which had first appeared in virtual world. 

That’s because before I moved to virtual world I had already found space as Writer/Contributor/Freelancer/Letter Columnist in all leading national and International publications which include Time, Newsweek, The Hindu, The Telegraph, The Statesman, The Times of India, The Hindustan Times, India Today, Outlook, The Week, Harmony, The Sunday Indian, Hardnews, Critique, Tehelka, Northern India Patrika and Soham, to name a few. Today when I have primarily got confined to virtual space, the write-ups still appear in Northern India Patrika- a leading newspaper published from Allahabad. It’s one of the oldest newspapers published in India, being sister publication of now defunct Amrit Bazar Patrika (Kolkata) which had started in 1868.

Recent write-ups which appeared in mainstream media:

1.  Vishal Bhardwaj: A Genuine Music Composer In Times When Indian Music Directors Have Become Copycats

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 08, 2014.

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 08, 2013.

2. Unleashing Magic Of “Triple S” Of Indian Cinema: Sahir Ludhianvi, Shakeel Badayuni and Shailendra!

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 22, 2013

Appeared in Media Musings Column of Northern India Patrika On December 22, 2013

3. Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

Appeared in Northern India Patrika's Editorial Column On January 07, 2014.

Appeared in Northern India Patrika’s Editorial Column On January 07, 2014.

4. Swami Vivekananda: A Spiritual Powerhouse Who Really Understood The Potential Of Youths!

Appeared in Northern India Patrika's Editorial Column On January 18, 2014.

Appeared in Northern India Patrika’s Editorial Column On January 18, 2014.

5.  News Item Related With Speech I Gave In Allahabad On January 12, 2014, At Jagat Taran Girls Degree College.

News Related With Speech I Delivered As A Guest Speaker In An Event Organized At Jagat Taran Girls Degree College To Celebrate The Birth Anniversary Of Swami Vivekananda. It's The Same Venue  Where Couple Of Days Back President Of India Pranab Mukherjee Addressed The Gathering Of Students!

News Related With Speech I Delivered As A Guest Speaker In An Event Organized At Jagat Taran Girls Degree College To Celebrate The Birth Anniversary Of Swami Vivekananda. It’s The Same Venue Where Couple Of Days Back President Of India Pranab Mukherjee Addressed The Gathering Of Students! This News Item Appeared In Northern India Patrika On January 13, 2014.

5. The Times Of India’s News Coverage

The Times Of India News Item Related With Speech I Delivered.

The Times Of India News Item Related With Speech I Delivered. This News Item Appeared On January 21,2014

6. That’s Myself Giving Speech At Jagat Taran Girls Degree College On January 12, 2014.

Giving Speech In Allahabad Is A Great Feeling. After All, It's A Place Associated With Great Thinkers, Intellectuals And Writers!  I Gave The Speech At Jagat Taran Girls Degree College On January12, 2014. That's The Same Venue Where President Of India Pranab Mukherjee Also Delivered The Speech Some Days Back.

Giving Speech In Allahabad Is A Great Feeling. After All, It’s A Place Associated With Great Thinkers, Intellectuals And Writers! I Gave The Speech At Jagat Taran Girls Degree College On January12, 2014. That’s The Same Venue Where President Of India Pranab Mukherjee Also Delivered A  Speech Some Days Back.

 

 

 

कांची के शंकराचार्य की रिहाई इस बात को दर्शाती है कि वर्तमान समय में दुष्प्रचार ज्यादा ताकतवर है बजाय सत्य के!

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.


इस नए युग के इंडिया यानि “भारत” के अगर हाल के घटनाओ को देखे तो ये आसानी से समझ आ जाएगा कि धर्मनिरपेक्ष सरकारो ने सबसे ज्यादा जुल्म ढाया है हिन्दू संतो पर. ये धर्मनिरपेक्ष सरकारे मुग़लकाल के बाद्शाहो और ब्रिटिश काल के शासको से भी ज्यादा क्रूर रही है हिन्दू धर्मं से जुड़े प्रतीकों को ध्वस्त करने और इनसे जुड़े लोगो को अपमानित करने के मामले में. हिन्दू संतो को निराकरण ही प्रताड़ित किया जा रहा है और इन्हे यौन अपराधो से लेकर देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधो में बेवजह घसीटा जा रहा है. बिकी हुई मीडिया इन प्रकरणो का एक पक्ष 
दिखाती  है अपने देश में और देश के बाहर विदेशी अखबारो में. ये आपको अक्सर देखने को मिलेगा कि इस प्रकार के खबरो में ज्यादातर झूठ होता है या अर्धसत्य का सहारा लेकर एक भ्रामक कहानी गाढ़ी जाती है. कोई भी मुख्यधारा का समाचार पत्र तस्वीर के दोनों पहलू दिखाने में दिलचस्पी नहीं रखता.

एक सबसे बड़ी वजह ये है कि ज्यादातर  भारतीय मीडिया समूह का कण्ट्रोल विदेशी ताकतो के हाथो में है. सबके विदेशी हित कही ना कही शामिल है तब हम किस तरह से इनसे ये आशा रखे कि ये सच बोलेंगे? ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जो साध्वी प्रज्ञा के गिरफ्तारी को तो खूब जोर शोर से दिखाते है लेकिन साध्वी के साथ जेल के अंदर हुए अमानवीय कृत्यो को जो बंदियो के अधिकारो का सरासर उल्लंघन था उसको दिखाने या बताने से साफ़ मुँह मोड़ गए. ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जिन्होंने देवयानी प्रकरण में देवयानी का साथ इस तरह से दिया जैसी कि उसने भारत के नाम विदेशो में ऊँचा किया हो, जैसे उसने कोई जुर्म ही नहीं किया हो. वो इसलिए से क्योकि इसका सरकार से सीधा सरोकार है और सिस्टम इसके पक्ष में है लेकिन हर वो आदमी जिसने भी सरकार ये सिस्टम के विपक्ष में कुछ कहा उसे इस तरह की  सरकारे या सिस्टम सुनियोजित तरीको से अपराधी घोषित कर देता है.

ये कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के युग मे सत्य से ज्यादा असरदार किसी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से फैलायी गयी मनगढंत बाते है. समाचार पत्रो का काम होता है सत्य को सामने लाना सही रिपोर्टिंग के जरिये लेकिन हो इसका ठीक उल्टा रहा है: मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बन गयी है झूठ और भ्रम को विस्तार देने हेतु. इसका केवल इतना काम रहा गया है कि हर गलत ताकतो को जो सत्ता में है उनको बचाना, उनको बल देना. एक बाजारू औरत की तरह अपनी निष्ठा को हर बार बदलते रहना मीडिया का एकमात्र धर्मं बन गया है. साधारण शब्दो में ये सत्ता पे आसीन शासको की भाषा बोलता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी की गिरफ्तारी के प्रकरण के रौशनी में इस प्रकरण को देखे जिन्हे २००४ में बेहद शर्मनाक तरीके से शंकर रमण के हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. शंकर रमण कांची के एक मंदिर में मैनेजेर थें. उस वक्त के तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए और ये जताने के लिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं होता इनकी गिरफतारी सुनिश्चित की. कांची के शंकराचार्य के ऊपर “आपराधिक षड्यंत्र, अदालत को गुमराह करने गलत सूचना के जरिये, धन का आदान प्रदान आपराधिक गतिविधि को क्रियांवित करने के लिये” आदि आरोप लगाये गए.

इस एक हज़ार साल से भी ऊपर अति प्राचीन ब्राह्मणो के अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र के मुख्य संचालक को इस तरह अपमानजनक तरीके से एक दुर्दांत अपराधी के भांति गिरफ्तार करना और फिर मुख्यधारा के समाचार पत्रो के द्वारा अनर्गल बयानो के आधार पर उनको दोषी करार कर देना अपने आप में मीडिया की सच्चाई बयान कर देता है. ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

 ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

उस वक्त के प्रमुख समाचार पत्रो ने ये दर्शाया कि पुलिस इस तरह से गिरफ्तार करने का साहस बिना पुख्ता सबूतो के कर ही नहीं सकती. उस वक्त अभियोजन पक्ष के वकील इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि शंकराचार्य को दोषी साबित करने के लिए उनके पास पर्याप्त पुख्ता सबूत थें. विवेचना अधिकारी प्रेम कुमार का ये बयान प्रमुखता से छपा कि हमारे पास ठोस साक्ष्य है स्वामी जयेन्द्र सरस्वती के खिलाफ और ये कि शंकर रमण और इनके बीच करीब चार सालो से आपसी मनमुटाव था जिसको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत इकठ्ठा किये जा रहे है.

