Category Archives: Men’s Issues

कांची के शंकराचार्य की रिहाई इस बात को दर्शाती है कि वर्तमान समय में दुष्प्रचार ज्यादा ताकतवर है बजाय सत्य के!

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.


इस नए युग के इंडिया यानि “भारत” के अगर हाल के घटनाओ को देखे तो ये आसानी से समझ आ जाएगा कि धर्मनिरपेक्ष सरकारो ने सबसे ज्यादा जुल्म ढाया है हिन्दू संतो पर. ये धर्मनिरपेक्ष सरकारे मुग़लकाल के बाद्शाहो और ब्रिटिश काल के शासको से भी ज्यादा क्रूर रही है हिन्दू धर्मं से जुड़े प्रतीकों को ध्वस्त करने और इनसे जुड़े लोगो को अपमानित करने के मामले में. हिन्दू संतो को निराकरण ही प्रताड़ित किया जा रहा है और इन्हे यौन अपराधो से लेकर देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधो में बेवजह घसीटा जा रहा है. बिकी हुई मीडिया इन प्रकरणो का एक पक्ष 
दिखाती  है अपने देश में और देश के बाहर विदेशी अखबारो में. ये आपको अक्सर देखने को मिलेगा कि इस प्रकार के खबरो में ज्यादातर झूठ होता है या अर्धसत्य का सहारा लेकर एक भ्रामक कहानी गाढ़ी जाती है. कोई भी मुख्यधारा का समाचार पत्र तस्वीर के दोनों पहलू दिखाने में दिलचस्पी नहीं रखता.

एक सबसे बड़ी वजह ये है कि ज्यादातर  भारतीय मीडिया समूह का कण्ट्रोल विदेशी ताकतो के हाथो में है. सबके विदेशी हित कही ना कही शामिल है तब हम किस तरह से इनसे ये आशा रखे कि ये सच बोलेंगे? ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जो साध्वी प्रज्ञा के गिरफ्तारी को तो खूब जोर शोर से दिखाते है लेकिन साध्वी के साथ जेल के अंदर हुए अमानवीय कृत्यो को जो बंदियो के अधिकारो का सरासर उल्लंघन था उसको दिखाने या बताने से साफ़ मुँह मोड़ गए. ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जिन्होंने देवयानी प्रकरण में देवयानी का साथ इस तरह से दिया जैसी कि उसने भारत के नाम विदेशो में ऊँचा किया हो, जैसे उसने कोई जुर्म ही नहीं किया हो. वो इसलिए से क्योकि इसका सरकार से सीधा सरोकार है और सिस्टम इसके पक्ष में है लेकिन हर वो आदमी जिसने भी सरकार ये सिस्टम के विपक्ष में कुछ कहा उसे इस तरह की  सरकारे या सिस्टम सुनियोजित तरीको से अपराधी घोषित कर देता है.

ये कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के युग मे सत्य से ज्यादा असरदार किसी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से फैलायी गयी मनगढंत बाते है. समाचार पत्रो का काम होता है सत्य को सामने लाना सही रिपोर्टिंग के जरिये लेकिन हो इसका ठीक उल्टा रहा है: मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बन गयी है झूठ और भ्रम को विस्तार देने हेतु. इसका केवल इतना काम रहा गया है कि हर गलत ताकतो को जो सत्ता में है उनको बचाना, उनको बल देना. एक बाजारू औरत की तरह अपनी निष्ठा को हर बार बदलते रहना मीडिया का एकमात्र धर्मं बन गया है. साधारण शब्दो में ये सत्ता पे आसीन शासको की भाषा बोलता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी की गिरफ्तारी के प्रकरण के रौशनी में इस प्रकरण को देखे जिन्हे २००४ में बेहद शर्मनाक तरीके से शंकर रमण के हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. शंकर रमण कांची के एक मंदिर में मैनेजेर थें. उस वक्त के तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए और ये जताने के लिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं होता इनकी गिरफतारी सुनिश्चित की. कांची के शंकराचार्य के ऊपर “आपराधिक षड्यंत्र, अदालत को गुमराह करने गलत सूचना के जरिये, धन का आदान प्रदान आपराधिक गतिविधि को क्रियांवित करने के लिये” आदि आरोप लगाये गए.

इस एक हज़ार साल से भी ऊपर अति प्राचीन ब्राह्मणो के अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र के मुख्य संचालक को इस तरह अपमानजनक तरीके से एक दुर्दांत अपराधी के भांति गिरफ्तार करना और फिर मुख्यधारा के समाचार पत्रो के द्वारा अनर्गल बयानो के आधार पर उनको दोषी करार कर देना अपने आप में मीडिया की सच्चाई बयान कर देता है. ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

 ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

उस वक्त के प्रमुख समाचार पत्रो ने ये दर्शाया कि पुलिस इस तरह से गिरफ्तार करने का साहस बिना पुख्ता सबूतो के कर ही नहीं सकती. उस वक्त अभियोजन पक्ष के वकील इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि शंकराचार्य को दोषी साबित करने के लिए उनके पास पर्याप्त पुख्ता सबूत थें. विवेचना अधिकारी प्रेम कुमार का ये बयान प्रमुखता से छपा कि हमारे पास ठोस साक्ष्य है स्वामी जयेन्द्र सरस्वती के खिलाफ और ये कि शंकर रमण और इनके बीच करीब चार सालो से आपसी मनमुटाव था जिसको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत इकठ्ठा किये जा रहे है.