खैर ईश्वर के यहाँ देर भले हो पर अंधेर नहीं है. सत्य की अंततः विजय हुई जब पांडिचेरी की विशेष अदालत ने सत्ताइस नवंबर २०१३ को उन सभी लोगो को जो शंकर रमण हत्याकांड में आरोपी बनाये गए थें उनको बाइज्जत बरी कर दिया. इसी के साथ नौ साल से हो रहे ड्रामे का पटाक्षेप हो गया. उन पर लगाये गए सभी आरोपो से उन्हें मुक्त कर दिया गया. जितने भी प्रमुख गवाह थें उन्होंने अभियोजन पक्ष के वर्णन को समर्थन देने से इंकार कर दिया। अभियोजन पक्ष के विरोध में करीब ८० से अधिक गवाहो ने अपने बयान दर्ज कराये।

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे. हिन्दुओ के आस्था और प्रतीक के साथ जो बेहूदा मजाक हुआ उसके निशान कई वर्षो तक संवेदनशील मनो को कटोचते रहेंगे. लेकिन हिन्दू ब्राह्मण के उदार मन को देखिये कि इतना होने के बाद भी किसी के प्रति कोई कटुता नहीं. इस परिपेक्ष्य में शंकराचार्य के वक्तव्य को देखिये जो उन्होंने बरी होने के बाद दिया: ” धर्म की विजय हुई. सत्य की जीत हुई. सब कुछ खत्म हो जाने के बाद अंत में केवल यही बात मायने रखती है. मुझे मेरे गुरु ने सब कुछ सहन करने को कहा है. इसलिए ये कहना उचित नहीं होगा कि हालात मेरे लिए असहनीय थें. हा कुछ दिक्कते जरूर आयी वो भी उस वजह सें कि हम लोग नयी तरह की परिस्थितयो का सामना कर रहे थें. हमने पूर्व में देखा है कि किस तरह आक्रमणकारियों ने हिन्दू मंदिरो पर हमले कर उनको विध्वंस किया। आज जब हम मंदिरो पर पड़े उन हमलो की निशानियाँ देखते है तो  हमे वे आक्रमणकारी और उनकी क्रूरता याद आती है. आज जो कुछ भी मठ के साथ हुआ ( मेरे पर जो  आरोप लगे) वे बहुतो की नज़र में पूर्व में किये गए आक्रमणकारियों के द्वारा किये गए विध्वंस सरीखे ही है.”

ये बहुत दुःख की बात है कि जैसे ही किसी हिन्दू संत पर कोई आरोप लगते है सारे मुख्यधारा के मीडिया समूह उस संत को बदनाम करने की कवायद में जुट जाते है पूरी ताकत से इस बात से बिल्कुल बेपरवाह होकर कि मीडिया का मुख्य काम किसी भी घटना की सही-२ रिपोर्टिंग करनी होती है ना कि न्यायिक ट्रायल करना। उससे भी बड़ी बिडम्बना ये है कि अगर संत पर लगे आरोप निराधार और झूठे पाये जाते है तो जो अखबार या फिर न्यूज़ चैनल आरोप लगने के वक्त पूरे जोर शोर से संत को दोषी ठहरा रहे थे वे ही अखबार और न्यूज़ चैनल पूरी तरह से कन्नी काट लेते है. संत को बेगुनाह साबित करने वाली खबर कब आती है और कब चली जाती है ये पता भी नहीं चलता है. यही वजह है कि कांची के शंकराचार्य की बेगुनाही और बाइज्ज़त बरी होना किसी भी शीर्ष अखबार के सुर्खियो में नहीं आया. शायद सेकुलर मीडिया ने ये सोच कर इस खबर को प्रमुखता से नहीं बताया क्योकि हिन्दुओ से जुडी कोई भली खबर सेक्युलर भावना के विपरीत होती है!

मेनस्ट्रीम मीडिया को प्रोपगेंडा ज्यादा रास आता है बजाय सत्य के. सेक्युलर ताकतो ने और इनके द्वारा संचालित मीडिया समूहो ने कांची के शंकराचार्य के गिरफ्तारी के वक्त ये बहुत जोरदार तरीके से ये दर्शाया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होता. तो क्या यही सेक्युलर ताकते जो कानून की बात करती है शाही ईमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी को गिरफ्तार करने की हिम्मत रखते है जिन पर कई धाराओ में देश के विभिन्न थानो में एफ आई आर दर्ज है? क्या यही सेक्युलर ताकते उन क्रिस्चियन मिशनरीज को बेनकाब करने की ताकत रखती है जो देश के पिछड़े और दूर दराज के इलाको में लोगो को बहला फुसला कर उनका धर्म परिवर्तन कर रही है? लेकिन ये सबको पता है कि सेक्युलर मीडिया ऐसा कभी नहीं करेगा. ऐसा इसलिए कि इन सेक्युलर लोगो की निगाह में कानून के लम्बे हाथ केवल हिन्दू संतो के गर्दन तक पहुंचती है. ये हिन्दू संतो को केवल बदनाम करने तक ही सीमित है और हिन्दू आस्था को खंडित और विकृत करने भर के लिए है. ये दुष्प्रचार के समर्थक है सत्य के नहीं.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.


References:

IBN Live

The Hindu

The Hindu

Wiki


Pics Credit:

Pic One

Pic two

Pic Three

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा!

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?


खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर गयी आज के समाज के बारे में, पत्रकारिता के स्तर के बारे में और कानून के उपयोग और दुरुपयोग के सन्दर्भ में. खुर्शीद अनवर एक प्रसिद्ध सामजिक कार्यकर्ता थें जो नई दिल्ली में इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी नाम की संस्था चलाते थें. इसके अलावा वे जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्र भी थें. खुर्शीद अनवर ने पिछले साल १८ दिसम्बर २०१३ को आत्महत्या कर ली थी जब उनपे एक मणिपुरी औरत ने  अपने साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया था. ये खबर कुछ एक समाचार चैनलों पर प्रमुखता से दिखायी गयी और इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साईटस पर अंतहीन बहस छिड़ गयी. पहले तो खुर्शीद इस आरोप से हिल गए और इसके बाद मीडिया चैनलो द्वारा कीचड़ उछालने के बाद सदमे से ग्रस्त खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली. बाद में उनके पास से बरामद सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख था कि मणिपुरी लड़की के साथ उन्होंने बलात्कार नहीं किया था बल्कि आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे.

इस घटना ने मुझे श्रीनिवास सिरास के आत्महत्या की याद दिला दी जो प्रोफेसर थे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में. इस प्रकरण में न्यूज़ चैनलो नें इस प्रोफेसर के निजता के साथ खिलवाड़ किया था और उनकी गोपनीयता को सरेआम उजागर करके उनके समलैंगिक सम्बन्धो को विकृत स्वरूप दे दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए प्रोफेसर को थोड़ी राहत प्रदान की थी पर मीडिया चैनलो द्वारा की गयी गुस्ताखी उन पर भारी पड़ गयी और उन्होंने आत्महत्या कर लिया. कोर्ट इस तरह के मीडिया ट्रायल पर अक्सर चेतावनी देती रही है पूर्व में कि न्यूज़ चैनल जब केस ट्रायल स्टेज में हो तो किसी भी निष्कर्ष पर अपनी तरफ से पहुचने की हड़बड़ी ना दिखाए और न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश ना करे लेकिन बड़े कॉर्पोरेट संस्थानो द्वारा संचालित ये न्यूज़ चैनल न्यायालय के द्वारा इन पारित आदेश को सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा समझते है और उन्हें किसी प्रकरण में निहित संवेदनशीलता से कुछ नहीं लेना देना होता सिवाय इसके कि उसका माखौल किस तरह उड़ाया जाए. ये सही है मीडिया ट्रायल एक जटिल मुद्दा है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के चलते किसी के इज्जत और उसके आत्मसम्मान के साथ जो खिलवाड़ होता है और इससे जो अपूर्णीय क्षति होती है उसकी भरपाई असंभव होती है. मीडिया  किसी दोषी व्यक्ति के अधिकारो के हमेशा अतिक्रमण करती आयी है और समय आ गया है कि सही तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग जो गलत इरादो से की गय़ी हो सिर्फ न्यूज़ चैनल के टी आर पी या फिर अखबार की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से की गयी हो दोनों में एक स्पष्ट रेखा का निर्धारण हो.