खैर ईश्वर के यहाँ देर भले हो पर अंधेर नहीं है. सत्य की अंततः विजय हुई जब पांडिचेरी की विशेष अदालत ने सत्ताइस नवंबर २०१३ को उन सभी लोगो को जो शंकर रमण हत्याकांड में आरोपी बनाये गए थें उनको बाइज्जत बरी कर दिया. इसी के साथ नौ साल से हो रहे ड्रामे का पटाक्षेप हो गया. उन पर लगाये गए सभी आरोपो से उन्हें मुक्त कर दिया गया. जितने भी प्रमुख गवाह थें उन्होंने अभियोजन पक्ष के वर्णन को समर्थन देने से इंकार कर दिया। अभियोजन पक्ष के विरोध में करीब ८० से अधिक गवाहो ने अपने बयान दर्ज कराये।

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे. हिन्दुओ के आस्था और प्रतीक के साथ जो बेहूदा मजाक हुआ उसके निशान कई वर्षो तक संवेदनशील मनो को कटोचते रहेंगे. लेकिन हिन्दू ब्राह्मण के उदार मन को देखिये कि इतना होने के बाद भी किसी के प्रति कोई कटुता नहीं. इस परिपेक्ष्य में शंकराचार्य के वक्तव्य को देखिये जो उन्होंने बरी होने के बाद दिया: ” धर्म की विजय हुई. सत्य की जीत हुई. सब कुछ खत्म हो जाने के बाद अंत में केवल यही बात मायने रखती है. मुझे मेरे गुरु ने सब कुछ सहन करने को कहा है. इसलिए ये कहना उचित नहीं होगा कि हालात मेरे लिए असहनीय थें. हा कुछ दिक्कते जरूर आयी वो भी उस वजह सें कि हम लोग नयी तरह की परिस्थितयो का सामना कर रहे थें. हमने पूर्व में देखा है कि किस तरह आक्रमणकारियों ने हिन्दू मंदिरो पर हमले कर उनको विध्वंस किया। आज जब हम मंदिरो पर पड़े उन हमलो की निशानियाँ देखते है तो  हमे वे आक्रमणकारी और उनकी क्रूरता याद आती है. आज जो कुछ भी मठ के साथ हुआ ( मेरे पर जो  आरोप लगे) वे बहुतो की नज़र में पूर्व में किये गए आक्रमणकारियों के द्वारा किये गए विध्वंस सरीखे ही है.”

ये बहुत दुःख की बात है कि जैसे ही किसी हिन्दू संत पर कोई आरोप लगते है सारे मुख्यधारा के मीडिया समूह उस संत को बदनाम करने की कवायद में जुट जाते है पूरी ताकत से इस बात से बिल्कुल बेपरवाह होकर कि मीडिया का मुख्य काम किसी भी घटना की सही-२ रिपोर्टिंग करनी होती है ना कि न्यायिक ट्रायल करना। उससे भी बड़ी बिडम्बना ये है कि अगर संत पर लगे आरोप निराधार और झूठे पाये जाते है तो जो अखबार या फिर न्यूज़ चैनल आरोप लगने के वक्त पूरे जोर शोर से संत को दोषी ठहरा रहे थे वे ही अखबार और न्यूज़ चैनल पूरी तरह से कन्नी काट लेते है. संत को बेगुनाह साबित करने वाली खबर कब आती है और कब चली जाती है ये पता भी नहीं चलता है. यही वजह है कि कांची के शंकराचार्य की बेगुनाही और बाइज्ज़त बरी होना किसी भी शीर्ष अखबार के सुर्खियो में नहीं आया. शायद सेकुलर मीडिया ने ये सोच कर इस खबर को प्रमुखता से नहीं बताया क्योकि हिन्दुओ से जुडी कोई भली खबर सेक्युलर भावना के विपरीत होती है!

मेनस्ट्रीम मीडिया को प्रोपगेंडा ज्यादा रास आता है बजाय सत्य के. सेक्युलर ताकतो ने और इनके द्वारा संचालित मीडिया समूहो ने कांची के शंकराचार्य के गिरफ्तारी के वक्त ये बहुत जोरदार तरीके से ये दर्शाया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होता. तो क्या यही सेक्युलर ताकते जो कानून की बात करती है शाही ईमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी को गिरफ्तार करने की हिम्मत रखते है जिन पर कई धाराओ में देश के विभिन्न थानो में एफ आई आर दर्ज है? क्या यही सेक्युलर ताकते उन क्रिस्चियन मिशनरीज को बेनकाब करने की ताकत रखती है जो देश के पिछड़े और दूर दराज के इलाको में लोगो को बहला फुसला कर उनका धर्म परिवर्तन कर रही है? लेकिन ये सबको पता है कि सेक्युलर मीडिया ऐसा कभी नहीं करेगा. ऐसा इसलिए कि इन सेक्युलर लोगो की निगाह में कानून के लम्बे हाथ केवल हिन्दू संतो के गर्दन तक पहुंचती है. ये हिन्दू संतो को केवल बदनाम करने तक ही सीमित है और हिन्दू आस्था को खंडित और विकृत करने भर के लिए है. ये दुष्प्रचार के समर्थक है सत्य के नहीं.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.


References:

IBN Live

The Hindu

The Hindu

Wiki


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खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा!

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?

गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है?


खुर्शीद अनवर की आत्महत्या कई गम्भीर सवाल खड़े कर गयी आज के समाज के बारे में, पत्रकारिता के स्तर के बारे में और कानून के उपयोग और दुरुपयोग के सन्दर्भ में. खुर्शीद अनवर एक प्रसिद्ध सामजिक कार्यकर्ता थें जो नई दिल्ली में इंस्टिट्यूट फॉर सोशल डेमोक्रेसी नाम की संस्था चलाते थें. इसके अलावा वे जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय के छात्र भी थें. खुर्शीद अनवर ने पिछले साल १८ दिसम्बर २०१३ को आत्महत्या कर ली थी जब उनपे एक मणिपुरी औरत ने  अपने साथ दुष्कर्म का आरोप लगाया था. ये खबर कुछ एक समाचार चैनलों पर प्रमुखता से दिखायी गयी और इसके बाद सोशल नेटवर्किंग साईटस पर अंतहीन बहस छिड़ गयी. पहले तो खुर्शीद इस आरोप से हिल गए और इसके बाद मीडिया चैनलो द्वारा कीचड़ उछालने के बाद सदमे से ग्रस्त खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली. बाद में उनके पास से बरामद सुसाइड नोट में इस बात का उल्लेख था कि मणिपुरी लड़की के साथ उन्होंने बलात्कार नहीं किया था बल्कि आपसी सहमति से शारीरिक सम्बन्ध बनाये थे.