“सनसनीखेज रिपोर्टिंग तो हमेशा होगी क्योकि सनसनीखेज घटनाये भारत में हमेशा रहती है. सुप्रीम कोर्ट इस पर लगाम लगाने में असमर्थ है. ये सही है कि रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए पर इसका ये मतलब निकालना कि ये मीडिया के द्वारा ट्रायल है एक निन्दात्मक अभिव्यक्ति है. कोर्ट या किसी के पास कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है जो ये निर्धारित कर सके कि मीडिया ट्रायल क्या होता है.” (सीनियर अधिवक्ता राजीव धवन, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया). खैर इस बात से इंकार करना असम्भव है कि मीडिया के द्वारा किसी भी दोषी व्यक्ति के अधिकारो का हनन और किसी के भी निजता के साथ खिलवाड़ करने के कृत्य का अपने तरफ से दूषित स्पष्टीकरण कोई भी मतलब नहीं रखता। ये सिर्फ एक व्यर्थ का  प्रलाप होता है, बेवजह अपने को सही ठहराना होता है. उसकी स्पष्टीकरण से उस अपूर्णीय क्षति की भरपाई असम्भव है जो इस वजह से होती है. इन दोनों प्रकरणो में दो व्यक्ति ने अपनी जान ले ली इस वजह से और अब हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि सच्चाई क्या थी. क्या ये दो जाने वापस मिल जाएंगी? क्या खोया सम्मान वापस मिलेगा? शायद कभी नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी शायद सच के ज्यादा करीब है जब ये कहते है कि “पत्रकारिता में शायद निष्कर्षो पर पहुचने की हड़बड़ी है. ये उसी दिन किसी को मुजरिम ठहरा देता है जिस दिन किसी पे आरोप लगते है, इसके पहले कि कोर्ट किसी बात का निर्धारण करे. ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है. कैसे मीडिया इतनी जल्दीबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुच सकती है और किसी को इतनी हड़बड़ी में दोषी करार दे सकती है? मीडिया को इस बात का इन्तजार करना चाहिए कि कम से कम प्राथमिक रिपोर्ट तो दर्ज हो, कम से कम जांच तो पूरी हो जाए” (डी एन ए न्यूज़ रिपोर्ट) ये बिलकुल चकित कर देने वाली बात है कि मीडिया कभी भी इस तरह के सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के दौरान अपूर्णीय क्षति और इनके अंजामो के बारे में कभी भी ईमानदारी से आकलन नहीं करती. गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल अधिकतर एकतरफा, भ्रामक और तथ्यो के साथ खिलवाड़ होता है जिसमे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं की जाती कि कम से कम तथ्यो के असलियत का तो निर्धारण कर लिया जाए सूक्ष्मता से.

इस पूरे प्रकरण में दो बहुत गम्भीर पहलू शामिल है. पहला तो ये कि ये समाज के इस विकृत बदलाव को दर्शाता है कि समाज में हड़बड़ी में निष्कर्षो पर पहुचने की लत लग गयी है अधकचरे दिमाग के साथ. इसे चाहे वो प्रशंसा  हो या फिर आलोचना दोनों को बिना किसी आधार के आत्मसात करने की आदत सी हो गयी है. ना आलोचना का स्तर विकसित हो पाया और ना ही प्रशंसा के आयाम निर्धारित हो पाये. आलोचना अगर हो रही है तो तो वो भी तब जब कि कोई भी तथ्यात्मक या तार्किक आधार आलोचना के पक्ष में मौजूद नहीं है. दूसरा पक्ष ये है कि जिन कानूनो को स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है वे अब निर्दोष लोगो को प्रताड़ित करने का अस्त्र बन गए है. ये कितने तकलीफ की बात है कि जहा किसी स्त्री के सेक्सुअल हरस्मेंट का मामला उभरता है वही पे समाज का एकपक्षीय भेदभाव ग्रस्त दिमाग उभर कर सामने आ जाता है और मीडिया हमेशा की तरह दोषी के ऊपर हर तरह का लांछन जड़ देता है और इसके पहले वो अपने बेगुनाही को साबित करे वो मुजरिम साबित करार कर दिया जाता है. ये सर्वविदित है कि जो नए कानून की परिभाषा है सेक्सुअल हरस्मेंट को रोकने कि उसके प्रावधान इस तरह के है कि आप तकरीबन मुजरिम ही है और इस बात को गौण कर दिया गया है कि आप के पास भी बचाव के सही रास्ते होने चाहिए. और सबसे घातक ये है कि एकतरफा मीडिया ट्रायल शुरू हो जाने के बाद जो उसके पास अपने को बचाने के जो रास्ते होते है वे भी बंद हो जाते है क्योकि मीडिया आपके विपक्ष में माहौल खड़ा कर देता है हर तरफ.

“भारत में और अन्य देशो में जहा इस तरह के कानून पास हुए है औरतो के साथ होने वाले अपराधो को रोकने के लिए उसमे बर्डेन ऑफ़ प्रूफ को सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया है. अब दोषी के ऊपर ये जिम्मा है कि वे अपनी निर्दोषता साबित करे. ये परिवर्तन निहित रूप से बहुत गलत है पर शायद ये इसलिए किया गया है कि ताकि इन प्रकार के अपराधो में स्त्री के पास सामान स्तर के अवसर हो अपने साथ हुए अन्याय के भरपाई के लिए. लेकिन जो अब नए कानून बने है सेक्सुअल हरस्मेंट रोकने के लिए उसमे ये बर्डन ऑफ़ प्रूफ इस सख्त स्वरूप में है कि जहा दोषी (पुरुष) के पास बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते है. अगर एक बार आप पर आरोप लगे तो इस बात की सम्भावना कम है कि आप अपने को निर्दोष साबित कर सके या आपको बेहद मशक्कत के बाद ही कोई रास्ता दिखायी पड़े. ये शायद नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है.” (वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

संक्षेप में समाज और मीडिया दोनों का स्तर रसातल में चला गया है क्योकि ये दोनों भावनाओ के प्रवाह में बहने के आदी हो गए है और इन दोनों को तथ्यो और तार्किक सोच से कुछ लेना देना नहीं रह गया है. दोनों को इस विकृत खेल में रस आने लगा है जहा किसी निर्दोष के भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है, उसके आत्मसम्मान के जब टुकड़े टुकड़े किये जाते है. लेकिन खेद कि बात ये है कि न्याय परंपरा/व्यवस्था भी इसी विकृत रस का शिकार हो गयी है, इन्ही घातक प्रवित्तियों का शिकार सा हो गयी है, खासकर उन मामलो में जहा स्त्रियों से जुड़े अपराधो के निष्पक्ष अवलोकन की बात आती है. खैर सब की जिम्मेदारी बनती है कि  भावनात्मक प्रवाह में बह कर लिए गए निर्णयो के बजाय सोच समझकर तार्किक रूप से लिए गए निर्णयो को प्राथमिकता दी जाए. ये बहुत आवश्यक हो गया है समाज के बिखराव को रोकने के लिए, एक मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए.

पाठक इस लेख का अंग्रेजी संस्करण यहाँ पढ़े:

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

References:

Activist Khurshid Anwar’s suicide: Was media trial responsible?

AMU’s ‘gay’ prof commits suicide

Guilty If Charged

Dainik Bhasker

 

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दो

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

 

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

Can Deaths Caused By Vain Media Trials Be Reversed?

 (Also Appeared in Northern India Patrika On January 07, 2014)

The suicide by a prominent social activist Khursid Anwar, executive director of NGO Institute for Social Democracy and also a JNU scholar, has given rise to some pretty disturbing questions. Khurshid Anwar allegedly committed suicide in the aftermath of rape allegation by a Manipuri lady. This news got flashed on several news channels, followed by intense discussion on several social media networking websites including Facebook. Unable to bear this unwarranted media trial, this well known social activist committed suicide by jumping from his third floor residence in Vasant Kunj, New Delhi, on December 18, 2013. As per suicide note found at his home it was not a rape but consensual sex.

This tragic incident reminds me of suicide committed by Sriniwas Siras, who happened to be a professor at Aligarh Muslim University. In this particular case, news channels were found guilty of invading his privacy by making public his homosexual affair in blown out of proportion way. The professor was granted relief by the Allahabad High Court, but he was not able to cope up with harassment in the form of bizarre media coverage. That made him to end his life. Of late, courts have regularly come up with strict reminders for media channels not to indulge in media trials when the case is in its trial phase. However, influential media houses have always adopted care-a-damn, leading to mockery of the sensitivity involved in any issue under trial. It’s true that need to control media trial remains a complicated issue but it’s an undisputed fact that there is no dearth of cases, wherein sensational media trial caused irreparable damage to one’s reputation. The media has always taken for granted “rights of the accused” and it’s high time to make clear demarcation between accurate reporting and reporting done with malicious intent to increase the sale or ensure high TRP ratings.