इस घटना ने मुझे श्रीनिवास सिरास के आत्महत्या की याद दिला दी जो प्रोफेसर थे अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में. इस प्रकरण में न्यूज़ चैनलो नें इस प्रोफेसर के निजता के साथ खिलवाड़ किया था और उनकी गोपनीयता को सरेआम उजागर करके उनके समलैंगिक सम्बन्धो को विकृत स्वरूप दे दिया था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रकरण में सुनवाई करते हुए प्रोफेसर को थोड़ी राहत प्रदान की थी पर मीडिया चैनलो द्वारा की गयी गुस्ताखी उन पर भारी पड़ गयी और उन्होंने आत्महत्या कर लिया. कोर्ट इस तरह के मीडिया ट्रायल पर अक्सर चेतावनी देती रही है पूर्व में कि न्यूज़ चैनल जब केस ट्रायल स्टेज में हो तो किसी भी निष्कर्ष पर अपनी तरफ से पहुचने की हड़बड़ी ना दिखाए और न्यायालय की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश ना करे लेकिन बड़े कॉर्पोरेट संस्थानो द्वारा संचालित ये न्यूज़ चैनल न्यायालय के द्वारा इन पारित आदेश को सिर्फ कागज़ का एक टुकड़ा समझते है और उन्हें किसी प्रकरण में निहित संवेदनशीलता से कुछ नहीं लेना देना होता सिवाय इसके कि उसका माखौल किस तरह उड़ाया जाए. ये सही है मीडिया ट्रायल एक जटिल मुद्दा है लेकिन उससे बड़ा सच ये है कि सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के चलते किसी के इज्जत और उसके आत्मसम्मान के साथ जो खिलवाड़ होता है और इससे जो अपूर्णीय क्षति होती है उसकी भरपाई असंभव होती है. मीडिया  किसी दोषी व्यक्ति के अधिकारो के हमेशा अतिक्रमण करती आयी है और समय आ गया है कि सही तथ्यात्मक रिपोर्टिंग और रिपोर्टिंग जो गलत इरादो से की गय़ी हो सिर्फ न्यूज़ चैनल के टी आर पी या फिर अखबार की बिक्री बढ़ाने के उद्देश्य से की गयी हो दोनों में एक स्पष्ट रेखा का निर्धारण हो.

“सनसनीखेज रिपोर्टिंग तो हमेशा होगी क्योकि सनसनीखेज घटनाये भारत में हमेशा रहती है. सुप्रीम कोर्ट इस पर लगाम लगाने में असमर्थ है. ये सही है कि रिपोर्टिंग सही होनी चाहिए पर इसका ये मतलब निकालना कि ये मीडिया के द्वारा ट्रायल है एक निन्दात्मक अभिव्यक्ति है. कोर्ट या किसी के पास कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है जो ये निर्धारित कर सके कि मीडिया ट्रायल क्या होता है.” (सीनियर अधिवक्ता राजीव धवन, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया). खैर इस बात से इंकार करना असम्भव है कि मीडिया के द्वारा किसी भी दोषी व्यक्ति के अधिकारो का हनन और किसी के भी निजता के साथ खिलवाड़ करने के कृत्य का अपने तरफ से दूषित स्पष्टीकरण कोई भी मतलब नहीं रखता। ये सिर्फ एक व्यर्थ का  प्रलाप होता है, बेवजह अपने को सही ठहराना होता है. उसकी स्पष्टीकरण से उस अपूर्णीय क्षति की भरपाई असम्भव है जो इस वजह से होती है. इन दोनों प्रकरणो में दो व्यक्ति ने अपनी जान ले ली इस वजह से और अब हम ये कभी नहीं जान पाएंगे कि सच्चाई क्या थी. क्या ये दो जाने वापस मिल जाएंगी? क्या खोया सम्मान वापस मिलेगा? शायद कभी नहीं।

वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी शायद सच के ज्यादा करीब है जब ये कहते है कि “पत्रकारिता में शायद निष्कर्षो पर पहुचने की हड़बड़ी है. ये उसी दिन किसी को मुजरिम ठहरा देता है जिस दिन किसी पे आरोप लगते है, इसके पहले कि कोर्ट किसी बात का निर्धारण करे. ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है. कैसे मीडिया इतनी जल्दीबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर पहुच सकती है और किसी को इतनी हड़बड़ी में दोषी करार दे सकती है? मीडिया को इस बात का इन्तजार करना चाहिए कि कम से कम प्राथमिक रिपोर्ट तो दर्ज हो, कम से कम जांच तो पूरी हो जाए” (डी एन ए न्यूज़ रिपोर्ट) ये बिलकुल चकित कर देने वाली बात है कि मीडिया कभी भी इस तरह के सनसनीखेज मीडिया ट्रायल के दौरान अपूर्णीय क्षति और इनके अंजामो के बारे में कभी भी ईमानदारी से आकलन नहीं करती. गम्भीर मुद्दा ये है कि सतही मीडिया ट्रायल के चलते जिस भीषण मानसिक कष्ट से गुजरना होता है और जो सरेआम अपमान सहन करना पड़ता है क्या उसका कोई अस्तित्व नहीं? क्या इसका कोई मोल नहीं? क्या ये बिलकुल उपेक्षित कर देने वाली बात है? ये बिलकुल स्पष्ट है कि मीडिया ट्रायल अधिकतर एकतरफा, भ्रामक और तथ्यो के साथ खिलवाड़ होता है जिसमे इस बात की बिलकुल परवाह नहीं की जाती कि कम से कम तथ्यो के असलियत का तो निर्धारण कर लिया जाए सूक्ष्मता से.

इस पूरे प्रकरण में दो बहुत गम्भीर पहलू शामिल है. पहला तो ये कि ये समाज के इस विकृत बदलाव को दर्शाता है कि समाज में हड़बड़ी में निष्कर्षो पर पहुचने की लत लग गयी है अधकचरे दिमाग के साथ. इसे चाहे वो प्रशंसा  हो या फिर आलोचना दोनों को बिना किसी आधार के आत्मसात करने की आदत सी हो गयी है. ना आलोचना का स्तर विकसित हो पाया और ना ही प्रशंसा के आयाम निर्धारित हो पाये. आलोचना अगर हो रही है तो तो वो भी तब जब कि कोई भी तथ्यात्मक या तार्किक आधार आलोचना के पक्ष में मौजूद नहीं है. दूसरा पक्ष ये है कि जिन कानूनो को स्त्री की अस्मिता की रक्षा करने के लिए बनाया गया है वे अब निर्दोष लोगो को प्रताड़ित करने का अस्त्र बन गए है. ये कितने तकलीफ की बात है कि जहा किसी स्त्री के सेक्सुअल हरस्मेंट का मामला उभरता है वही पे समाज का एकपक्षीय भेदभाव ग्रस्त दिमाग उभर कर सामने आ जाता है और मीडिया हमेशा की तरह दोषी के ऊपर हर तरह का लांछन जड़ देता है और इसके पहले वो अपने बेगुनाही को साबित करे वो मुजरिम साबित करार कर दिया जाता है. ये सर्वविदित है कि जो नए कानून की परिभाषा है सेक्सुअल हरस्मेंट को रोकने कि उसके प्रावधान इस तरह के है कि आप तकरीबन मुजरिम ही है और इस बात को गौण कर दिया गया है कि आप के पास भी बचाव के सही रास्ते होने चाहिए. और सबसे घातक ये है कि एकतरफा मीडिया ट्रायल शुरू हो जाने के बाद जो उसके पास अपने को बचाने के जो रास्ते होते है वे भी बंद हो जाते है क्योकि मीडिया आपके विपक्ष में माहौल खड़ा कर देता है हर तरफ.

“भारत में और अन्य देशो में जहा इस तरह के कानून पास हुए है औरतो के साथ होने वाले अपराधो को रोकने के लिए उसमे बर्डेन ऑफ़ प्रूफ को सुनियोजित तरीके से बदल दिया गया है. अब दोषी के ऊपर ये जिम्मा है कि वे अपनी निर्दोषता साबित करे. ये परिवर्तन निहित रूप से बहुत गलत है पर शायद ये इसलिए किया गया है कि ताकि इन प्रकार के अपराधो में स्त्री के पास सामान स्तर के अवसर हो अपने साथ हुए अन्याय के भरपाई के लिए. लेकिन जो अब नए कानून बने है सेक्सुअल हरस्मेंट रोकने के लिए उसमे ये बर्डन ऑफ़ प्रूफ इस सख्त स्वरूप में है कि जहा दोषी (पुरुष) के पास बचाव के सारे रास्ते बंद हो जाते है. अगर एक बार आप पर आरोप लगे तो इस बात की सम्भावना कम है कि आप अपने को निर्दोष साबित कर सके या आपको बेहद मशक्कत के बाद ही कोई रास्ता दिखायी पड़े. ये शायद नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है.” (वरिष्ठ पत्रकार प्रेम शंकर झा, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

संक्षेप में समाज और मीडिया दोनों का स्तर रसातल में चला गया है क्योकि ये दोनों भावनाओ के प्रवाह में बहने के आदी हो गए है और इन दोनों को तथ्यो और तार्किक सोच से कुछ लेना देना नहीं रह गया है. दोनों को इस विकृत खेल में रस आने लगा है जहा किसी निर्दोष के भावनाओ के साथ खिलवाड़ होता है, उसके आत्मसम्मान के जब टुकड़े टुकड़े किये जाते है. लेकिन खेद कि बात ये है कि न्याय परंपरा/व्यवस्था भी इसी विकृत रस का शिकार हो गयी है, इन्ही घातक प्रवित्तियों का शिकार सा हो गयी है, खासकर उन मामलो में जहा स्त्रियों से जुड़े अपराधो के निष्पक्ष अवलोकन की बात आती है. खैर सब की जिम्मेदारी बनती है कि  भावनात्मक प्रवाह में बह कर लिए गए निर्णयो के बजाय सोच समझकर तार्किक रूप से लिए गए निर्णयो को प्राथमिकता दी जाए. ये बहुत आवश्यक हो गया है समाज के बिखराव को रोकने के लिए, एक मूल्य आधारित समाज के निर्माण के लिए.

पाठक इस लेख का अंग्रेजी संस्करण यहाँ पढ़े:

Rape Allegation That Led To Suicide of Kurshid Anwar: A Resounding Slap On The Face Of Media!

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

खुर्शीद अनवर की आत्महत्या: समाज, कानून और मीडिया के गाल पर झन्नाटेदार तमाचा

References:

Activist Khurshid Anwar’s suicide: Was media trial responsible?

AMU’s ‘gay’ prof commits suicide

Guilty If Charged

Dainik Bhasker

 

पिक्स क्रेडिट:

तस्वीर प्रथम 

तस्वीर दो

The Times Of India: Marriage Bill Is Anti-Men

This News Item Appeared In The Allahabad Edition Of The Times Of India On December 19, 2013.

This News Item Appeared In The Allahabad Edition Of The Times Of India On December 19, 2013.