“Sensational reporting will take place because sensational incidents keep happening in India. The Supreme Court will not be able to stop it. Yes, reporting must be accurate. But to say it amounted to trial by media is only a pejorative expression. Neither the court nor any one has provided parameters to define what constitutes trial by media.” (Senior Advocate Rajeev Dhavan in The Times of India) However, media’s pervert justification of its breach of privacy and rights of accused would never be enough to clear the huge mess caused by its unwanted intervention. Two lives of reputed individuals came to meet untimely end because of media trial. Can it bring them back to life? Can it restore the loss of reputation?

 In fact, senior journalist Saeed Naqvi  has framed a perfect perspective regarding media trail: ” There is a tendency in journalism – it convicts a person on the day allegation is leveled against him, even before the court convicts him. That is sad. How can media reach a conclusion so quickly and start showing one as an accused? At least, it should wait for lodging of an FIR, completion of investigation” (DNA News Report) It’s really amazing that media always never takes into account serious repercussions involved in unfair trial. Is “mental trauma and public humiliation” in the wake of seriously flawed  “media trial” is thing of lesser concern? It’s so evident in media trials that reporting is misleading and one-sided with scant respect for cross-checking of the facts.

 This whole issue involves two other serious concerns. The first one brings to the fore love of the society to reach at conclusions in one go with a prejudiced mindset. It loves to criticize or, for that matter, endorse any issue even if there are no concrete material evidence to support its beliefs. The other aspect involves abuse of laws meant to protect sexual harassment of women. It’s simply not an issue pertaining to rights of men that laws meant to protect women have lead to harassment of innocent men. It’s so pathetic that moment an issue  involving sexual harassment of women gets highlighted, the media enters in caricature of the accused, portraying him guilty. Worse, if you analyze the laws meant to prevent sexual harassment of women, it’s evident that men are virtually assumed to be guilty. Tragically, the attempt of the accused to prove himself innocent becomes further bleak in wake of such pervert media trials.

 “The disconcerting answer is that it will not matter. In India, and several other countries where laws have been passed to punish crimes against women, the burden of proof has been consciously reversed: it is the accused who has to prove his innocence. This reversal is bad in principle, but probably necessary to create a level playing field for women in cases pertaining to sex crimes. But the new rape law has carried the reversal to a point where, if implemented as drafted, it will defeat the very purpose of justice . For once a man is accused, it leaves him with no way whatever of proving his innocence.” (Senior Journalist Prem Shankar Jha in The Times Of India)
 
In nutshell, both society and media have lost the ability to be governed by reason and logic. Both of them have given way to pervert pleasure of playing havoc with the dignity and reputation of individuals. However, it’s baffling that even legal jurisprudence appears to have adopted same line of action, more so in cases involving sexual harassment of women. It’s time for everybody to upheld logical thinking over thinking governed by rash emotions. That’s essential to stop the fragmentation of society, to create a value-oriented society.

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

Khurshid Anwar: Another Victim Of Media Trial!!

 
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Beginning Of A New Era: Men’s Rights News Reports Which Featured In Newspapers Published From Lucknow And Allahabad

Author Of This Post At Fifth Men's Rights National Conference Held In Nagpur, Maharashtra,  From August 16- August 18, 2013.

Author Of This Post At Fifth Men’s Rights National Conference Held In Nagpur, Maharashtra, From August 16- August 18, 2013.


The Fifth Men’s Rights  National Conference, held in Nagpur in the second week of August 2013,  got tremendous coverage in mainstream media in Allahabad and Lucknow. It’s matter of self-pride since newspapers in this region are still not that familiar with concept of men’s rights. It’s a new phenomenon for them. In fact, issues pertaining to rights of men are still taken in lighter vein. Even the ones who are supposed to be more informed than ordinary class of people like reporters, editors and lawyers remain nonchalant when they come to hear about exploitation of men.

Fortunately, the extensive coverage of news related with Men’s Rights National Conference held in Nagpur marks a beginning of new era in this part of India. I am sure in coming days talks related with rights of men will not evoke irresponsible remarks. Have a look at the various news reports which appeared in Allahabad region’s prominent newspapers. It proved to be a herculean task to make them find meaning in talks related with men’s issues.I am happy that I was able to shatter the inertness prevalent in the minds of people who are supposed to be the custodians of human rights and made them understand the seriousness attached with cause of men.  Many thanks to those reporters, editors and lawyers who responded positively as I spoke about the rights of men. Hope the cause of men’s attain new heights in coming days

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1. The Times Of India

The Times Of India, September 01, 2013

The Times Of India, September 01, 2013

Link Related To This News Report: The Times Of India, Allahabad Edition

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2. Northern India Patrika 

Northern India Patrika: Oldest English Newspaper In Allahabad Region Gave Enough Coverage To Rights Of Men...

Northern India Patrika: Oldest English Newspaper In Allahabad Region Gave Enough Coverage To Rights Of Men…

Link To This News Report:  Northern India Patrika

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3.  Daily News Activist Published From Lucknow

Daily News Activist Published This News Report On September 26, 2013.

Daily News Activist Published This News Report On September 26, 2013.

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4. Jansandesh Times Published From Allahabad, Varanasi, Gorakhpur And Lucknow. 

This News Report  Published In  Jansandesh Times Created Huge Sensation In Various Important Circles.

This News Report Published In Jansandesh Times Created Huge Sensation In Various Important Circles.

Links Related To This News Report Published On October 03, 2013:  Visit The Archives Section Of Jandsandesh Times

And yes, many thanks to Amlesh Vikram Singh,  Correspondent associated with Jansandesh Times,  who made sincere efforts to get this news report published.  

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An Important News Item Related With Rights Of Men:

Deciphering The Significance Of Men’s Rights On Indowaves

Deciphering The  Significance Of Men’s Rights Movement Published In Northern India Patrika 

Deciphering The Significance Of Men’s Rights Movement On Website 498.in 

It's Not Bad To Aware Of One's Worth And Contributions..Many thanks to The Lord Almighty...

It’s Not Bad To Be Aware Of One’s Worth And Contributions..Many thanks to The Lord Almighty…

 


हिंदी पत्रकारिता की धज्जिया उड़ाते आजकल के सबसे ज्यादा बिकने वाले हिंदी के समाचार पत्र!!

 हिंदी के पत्रकार और सम्पादक ना सीखना चाहते है और ना ही सीखने की तमीज रखते है.

हिंदी के पत्रकार और सम्पादक ना सीखना चाहते है और ना ही सीखने की तमीज रखते है.



हिंदी पत्रकारिता की धज्जिया उड़ाने वाले कोई और नहीं हिंदी के तथाकथित पत्रकार खुद है. ये पत्रकारिता नहीं मठाधीशी करते है. कम से कम उत्तर भारत के सबसे ज्यादा बिकने वाले एक प्रसिद्ध हिंदी दैनिक के कार्यालय में जाने पर तो यही अनुभव हुआ. अखबार देखिये तो लगता है खबर के बीच विज्ञापन नहीं बल्कि विज्ञापन के बीच खबर छप रही है. उसके बाद भाषा का स्तर देखिये वही हिंग्लिश या फिर सतही हिंदी का प्रदर्शन. और करेला जैसे नीम चढ़ा वैसी ही बकवास खबरे. मसलन बराक ओबामा को भी अपनी पत्नी से डर लगता है! इस खबर इस समाचार पत्र ने फोटो सहित प्रमुखता से छापा पर अगर इस अखबार के लोगो को पुरुष उत्पीडन जैसी  गंभीर बात को जगह देने की समझ नहीं। इसकी सारगर्भिता को समझाना उनके लिए उतना ही कठिन हो जाता है जैसे किसी बिना पढ़े लिखे आदमी को आइंस्टीन के सूत्र समझाना। बिना पढ़े लिखे आदमी को भी बात समझाई जा सकती है अगर वो कम से कम सुनने को तैयार हो मगर वो ऐसी बात सुनकर मरकही गाय की तरह दुलत्ती मारने लगे तब? हिंदी पत्रकारिता आजकल ऐसे ही लोग कर रहे है. 