It’s a matter of great satisfaction that prominent publications related with mainstream media have begun to embrace issues related with men in a fair way. The various bodies working for the cause of men across the nation have decided to ferociously protest against the recent amendments made in Hindu Marriage Laws which are not only anti-male but also do not augur well for the cause of society. I  must appreciate The Times of India and its correspondents some of them whom I know personally quite well  for  being sympathetic towards issues sensitive in nature. The complicated issues cannot be dealt with in a proper way unless we know both the sides of story and this type of fair reporting allows us to be more informed about aspects which remain neglected owing to lack of dissemination.  Right now  some of the well known Men’s associations based in Bangalore, Pune,  Nagpur and elsewhere are working hard to create awareness regarding misuse of laws, which they call legal terrorism. The activists right now are engaged in having dialogue with Members of Parliament with a hope to apprise them of with concerns of Men’s Associations. I am sure the day is not far when gender-neutral laws would get introduced to provide a better shape to Indian society now on the verge of disarray due to blatant misuse of power by the feminists, enjoying support of negative powers operating within the nation and in foreign lands. 

 

पुरुष अधिकारो से जुडी एक खबर जनसंदेश टाइम्स में!

पुरुष अधिकार से सम्बंधित ये खबर दो दिसंबर 2013 को जनसंदेश टाइम्स में छपी.इस खबर का सकारात्मक परिणाम रहा शहर में क्योकि छपने के कुछ अंतराल पर हाई कोर्ट के अधिवक्ताओ और कुछ बुद्धिजीवियो ने ये कहा कि ये बड़े स्तर की साजिश है हिन्दू परिवारो को तोड़ने की. सो ये समाचार पत्र बधाई का पात्र है और वो लोग भी जो इस मामले में भारत देश में पूरी तन्मयता से लगे हुए है. शायद लोगो को पुरुष उत्पीड़न का एहसास हो जाए!

पुरुष अधिकार से सम्बंधित ये खबर दो दिसंबर 2013 को जनसंदेश टाइम्स में छपी.इस खबर का सकारात्मक परिणाम रहा शहर में क्योकि छपने के कुछ अंतराल पर हाई कोर्ट के अधिवक्ताओ और कुछ बुद्धिजीवियो ने ये कहा कि ये बड़े स्तर की साजिश है हिन्दू परिवारो को तोड़ने की. सो ये समाचार पत्र बधाई का पात्र है और वो लोग भी जो इस मामले में भारत देश में पूरी तन्मयता से लगे हुए है. शायद लोगो को पुरुष उत्पीड़न का एहसास हो जाए!


पुरुष अधिकार से सम्बंधित ये खबर दो दिसंबर को जनसंदेश टाइम्स में छपी. विवाह कानून (संशोधन) विधेयक 2010 को लेकर पुरुष अधिकार संघटनो जिनमे सेव इंडियन फॅमिली फाउंडेशन और मेंस राइट्स एसोसिएशन प्रमुख रूप से शामिल है के द्वारा नई दिल्ली में सांसदो को अपनी आपत्तियों से पत्र के माध्यम से अवगत कराया जाएगा जो उनको व्यक्तिगत रूप से सौपे जायेंगे संसद के वर्तमान शीतकालीन सत्र में। इस बाबत ये महत्त्वपूर्ण खबर इलाहाबाद के इस प्रमुख हिंदी अख़बार में छपी जिसका प्रकाशन कई शहरो में होता है. 

इस खबर का सकारात्मक परिणाम रहा शहर में क्योकि छपने के कुछ अंतराल पर हाई कोर्ट के अधिवक्ताओ और कुछ बुद्धिजीवियो ने ये कहा कि ये बड़े स्तर की साजिश है हिन्दू परिवारो को तोड़ने की. सही बात है क्योकि देखने में यही आ रहा है कि जितने घातक संशोधन हिन्दू विवाह अधिनियम में हुए है और वो भी पुरुष विरोधी किसी सुनियोजित साजिश का अंग लगते है. सबसे खेदजनक बात ये है कि हिन्दू हितु की रक्षा करने का दावा करने वाली संस्थाए और राजनैतिक पार्टिया इस मुद्दे पर आश्चर्यजनक रूप से खामोश और निष्क्रिय है. जबकि इसी मुद्दे पर अमरीका आदि देशो में कुछ सचेत हिन्दुओ ने इस बात को तीव्रता से महसूस किया है लेकिन हमारे यहाँ लोग अभी गहरी नींद में है इस मुद्दे पर. 

सो ये समाचार पत्र बधाई का पात्र है और वो लोग भी जो इस मामले में भारत देश में पूरी तन्मयता से लगे हुए है. शायद लोगो को पुरुष उत्पीड़न का एहसास हो जाए. 

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विवाह कानून (संशोधन) विधेयक 2010: सरकार को पुरुष संघटनो की तरफ से कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण सुझाव
 

References: 

Jansandesh Times 

विवाह कानून (संशोधन) विधेयक 2010: सरकार को पुरुष संघटनो की तरफ से कुछ बेहद महत्त्वपूर्ण सुझाव

इन अपूर्ण, गलत और भ्रामक संशोधनों को वापस लिया जाए. कानून को लिंगभेद से ऊपर रखा जाए (जेंडर न्यूट्रल), पति या पत्नी शब्द को जीवनसाथी (spouse) शब्द से सम्बोधित किया जाए.

इन अपूर्ण, गलत और भ्रामक संशोधनों को वापस लिया जाए. कानून को लिंगभेद से ऊपर रखा जाए (जेंडर न्यूट्रल), पति या पत्नी शब्द को जीवनसाथी (spouse) शब्द से सम्बोधित किया जाए.

पुरुष अधिकार से जुड़े  संघटनो की कुछ प्रमुख चिंताए:

* संशोधन का मूल प्रारूप (मुख्य बिन्दुएँ)- पतियो के खिलाफ पक्षपाती है.