हिंदी पत्रकारिता का जब इस देश में उदय हुआ था तो उसने इस देश के आज़ादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उस युग के सभी प्रमुख क्रांतिकारियों के अपने समाचार पत्र थें. लेकिन आज के परिदृश्य में ये पूंजीपतियों के हाथो में सबसे बड़ा अस्त्र है अपने प्रोडक्ट को बेचने का, राजनैतिक रूप से अपने विरोधियो को चित्त करने का. सम्पादकीय आजकल प्रभावित होकर लिखे जा रहे है. हिंदी समाचार पत्र में छपने वाले समाचार खबरों के निष्पक्ष आकलन के बजाय अंग्रेजी अखबारों के खबरों का सतही अनुवाद भर है. मै जिस  उत्तर भारत के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले प्रसिद्ध समाचार पत्र की बात कर रहा हूँ वो अपने को सांस्कृतिक विचारो के प्रभाव को दिशा देने वाला समझता है लेकिन अपने अखबार के मिनी संस्करण के पन्नो पर विकृत हिंदी में (माने कि हिंग्लिश) में सबसे कूड़ा खबरे और वो भी “ऑय कैंडी” के सहारे बेचता है. “आय कैंडी” आखिर भारी विरोध के वजह से गायब तो हुआ पर जाते जाते बाज़ार में टिके रहने की समझ दे गया! 

बाज़ार में बने रहने का गुर इस्तेमाल करना गलत नहीं है लेकिन इसका ये मतलब ये नहीं है कि आप खबरों के सही विश्लेषण करने की कला को तिलांजलि दे दें. लेकिन हकीकत यही है. हिंदी के पत्रकार और सम्पादक ना सीखना चाहते है और ना ही सीखने की तमीज रखते है. कुएं के मेढंक बने रहना इन्हें सुहाता है. अगर यकीन ना हो तो किसी हिंदी के अखबार के दफ्तर में जाके देख लें. खासकर उत्तर भारत के सबसे ज्यादा बिकने वाले हिंदी के अखबार के दफ्तर में तो जरूर जाए. वहा आपको खुले दिमागों के बजाय दंभ से चूर बंद दिमाग आपको मिलेंगे। क्या ये दिमाग सच को उभारेंगे? समाज को बदलेंगे? 

 ये पूंजीपतियों के हाथो में सबसे बड़ा अस्त्र है अपने प्रोडक्ट को बेचने का, राजनैतिक रूप से अपने विरोधियो को चित्त करने का. सम्पादकीय आजकल प्रभावित होकर लिखे जा रहे है.

ये पूंजीपतियों के हाथो में सबसे बड़ा अस्त्र है अपने प्रोडक्ट को बेचने का, राजनैतिक रूप से अपने विरोधियो को चित्त करने का. सम्पादकीय आजकल प्रभावित होकर लिखे जा रहे है.

पिक्स क्रेडिट: 

तस्वीर 1  

तस्वीर 2 

Facebook: Has It Turned Into Playground Of Devils?

When will human beings learn to use any forum for constructive designs?

When will human beings learn to use any forum for constructive designs?

“How I wish that somewhere there existed an island for those who are wise and of good will.” ( Albert Einstein) That’s presumably an ideal state of affairs- an utopia whose actual manifestation on earthly existence is simply not possible. Let’s understand why it’s pretty difficult to create a world, which lies above human flaws. That I would explain via the mess which prevails on Facebook. It’s a pretty awesome networking site, but marred by fake profiles and anti-social activities. The point I wish to convey is that any good forum/institution either in real world or virtual world, sooner or later, gets corrupted by wrong elements. Instead of improving the face of such institutions/ forums, the negative elements infect it with their misimpressions, and thereby considerably reduce the credibility of the forum.

Before dissecting the activities taking place on Facebook, it would not be a bad idea to analyze what’s happening in our real world. The moment a good soul appears on the stage of world, the lesser souls become hyperactive to malign his/her image, and that too for no other reason other than that this person depicts some uncommon traits. They shout at him, just the way other doggies bark at some stranger dogie, who somehow happens to stray into their domain.  And so we never find these stereotyped minds promoting such a different soul unless he/she happens to serve their vested interests. They try their level best to tame the instincts of such person and make them on par with their own so that they can be used to fulfill their narrow concerns. And when they are not able to dictate terms,  the rumour mill, like always, starts churning out all sorts of absurd details make the life hellish for such a person.

It’s not that these people running the vilification campaign are devoid of brains. They have enough intelligence, owning big degrees and enjoying good position in life, but they happen to be  devil’s advocate. High profile degrees also make them owner of big ego and complex mind. That’s why they not only make a simple issue attain a pretty complicated shape, by coining vain theories and complex terms for a simple phenomenon. The very same situation could have been easily handled by framing the perspective in simple terms but presence of worldly wise practical souls, usually from corridors of known institutions, just complicate it that proper solution becomes an impossible affair. The negative minds destroy all good relationships, forums and institutions, the way a computer virus comes to hang the system. They never offer perfect solutions, but only ways and means to corrupt the face of all simple phenomenon. Now let’s see how wrong souls have corrupted a beautiful site like Facebook. Many people harbour the wrong impression that online world is different than real world. I am afraid it’s not  true. The virtual world is simply the reflection of your real attributes which you come to unleash in real world.

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                                        *The Glory Of Facebook Status!* 

One of my friends fell ill. He is a sensible person but then even sensible person commit silly mistakes. He informed everyone about his illness, breaking this news as Facebook status. And that’s okay but its aftermath is amazing, saddening and disappointing. Besides flow of get well messages, there appeared a large section of friends who came to “like” the status! Is that a sensible application of mind? If that’s the way they are behaving on Facebook, imagine how would they be responding in real lives. I am sure had the same status been of a lady “likes” and get well messages would have flooded the thread of that status in huge number. The impression that I wish to convey is that by unleashing such false sentiments, vain application of mind, aren’t the Facebook users lowering the status of Facebook? 

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  *Is there any merit on debating over certain issue on Facebook?*

Being someone hailing from the world of legal professional, the importance of offering rational and logical rebuttals as arguments is crystal clear to me. However, I see no reason as to why any sensible person should waste time in offering appropriate arguments on Facebook amid disinterested users. Majority of the Facebook users are pretty casual as they get engaged in important conversations. As far as I am concerned, I do take all conversations on Facebook, related with minor or major issues, quite seriously as long as its required to make the issue attain perfect clarity and then give way to other important concerns. Having said that, the waywardness and chaos which prevails on Facebook during conversation on sensitive issues usually keeps sensible minds tight-lipped. 

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                 *The Existence Of Strange Groups On Facebook*

Many good for nothing souls have formed groups having dubious aims. The moderator appointed in these groups operates in strange way. It adds and removes person, without apprising the concerned person of the reason for such gestures. The moderator promotes himself as an open-minded person but it generally has hidden designs and so it edit any views which is contrary to his designs. There is also some hidden hand, operating in the group, whose only task is to give wrong colouring to all your well meaning impressions. Most of the groups remain active for some time but soon you would find them defunct, a barren land.

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            *Dangerous Love On Facebook Via Photoshop* 

True love is above the differences caused by caste, creed and colour. It also defies differences caused by age and nationality. That’s how real love operates in real world by rising above such vain concerns. Using the same passion and virtues, even the wrong souls also claim to be in real love in real world. However, it’s faking at its best, wherein superficial sentiments, false vows get exchanged. If that’s how true and lesser lover exists in real world, the situation is not much different in virtual world. Love in its real and wrong shades/forms also exists in online world too. On Facebook an aged person, using a fake profile, having the picture of a celebrity as profile picture, can easily dupe a teenager girl and strike an unholy alliance. In the same fashion, a worn out over-aged women can play the same trick. One of the recent surveys showed that number of fake profiles on Facebook is quite large.  So it’s pretty difficult to ascertain the genuineness of an individual on Facebook against such a scenario, wherein Photoshop allows a fat lady to have hourglass shape of Julia Roberts quite easily! 

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Well, these various aspects prevailing on Facebook ascertain that just like the real world, the virtual world is also comprised of good and evil. The precautions we take in real world to separate good from bad are also to be taken in virtual world. However, that’s not something what I wish to communicate. The real motive as I talk about making distinction between good and bad is to highlight the pain suffered by the real soul as we come to ensure that difference. The agony and humiliation faced by good souls in the process to ensure that bad gets truly marginalized always takes it toll on sensitive souls. The struggle between good and wrong people shall never stop in this world but it is not high time that good souls be prevented from being sacrificial lambs in this deadly drama? Have good souls appeared in this world merely to act as sacrificial lambs for attainment of insignificant causes powered by distorted minds? It’s time to think about it quite seriously so that good souls come to serve better cause rather than turning into sacrificial lambs.    