* इस आधार पर तलाक मांग सकती है कि उसका दांपत्य जीवन ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां विवाह कायम रहना नामुमकिन है. ‘विवाह सम्बंध टूटने और किसी भी सूरत में रिश्ता बहाल न होने’ को भी तलाक एक आधार के रूप में मान्यता प्रदान किया गया है “हिंदू विवाह अधिनियम”, 1955, और स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 में. 

* पत्नी को हक़ है पति की तरफ से पेश तलाक़ याचिका को विरोध करने का इस आधार पर कि वो गहन आर्थिक संकट से ग्रस्त है. कोर्ट  इस गहन आर्थिक संकट से निज़ात दिलाने के प्रावधान अपने विवेक पर कर सकती है. (पतियो के संग पक्षपाती है)

* उन बच्चो के भरण पोषण का समुचित प्रबंध माता पिता के द्वारा उनकी आर्थिक हैसियत के अनुरूप जो अवैध संतति है.

संसदीय समिति- महिला संघटनो के द्वारा सुझाये गए प्रस्तावो से गलत तरह से प्रभावित है:

* ‘विवाह सम्बंध टूटने और किसी भी सूरत में रिश्ता बहाल न होने’ को भी तलाक एक आधार के रूप में मान्यता प्रदान करने की संस्तुति करना.

* महिला संघटनो के सुझावो से प्रेरित होकर उस वैवाहिक संपत्ति पर भी पत्नियों का अधिकार होगा जो विवाह के उपरांत अर्जित की गयी है दोनों के सहयोग से.

* पुरुष संघटनो के हर सुझावो की उपेक्षा की गयी.

कानून मंत्री द्वारा किये गए अन्य संशोधन- पुरुष हितो के विपरीत प्रावधानो की स्वीकृति:

* पत्नी का हिस्सा  उस संपत्ति पर जो विवाह के पूर्व और उपरान्त अर्जित की गयी है.

* पत्नी का हिस्सा पति के द्वारा अर्जित और अर्जित करने योग्य पैतृक संपत्ति में.

हमारी आपत्तियां: 

* पत्नी का कोई योगदान नहीं होता पति के द्वारा अर्जित पैतृक संपत्ति में और उस संपत्ति पर जो उसने शादी से पूर्व अर्जित की गयी है. उसको संज्ञान में लेकर प्रावधान बनाने की जरूरत नहीं.

* उस संपत्ति के बटवारे में कोई भी फैसला जो पति ने शादी के उपरांत अर्जित की है आँख मूँदकर गलत तरीक़े से नहीं होना चाहिए। पत्नी के योगदान का आकलन करना चाहिए। दो महीने की शादी और बीस साल की शादी की अवधि को एक ही मापदंड से नहीं देखा जा सकता.

* ये तर्क दोष से बाधित संशोधन है कि स्त्रियाँ शादी को नहीं तोड़ती. स्त्रियाँ ना सिर्फ शादी को तोड़ती है बल्कि कई बार शादी कर सकती है और  इस तरह पूर्व में की गयी हर एक शादी से संपत्ति अर्जित कर सकती है. इस तरह के कई उदाहरण आये दिन समाचार पत्रो में प्रकाशित होते रहते है जहा लालची पत्नियों ने धोखधड़ी से शादी करने के बाद संपत्ति पे अपना दावा पेश किया या फिर झूठे 498 A के मुकदमे दर्ज कराये संपत्ति की हवस में.

ये अब एक प्रचलित हथियार बन गया है कि हर नाकाम वैवाहिक सम्बन्धो में स्त्रियाँ  IPC 498 A और घरेलु हिंसा अधिनियम का व्यापक दुरुपयोग कर रही है संपत्ति हथियाने में. अब ये संशोधन भी एक प्रमुख औजार/ज़रिया बन जाएगा समाप्ति अर्जित करने के लिए.

ये अब एक प्रचलित हथियार बन गया है कि हर नाकाम वैवाहिक सम्बन्धो में स्त्रियाँ IPC 498 A और घरेलु हिंसा अधिनियम का व्यापक दुरुपयोग कर रही है संपत्ति हथियाने में. अब ये संशोधन भी एक प्रमुख औजार/ज़रिया बन जाएगा समाप्ति अर्जित करने के लिए.

इन संशोधनों के परिणाम/अंजाम:

* वैवाहिक वादो के गहन अध्ययन के बाद ये बात स्पष्ट उभर कर आई है कि ज्यादातर वैवाहिक विखंडन का कारण पत्नी का जबर्दस्ती उस संपत्ति पर हक़ जताना रहा है जो पति या उसके रिश्तेदारो ने अर्जित की होती है.

* विवाह अपने पवित्र संस्कारो से वंचित हो जायेंगे और ये सिर्फ संपत्ति अर्जित करने का श्रोत बन जायेंगे। ये अब धीरे धीरे एक परंपरा बनती जा रही है कि भौतिक लाभ की लालसा शादी के द्वारा बढ़ती जा रही है और इस तरह के गलत संशोधनों के व्यापक दुष्परिणाम उभर कर सामने आयेंगे। 

* ये अब एक प्रचलित हथियार बन गया है कि हर नाकाम वैवाहिक सम्बन्धो में स्त्रियाँ  IPC 498 A और घरेलु हिंसा अधिनियम का व्यापक दुरुपयोग कर रही है संपत्ति हथियाने में. अब ये संशोधन भी एक प्रमुख औजार/ज़रिया बन जाएगा समाप्ति अर्जित करने के लिए.

* संपत्ति का अर्जन कई वर्षो की मेहनत का परिणाम होते है ना कि कुछ वर्षो के वैवाहिक संग का. असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति से हाथ धोने के वजह से पतियो के आत्महत्या के दर में खासी वृद्धि देखी जायेगी जो कि पहले से ही पत्नियों के आत्महत्या के दर की दुगनी है. अपराध दर में भी इस वजह से वृद्धि देखी जायेगी।  

हमारे प्रस्ताव/सुझाव:

* इन अपूर्ण, गलत और भ्रामक संशोधनों को वापस लिया जाए. कानून को लिंगभेद से ऊपर रखा जाए (जेंडर न्यूट्रल), पति या पत्नी शब्द को जीवनसाथी (spouse) शब्द से सम्बोधित किया जाए.