For Mine Eyes  Real Julia Roberts Is More Genuine Than Beauties Impersonating As Julia Roberts  Via Photoshop :-)

For Mine Eyes Real Julia Roberts Is More Genuine Than Beauties Impersonating As Julia Roberts Via Photoshop :-)

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Pic One 

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फेसबुक वाला इश्क: इसको बौड़मपने का माध्यम ना बनाये !!

फेसबुक: क्यों नहीं हम किसी माध्यम का सही  इस्तेमाल करते कभी?

फेसबुक: क्यों नहीं हम किसी माध्यम का सही इस्तेमाल करते कभी?

अलबर्ट आइंस्टाईन की तमन्ना थी कि एक ऐसा जहां हम बनाएं जहाँ मानवीय दुर्गुण न पहुच सके। जो इसके प्रभाव से परे हो। लेकिन शायद ये बहुत ही आदर्श स्थिति है जिसकी परिकल्पना तो ठीक है इसको असल जिंदगी में रूपांतरित करना शायद संभव नहीं। इसको फेसबुक पर व्याप्त नौटंकी से समझे।  इस  पहले ये देखे कि इस दुनिया में देखिये क्या हो रहा है। कोई भी अच्छा आदमी हो। उसके बारे में इतने सारे भ्रम फैला देंगे कि और तो और वो आदमी खुद भी भ्रमित हो जाएगा कि उसका असल चरित्र क्या है। ये दुनिया के लोग प्रमोट तो नहीं करेंगे पर हा सामूहिक रूप से मिलकर उसके इज्ज़त का चीरहरण जरूर कर देंगे। और ऐसे ही लोग किसी भी संस्था, फोरम को गिराने के पीछे भी होते। और ऐसा नहीं कि ये बिना दिमाग वाले लोग है। इनके पास बहुत दिमाग है लेकिन जैसे कि होता है कि भारी भरकम ओहदे और ऊंची डिग्री वालो के पास सिर्फ अहम होता है सो ये ना जिंदगी जी पाते है और ना ही किसी भी फ़ोरम की आदर्श स्थिति को ये बरकरार रहने देते है। मटियामेट करना ही इनको आता है, सब अच्छे खूबसूरत चेहरों और गतिविधियों को इनको सिर्फ विकृत करना ही आता है। हर साधारण चीज़ को ये जटिल बना देते है जिसको सुलझाने की तमीज इनके पास नहीं होती। आइये फेसबुक के माध्यम से समझे। लोग मानते है कि ऑनलाइन जगत सच्ची दुनिया से अलग है। बिलकुल अलग नहीं है। बल्कि ये आपके ही गुणों अवगुणों का आइना है। आप माने ये ना माने ये अलग बात है।

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                                  *फेसबुक स्टेटस की महिमा* 

मेरे एक मित्र है। थोडा बीमार पड़ गए है। पता नहीं किन ग्रह नक्षत्रो के चलते इसका उल्लेख फेसबुक पर कर दिया। कर दिया सो कर दिया पर देखता हूँ कि कई बुडबक उस स्टेटस को लाइक करके निकल गए है। इसी बेहायी के चलते फेसबुक का स्टेटस लोग गिरा रहे है। जब दिमाग का इतना वाहियात इस्तेमाल फेसबुक पर कर रहे है तो मन डरता है ये सोचकर कि असल जिंदगी में ये कितने सुलझे हुएँ होंगे। किसी भी अच्छे प्लेटफार्म/ फोरम का ऐसे लोग ही स्तर गिराने के पीछे होते है।ये तो अच्छा हुआ एक पुरुष मित्र बीमार पड़ा। स्त्री जात का स्टेटस होता तो और नौटंकी होती। लाइक्स कही अधिक होती। ठीक होने की शुभकामनाएं भी अधिक होती।

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                               *फेसबुक पर तर्कों का औचित्य* 

कानून का विद्यार्थी रहा हूँ इसलिए आर्ग्यूमेंट्स का महत्त्व औरो से बेहतर समझता हूँ लेकिन होता ये है कि जहा भेड़िया धसान सरीखा माहौल हो, कोई बुडबक कुछ भी बक सकता है वहा क्या तर्क करे और क्यों करे। खैर कुल मिला के बात सिर्फ है कि अपनी बात कहने का हौसला रखे कैसा भी माहौल हो जब तक आत्मा गंवारा करे खासकर तब जब बोलना ख़ामोशी से बेहतर हो। और उसके बाद ख़ामोशी से कट ले। हम तो यही करते है। आप का मै कह नहीं सकता।

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                                            *कैसे कैसे ग्रुप्स*  

ना जाने किन वाहियात लोगो ने कैसे कैसे ग्रुप बना रखे है और बिना अनुमति लोगो को जोड़ते घटातें रहते है। इसमें एक सनकी मॉडरेटर रहता है। जिसको ना जोड़ने की तमीज है और ना ही ग्रुप की गतिविधियों को मानिटर करने की  तमीज। कहने को ये खुले दिमाग का होता है पर ये किसी के आधीन होकर एक ख़ास तरीकें ही की बात को प्रमोट करता है। तो जब कोई गतिविधि ना हो। और एक ख़ास दिमाग-गलत दिमाग- जब आपकी सारी बातो का अनर्थ कर डाले तो ग्रुप्स का औचित्य क्या है?

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                                 *फेसबुक वाला इश्क़ एंड फोटोशाप* 

इश्क़ जात पाँत  का भेद नहीं देखता। उम्र का फासला भी नहीं देखता। असल जिन्दगी में इश्क के इस फ़लसफ़े का सही रूप भी देखने को मिलता है और गलत रूप भी देखने को मिलता है। फेसबुक का यही हाल है। यहाँ भी यही फ़लसफा विद्यमान है अपने सही गलत प्रकार में। सो तो फेसबुक पर भी लोग असली नकली चेहरो के साथ विद्यमान है। किस चेहरे के पीछे कौन है ये आप ठीक ठीक नहीं बता सकते है। कोई थुलथुल महिला भी जूलिया रोबर्ट्स सा फिगर पा सकती है फोटोशाप के जरिये और फील गुड कर सकती है और करा सकती है। एक अधेड़ उम्र का गया गुजरा व्यक्ति भी शाहरुख खान की तस्वीर लगा कर कुछ भी एहसास करा सकता है। जाहिर है कम उम्र की लौंडिया ही पटायेगा बकवास बात करने के लिए। अब इस तरह तो वो गहरा इश्क वाला लव करने से रहा।

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शायद असल जिंदगी की तरह ये आभासी जगत भी अच्छे बुरे लोगो से भरा है।  जो सावधानी आप असल जिंदगी में बरतते है वो ऑनलाइन में भी बरतते है। लेकिन मुद्दा ये नहीं है। सावधानी बरतने वाला। तकलीफ ये है कि इस नौटंकी मतलब अच्छे बुरे के फर्क में भेद करने के उपक्रम के चलते अच्छे लोगो का जो प्रताड़ना झेलनी पड़ती है उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। अच्छे बुरे के बीच  संघर्ष तो हमेशा ही चलता आया है और चलता रहेगा। ये कब रुका है। लेकिन अच्छे लोगो की बलि देने का सिलसिला इस संघर्ष के चलते कभी रुकेगा कि नहीं। क्या अच्छे लोग सिर्फ बेवजह बलि चढ़ने के लिए दुनिया में आते है? बताएं कोई?

 

फील गुड करने के लिए ये असल जूलिया रोबर्ट्स की असल सौम्यता ही काफी है। ये फोटोशाप वाली माया की क्या जरूरत है?

फील गुड करने के लिए ये असल जूलिया रोबर्ट्स की असल सौम्यता ही काफी है। ये फोटोशाप वाली माया की क्या जरूरत है?

 

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Online Love Vs Real Life Love! A Contrast.

Online Love: For real person it is as real as real life love!

Online Love: For real person it is as real as real life love!

The point is that the wrong person shall always deceive whether it’s online world or real world. It cannot be that in online world you remain honest and in real life you are almost different- unethical and immoral. So love, whether in online world or real world, is real all the time. It has same effect in virtual world which it has in real world. Those who see the effects as different have either not loved at all or are the ones who have been bitterly deceived in online world. That’s why they have lost faith in online lovers!!

As far as I am concerned all I see whether the love is true, deep and real or not. Whether it happens in online world or virtual world, there is hardly any noticeable difference. A person with wrong set of values shall deceive both in real world and in virtual world. On the contrary, a real person shall remain real both in virtual and real world in matters pertaining to love or anything else. In lighter vein love is, at least, disease free in online world! It’s safer.   

Bottom line: For True person both online and real world are equally beneficial. For wrong person both the worlds-online/real- are playground of devil.

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Hindi Version:

होशवालो को खबर क्या ….…!!!! मनई चालू पटरी पर बैलगाड़ी/स्कूटर/फटफटिया लेकर जान की बाज़ी लगाते हुए निकल जाते है. सो इहाँ तो प्रेम की बात हो रही है. वैसे जो गहरा प्रेम करते है उन्हें पता है कि प्रेम कैसे भी हो प्रेम ही रहता है. क्या असल जीवन में प्रेम धोखा धडी, आग लगावन तत्वों से नहीं भरा रहता. सो ऑनलाइन प्रेम के लिए ही क्यों मूल्य अलग है? जो धोखा असल जीवन में देगा वो ऑनलाइन में भी देगा. और जो रस ऑनलाइन में है वो ही वास्तविक जीवन में भी है. कोई फर्क नहीं एक सही आदमी के लिए. सतही आदमी/स्त्री के लिए ऑनलाइन जगत भी घटिया है और वास्तविक जीवन भी घटिया है। कम से ऑनलाइन प्रेम हेल्थी है रोग मुक्त भी है.

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A song from the period when love songs were not all about hot bed scenes, hot kissing. A song from movie of Mahesh Bhatt, whose films not only have off-beat themes, but even the song picturization is so aesthetic and appealing.

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Pic One

Delhi Gang Rape: Important Aspects Totally Overlooked By The Paid Mainstream Media

Rape Is A Social Issue!

Rape Is A Social Issue!


India’s braveheart girl must have begun a new journey in some other mysterious world. Back in India, the land of her birth and also death in such a tragic fashion, after being gang-raped and sexually assaulted in most barbaric manner, leading to severe multiorgan failure, the protests have begun to lose momentum. That’s a typical course of action for any movement in India. It sooner or later, becomes part of fading memory and, after some years, many find it hard to recollect what exactly happened! Even in this case, eyewash gesture of setting another committee had been done, ignoring  Supreme Court’s previous directions, which talked about safety of  citizens, especially the women. In fact, constitutional provisions and Law Commission recommendations, if implemented with total sincerity, are suffice to take care of safety concerns of women, always left vulnerable to such cruel turns of destiny. One Lakshmi, researcher related with women’s issue, made a fitting remark in The Hindu: “She didn’t die of multiorgan failure, but it was the multiorgan failure of this society and the state which killed her.” 

For instance, in this case, how was this bus with illegal tinted glass windows, allowed to move freely on the streets, and that too, when it passed through many police check-posts? What were the cops doing? Even in UP, cars with illegal glass windows, usually having, illegal blue/red beacon lights are in fashion. So why is the Traffic Superintendent, a mute spectator in this regard,  when the policemen from the same department are so damn conscious about ensuring regular hafta (a form of bribery) at every crossing from the truck drivers? That’s because no body is interested in annoying the political goons, occupying the high posts as Ministers! The government and High Court wish that common citizens should act as guardians of democracy but have they ensured safety of  the whistle-blowers? Before this case,Assistant Sub Inspector Ravinderpal Singh, was shot dead allegedly by Akali Dal leader local secretary (Urban) Ranjit Singh Rana and three of his associates on December 05, 2012, in Amritsar, Punjab, who had resisted the harassment of his daughter. In the same state, a gang-rape victim committed suicide on December 26, 2012, nearly a month after alleged gang-rape, which took place on November 13, 2012, being pressed upon both by police and the society to compromise. In this alleged gang-rape, a woman, identified as Shinderpal Kaur,  played a key role. The point that’s being suggested is that popular anger which has got focused on “hang the rapists” or, for that matter, demand for more stringent punishment  is absolutely misplaced. That’s not going to yield any better result.

The paid media, having struck unholy nexus, with the government, is constantly projecting  rhetoric or misplaced popular sentiments. In United States and in other nations, despite having tough provisions, the rape incidents are quite frequent, even as the better implementation of strict provisions have ensured  lesser victimization rate. The point worth considering is that they have given to wider considerations side-by-side stricter laws, which includes concerns related with widespread denial of women as potential sexual aggressors, female-female rape, distinction between forcible and non-forcible rapes, rape of males by females and etc. The researches there also included the impact of drugs, especially alcohol. Even though timing of entering into contrasts with United States is not okay, especially at this point of time, I am but compelled to do since angry people have given way to demand for tougher laws, forgetting that stricter laws can only work wonders when we have sound and sympathetic government machinery in action. Is that the case in India, wherein all sorts of legal provisions have got limited to law books alone?  

Against this backdrop, before I deal specifically with the Delhi gang-rape, I wish to clearly state that it would be fatal to confine the urge for changes to “safety of women alone” or, for that matter, demand for stricter provisions to prevent rape. This line of action is being deliberately highlighted under pressure from feminist wings, tactically supported by Congress government, which hopes to regain power with female voters and minority card in next Parliamentary actions. The mainstream media is also singing the same tune, because in wake of fear to lose government’s aid,  it has no other option but to toe the stance taken by government. This whole drama which captured the nation’s attention from December 16, 2012, until death of gang-rape victim was a well-orchestrated show managed perfectly well by the paid media and Congress government. There are enough circumstantial evidences which give proof of it that the real story is something else and it’s more horrible than what we all came to witness in these past turbulent fifteen days. I will deal with this aspect later in this article but first let’s not ignore these pertinent points. 

Had the protests been genuine and intentions of government honest, the demand would have not been focused on safety of women or rights of women alone, it would have been focused on better safety concerns for every citizen, irrespective of gender. The most horrible thing is that this time politics was done in name of this unfortunate girl, victim of brutal gang-rape, who is no longer in this world. This protest was given vulgar and aggressive shape by the vested interests with immediate and  long-term gains in mind. The news of  nuisance created by agents of Congress, belonging to NSUI wing, at India gate have now surfaced, and this confirms the suspicion that real story is something else. Three main reasons could be deviating attention of general public from its recent failures on all fronts, diminishing the impact of victory of Narendra Modi at national level, and, above all,  an attempt to keep intact the female votes, by emerging as champion of female rights ( the way it tries to emerge as protector of minorities) in long term with some immediate steps in this direction right now.

It’s really ironical that on the one hand sponsored protesters, and foreign funded women’s organisations,  are demanding for tougher laws, and, on other hand, this case is now being under the vigilance of Delhi High Court since it has taken suo moto cognizance! Now that’s pretty disturbing! What was the need to do so? May be its apprehensive that government machinery might play foul and delay the justice, and thus, it’s intervention becomes necessary to ensure fair and speedy justice! Without debating the merit of High Court’s decision to take suo moto cognizance of this case, I wish to know will superior courts always take moto cognizance of such cases to ensure fair trial once tough laws come into operation? In other words,  we are mindlessly asking for tough laws in a nation, wherein  monitoring of cases by superior  court becomes necessary to ensure fair  justice. In the United States, we have a fair system which not only ensures that tough laws operate within a perfect apparatus but also that cases be dealt in scientific manner. Imagine the consequences of tough laws in corrupt and biased set up which India entertains, wherein right from investigation to trial stage, everything is shoddy and flawed. Does our system has ensured that those abusing the process of law do not go scot-free?

We have already witnessed what has been the fate of tough dowry provisions and SC/ST provisions and still dare to believe that tough provisions would stop rapes in current set-up? Isn’t it was the fear of misuse which led to scrapping of POTA provisions? I am afraid it would only lead to further deterioration of men-women relationships, which is the agenda of foreign sponsored feminist  institutions (weakening the institution called family and marriage) and also of secular parties, which breed on chaos and disorder. I mean we are living in times, wherein rape has become some sort of tool to settle scores, a weapon to blackmail, to an extent that even consensual sexes, after love gone sour, gets projected as rape. I am sure a little commonsense, instead of expecting everything to be achieved with the help of laws, would yield better results.