* संपत्ति में हिस्सा पति और पत्नी के वित्तीय योगदान के आधार पर किया जाए.

* अगर वित्तीय योगदान शून्य है तो एक फॉर्मूले का ईज़ाद किया जाए जो शादी की न्यूनतम अवधि का आकलन करे संपत्ति के बॅटवारे के हेतु और उस एक फॉर्मूले का ईज़ाद हो जो योगदान के बारे में सही रूप से निरूपण कर सके.

* शादी से पूर्व इक़रारनामे (pre-nuptial agreement) को कानूनी मान्यता दी जाए. 

* इस बात को बहुत तीव्रता से महसूस किया जाता रहा है कि असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते पत्नियों को गहरे वित्तीय संकट का सामना करना पड़ता है. विवाह एक संस्था है जो अगर ना चले तो एक लिए पुरस्कार (पत्नी) और एक लिए सजा नहीं होना चाहिए (पति). अगर पत्नी गहरे वित्तीय संकट का सामना कर रह है तो उसकी दूरी के लिए व्यापक प्रबंध किया जाना चाहिए ना कि निरीह पति को इसके लिए दण्डित किया जाना चाहिए. इस सन्दर्भ में हमारा सुझाव ये है है कि: 

# हिन्दू विवाह उत्तराधिकार एक्ट 2005 का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए. स्त्री का हिस्सा जो उसके माता-पिता के घर बनता है उसको या तो शादी के दौरान या तलाक़ की अर्जी देने के समय (किसी भी पक्ष के द्वारा) अपने आप दे देना चाहिए.  

# अगर स्त्री बेरोजगार है या जिसका कैरियर एक लम्बे अंतराल से बाधित हो गया हो तो इस तरह के महिलाओ के भरण पोषण की जिम्मेदारी और उन्हें रोजगार मुहैय्या कराने की जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए बजाय इसके कि पति पर इस तरह का भार डाला जाए. इस तरह की पत्नियों के वित्तीय संकट दूर करने के लिए “तलाकशुदा पत्नी कल्याण कोष” का गठन किया जाना चाहिए।

Reference/Credit: 

This is Hindi version of a letter addressed to the Parliamentarians prepared by the Men’s Rights Association.The Hindi version has been prepared by the author of this blog post.

 संपत्ति का अर्जन कई वर्षो की मेहनत का परिणाम होते है ना कि कुछ वर्षो के वैवाहिक संग का. असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति से हाथ धोने के वजह से पतियो के आत्महत्या के दर में खासी वृद्धि देखी जायेगी जो कि पहले से ही पत्नियों के आत्महत्या के दर की दुगनी है. अपराध दर में भी इस वजह से वृद्धि देखी जायेगी।

संपत्ति का अर्जन कई वर्षो की मेहनत का परिणाम होते है ना कि कुछ वर्षो के वैवाहिक संग का. असफल वैवाहिक सम्बन्धो के चलते अपनी गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति से हाथ धोने के वजह से पतियो के आत्महत्या के दर में खासी वृद्धि देखी जायेगी जो कि पहले से ही पत्नियों के आत्महत्या के दर की दुगनी है. अपराध दर में भी इस वजह से वृद्धि देखी जायेगी।

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Two Faces Of Masculinity From The Crude Real World Supposedly Belonging To Men In The Eyes Of Feminists!

Men Will Keep Losing Lives For The Sake Of Society!

Men Will Keep Losing Lives For The Sake Of Society!

*Scene One*

This year in the month of September a senior police officer, belonging to IPS cadre, tried to commit suicide in Maharashtra. Such news report now do not stir the emotions of common mass other than creating short-lived ripples within some sensitive minds. Even when it forces the thinking class to take cognizance of such news items, the centre of gravity in these discussions remain governed by flimsy causes and after a certain period the issue gets swept under the carpet.
 

In this particular sensational incident, this senior police officer was at the receiving end of humiliating gestures at the hands of another junior officer, belonging to IAS cadre. This harassment continued for a certain period of time and seeing no way to get out of this mess this hard-working and honest police official set himself on fire. The reason why this police officer faced the ire of this junior IAS officer was that he had found this junior officer responsible for alleged irregularities in the Maharashtra State Road Transport Corporation (MSRTC). This IPS officer in his capacity as the Chief Vigilance Officer of the MSRTC submitted an inquiry report, which found this officer guilty, who was, ironically, the head of this department at that point of time.

That’s one of the few examples from world of ours, which contradicts the claims of  feminists always unfailingly harping on the same string that world belongs to men! Unfortunately, they never realize that it’s rough, cruel and hellish for men-at-large for most of the time. The wives of such hard-working honest officials, who see such husbands as no more than a source to have ready cash all the time for their sense gratification, either in form of buying costly jewelries, costly attires, rarely come to realize what’s actually the state of affairs in lives of the their husbands. Worse, being unaware of the harsh realities prevailing in the world of men, the women show no haste in throwing tantrums on one pretext or another.

Husbands usually do not protest over such whimsical demands of wives since in their eyes giving way to demands of their wives appears to be some sort of fulfilling one’s duty towards them! And that’s how women come to rule over them and in turn exploit them.  Ironically, now laced with new rights, wives have become more possessive, greedy and irrational. It’s a sad declaration but it’s true that scenario would not change in future. It would remain the same, wherein husbands like, bonded labourers, would continue to serve their wives, even as they remained at the receiving end of most tragic developments in world outside the confines of drying room.

Suicide By Men Is Not A Serious Issue For Governments!

Suicide By Men Is Not A Serious Issue For Governments!