We should not forget that we are living in times, wherein, an actress, Maria Susairaj, can enter in one of the most macabre murders, ever intercepted by world of crime. That’s why instead of a knee jerk reaction, a conscious approach which ensures that cases are dealt in light of merit, not governed by biases for any particular gender shall create better days. Mere strict provisions, with ample scope of their misuse shall only make females become natural enemy of males. There are many MPs and members of state assemblies,booked under rape charges, and if they are asked about it they would let you know that they have been falsely implicated! Their versions may or may not be true, but it does give you an idea that either legal system is being used to settle scores or it’s not being used at all! Against this backdrop, how would you ensure that tough provisions would ensure justice?    Let’s have a glimpse how this system functions. The death of constable Subhash Tomar, amid the violent protests at India Gate, is now shrouded in mystery. The autopsy report suggests, that death was caused by a sharp object but the witnesses claim that death was a natural affair and no such attack was involved! See the contradiction.

But we are living in strange times. The mere appeal to women to dress properly or maintain right visiting hours is seen as some sort of curtailing their rights or independence, and not as commonsense. That’s because so-called lust for absolute freedom, on par with corrupt theories sponsored by feminists, have robbed of their ability to think in simple terms, making them see every such sound advice as insult of their beings. For instance, I  am sure even a men, however strong may he be, run the risk of being attacked and killed, if he dares to move on streets all alone during nocturnal hours! So is there any point in seeing a crime in a gender specific way and demanding safety of women alone? Check the data and you would find more number of men killed in tragic way. So should I start campaigning for safer world of men? Attack and getting killed is more failure of law and  order, instead of something born out of  gender specific cause. Another idiotic argument presented by the feminists, and modern girls, is that wearing provocative dress is no invitation to rape. That’s true and I agree whole-heartedly with the counter offered but what I totally disagree is that provocative dressing creates no impact. That defies psychological laws. It’s a common phenomenon that both female and male physiological responses i.e. erectile responses are involuntary in wake of anticipating atmosphere surcharged with sexual stimulants. 

So why are we trying to create a system, which mainly tries to accommodate demands of one sex, not in tune with common sense and  psychological aspects? Mind you even “gun-culture” would not ensure a safe scenario if some basic sociological principles get avoided. That’s the reason why gun-culture in United States has not ensured desired result. Anyway, I am not suggesting that following such simple steps, rapes would become a rarity or, for that matter, decently dressed woman would altogether be free of sexual assaults, but these simple steps would ensure a significant drop in crime against woman. That’s exactly what  Vrinda Grover, lawyer and women’s activist, is trying to say when she  says that: ” There is no evidence to suggest that the death penalty acts as a deterrent to rape…….Certainty of punishment rather than the severity of its form could act as a deterrent.” (The Hindu)

It’s also strange that gang-rape of this girl is being projected as awakening of this nation but it’s really baffling to understand what exactly are we trying to say when we say so? Are we trying to say that had this girl been not gang-raped we would have never awakened? That’s why I feel this huge protest is orchestrated or it’s totally redundant. That I say so since Delhi has already attained the infamous title of being “rape capital of the country’” long back ago. There were 568 cases of rape, registered in 2007-2011 period. So was Delhi and whole nation sleeping? The Times of India news report from where I picked this data, quoting a police official, stated:  “Former IPS officer Y P Singh said the police informally classify rape into two categories: technical and violent. ‘In case of technical rapes, there is an element of consent involved and there is no violence. Some examples are a lady caught red-handed in an act and then alleging rape; a man inducing a lady with a false promise of marriage and having intercourse. There have also been cases where departmental seniors have called for wives of suspended juniors to stop the husband being dismissed from service,” said Singh.”  

At the time when this case caught the limelight, an unfortunate mother in Uttar Pradesh, was struggling hard to get  justice in a case involving suicide of her daughter, after being gang-raped. However, neither the media nor the concerned  higher authorities including District Magistrate paid any attention to her grievances. That makes it even more important to understand the true elements constituting the protest at India Gate and Jantar Mantar. That I say so because in past we have witnessed murder most foul like Naina Sahni murder case, Madhumita Shukla murder case, Jessica Lal murder case, and brutal rapes like one involving Aruna Shanbaug and rape of a twelve year old mentally challenged girl by a drunkard in Mumbai local train even as the others remained a mute spectator, and now we pretend that after December 16 gang-rape, nation has awakened, and, thus, demand greater safety of women! 

How can we forget the brutal gang-rapes of  two Mizo women, abducted from Dhaula Kuan, Delhi, and repeatedly gang-raped in moving vehicles in 2005 and 2010? Why we did not then gave way to such awakening? In fact, they were too dumped on the street, unconscious and without clothes, very much like the December 16 tragic episode? They were not subjected to injuries of grave nature but they are still facing emotional trauma.”The condition of this woman is worse as she seems to have lost her mental balance after the incident. “I have been told she still flows into a fit of rage, bangs her head against the wall and keeps on inflicting injuries on her private parts,” informed one of the members belonging to the  Northeast Support Centre & Helpline while narrating the normalcy report of  2005 case victim.

That’s why it becomes more than necessary to intercept this December 16 gang-rape case under the lens and scrutinize its each aspect very deeply. The moment you do so, you realize that this tragic episode, was used very shrewdly to serve some vested interests and there are many dark aspects, which have not at all surfaced despite being vast media coverage in sensational way. One might differ with my conjectures/hypothesis but the very facts point towards well-planned conspiracy to first blow out of proportion such episode and later conceal or destroy the evidences so that real picture never surfaces. Let’s deal with such dubious aspects one by one. First of all, many who had gathered at India Gate/Jantar Mantar were people belonging to women’s rights association and as per unconfirmed news reports there were disturbing elements from one political party to make the protests go out of control! The same thing happened. So that means less number of people from general public-the cattle class- and more people from dubious sections of society were mourning at the India gate and Jantar Mantar -the two spots which got maximum coverage by the mainstream media- demanding safety of women, which led to killing of constable Subash Tomar! 

Secondly, we need to know who was behind the decision to carry her to  Singapore based hospital? Why was that considered necessary and that too when it not only involved additional risk to patient but also involved huge expenditure involving taxpayer’s money? Medical fraternity is absolutely sure that there was no need to get her shifted to any other hospital, involving flight journey, when she was on ventilator, struggling hard to overcome multiorgan failure  Since it appears to be more a political reason than a medical reason, isn’t  that  shows lack of insensitivity on part of political class?  And secondly, a government claiming to ensure safety of woman, entered in such a cruel gesture when the whole nation was watching! It speak volumes about the decision making ability of Congress leaders, ironically, one of them is Lady Chief Minister of  Delhi! Agreeing  that Delhi High Court had remarked about shifting the victim to a super-specialty hospital but that was subject to  advice of medical experts and limited to extreme conditions. And the medical team has already  denied that they had no role in that decision! So who made this decision and for what reasons? It’s also curious  that electronic media channels, who covered the initial sensational phase of the tragic episode, were the ones, who abstained from covering the last ceremony of the victim, wherein it’s learned that government acted with undue haste to get the last rites done quickly, much against the opposition of parents of the victim! 

Anyway, the most sensational aspect happened while recording the statement of victim in the ICU. The Sub Divisional Magistrate Usha Chaturvedi was not only prevented from video recording of the victim’s statement by three senior police officers but also  asked by them to ” use a questionnaire they prepared”. Now that says all. The episode took a serious turn, making the SDM report the matter to Deputy Commissioner (East) B.M. Mishra. The questions we need to ask and think over are: Whom was Delhi Police trying to protect? Why was it not interested in having the videography done? Who were the backstage people involved, who influenced Delhi Police to act in that fashion? As per news reports, the people involved, the six men charged with crime, are people from lower section of society and so it’s highly impossible that top level police officers would react in that fashion and be head on with a superior authority unless some big fish is involved! And that too, at a moment, when right from Prime Minister to whole nation, everyone appeared  to be damn conscious about ensuring justice for this lady! So what was the need for Police officers to prevent the SDM from following her own way? Isn’t it a stunning blow to the claims that tough laws would ensure better environment for women? With this sort of functioning style, it’s anybody’s guess that only innocents would be behind the bars, leading to weakening of the societal structure, which in turn would help the foreign agents, in tandem with anti-India forces, to create more space for their direct control of affairs in India.

Anyway, I leave upon conscious readers to frame suitable answers for these disturbing questions. Right now I just pray for that departed soul: May you always rest in eternal peace. Hope Lord gives you all, what you failed to achieve in this ephemeral world, governed by human sharks, promoting their deadly agendas. Angels like you have no room for survival in this world.

References: 

The Hindu

The Economic Times

The Hindu

The Hindu

The Hindu

The Hindu

The Hindu

The Hindu

The Hindu

India Today

Wiki

Punjab Kesari

The Times Of India

The Times Of India

Subhash Tomar

The Hindu

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