  *Scene Two*      

In one of the famous restaurants of Allahabad, popular among love birds, arrived one such couple. Everything went alright between these two lovers, enjoying a happy conversation amid refreshments. Suddenly, a call arrived on the phone of male friend and he went on to have a long conversation. Being suspicious about the nature of the phone call, the female partner inquired about it from her lover. The explanation offered by the male partner did not appear convincing to her and that led to heated debate between the two. The happy mood gave way to high voltage drama marred by panic and tension. The female partner, who belonged to elite class, being unaware of the consequences of involving police, telephoned the police station of that area stating she was being sexually assaulted. The police acted in prompt manner, beating his male partner black and blue, right in front of her eyes, dragged him to the police station.

The girl who did not imagine such fatal consequences and to an extent feeling sorry about the whole episode informed the police officer in the police station that her complaint was fake! She telephoned merely to teach a fitting lesson to his male partner! Perhaps she did not want that matter should reach to their homes, which was going to be the case in next few minutes. The police, taking a liberal view on the whole episode, released both of them warning them not to indulge in such drama again, which involved police. The couple promising them to behave responsibly left the police station with happy and relaxed faces. Such boyfriends, new face of masculinity in modern times would grow in numbers, willing to serve their girlfriends at all costs, no matter if it involves putting at stake one’s self-respect! 

Girlfriends Would Continue To Exploit Men At All Levels!

Girlfriends Would Continue To Exploit Men At All Levels!

Reference:

India Today 

News Item Published In Dainik Jagaran

Hindi Version Of This Article By Me

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यथार्थ से उठायी गयी मर्दानगी की दो अलग-अलग तस्वीरे: अफ़सोस ऐसा होता ही रहेगा!

… और पुरुष मर्दानगी के चलते ऐसे ही मरते रहेंगे उस समाज के लिए जो उनकी क़द्र नहीं करता :-(

… और पुरुष मर्दानगी के चलते ऐसे ही मरते रहेंगे उस समाज के लिए जो उनकी क़द्र नहीं करता :-(


                                                     *तस्वीर एक* 
                                
इसी साल सितम्बर महीने में महाराष्ट्र में एक सीनिअर पुलिस अफसर ने आत्महत्या करने की कोशिश की. ऐसी बाते हमारे भारतीय परिदृश्य में आम जनमानस के एक अल्पकालिक सनसनी के सिवाय ज्यादा कुछ पैदा नहीं करती। कुछ बतकही होती है इधर उधर की कुछ समय तक और फिर मामला ठंडा पड़ जाता है. लेकिन मै कुछ सोचने पर मजबूर हो गया. इस घटना के पीछे इस अधिकारी की प्रताड़ना थी जो ये एक अपने से जूनियर आई ए एस के हाथो कई वर्षो से झेल रहा था. वो भी इस वजह से कि इस अफसर ने ईमानदारी से काम करते हुए इस अधिकारी को एक इन्क्वायरी रिपोर्ट में कुछ मामलो में दोषी पाया था। और बात इस कदर बढ़ी कि इस अफसर ने अपने को आग के हवाले कर लिया। 

इस घटना का उल्लेख करने की वजह ये है कि जिन ऐसी अफसरो की बीवियाँ गहनो और महँगी साड़ियों से सुसज्जित पति को प्राप्त हर सुख सुविधा का भोग करती है उनको शायद इस बात का जरा सा भी अंदेशा नहीं रहता कि उनके पति किस तरह के समस्यायों से जूझ रहे है. उस पर से तुर्रा ये कि किसी चीज़ की कमी बेसी पर आसमान सर पर उठा लेने में जरा भी देर नहीं लगाती है. और ये घर घर की कहानी है. इस घर और ऑफिस के दो पाटो में हर मर्द पिस जाता है लेकिन अपने शोषण पर उफ़ नहीं करता क्योकि ये उसको अपना कर्त्वय लगता है. और जबकि इनकी पत्नियाँ हर तरह के अधिकारो से लैस इस तरह के मर्दो को कोल्हू का बैल बना के रखती है. और जिस तरह से इनको अधिकार मिलते ही जा रहे है उससे नहीं लगता कि आने वाले समय में परिदृश्य बदलेगा।     

                                                      *तस्वीर दो*

इलाहाबाद का एक प्रसिद्ध रेस्टॉरंट जहा हमेशा की तरह आधुनिक प्यार को विस्तार देते कई प्रेमी प्रेमिकाएँ बैठे है. इन्ही तमाम जोड़ो में से एक के बीच ऐसा हुआ. एक प्रेमी प्रेमिका बैठे हुए है कि अचानक प्रेमी का मोबाइल बज उठता है जिस पर वो किसी से लम्बी बात करता है तो प्रेमिका ने डिटेल्स लेनी चाहिए लेकिन प्रेमी के जवाब से संतुष्ट ना हुई. और जो इन दोनों के बीच मधुर बातो का सिलसिला चल रहा था वो तकरार के भयंकर रूप में परिवर्तित हो गया. बात यहाँ तक बढ़ी कि प्रेमिका ने तुरंत पुलिस को फ़ोन पर सूचित किया कि उसके साथ छेड़ छाड़ हो रही है. ऐसे मामलो में अति सक्रिय पुलिस तुरंत आ पहुँची और उसके बॉयफ्रैन्ड को तुरंत मारते पीटते थाने ले गए. प्रेमिका चूँकि एलिट क्लास से थी सो उसको अंदाजा ना था कि फ़ोन करने पर ऐसा भी हो सकता है. बात क्योकि अब थाने और घरवालो तक पहुचने वाली थी सो प्रेमिका ने मामले को खत्म करने के इरादे से सच बता दिया कि ऐसा कुछ नहीं था. वो केवल बॉयफ्रेन्ड को सबक सीखना चाहती थी. सो पुलिस ने हलकी से दोनों को चेतावनी देते हुए दोनों को छोड़ दिया। दोनों भविष्य में ऐसा ना करने की कसम खाते हुए फिर से इकट्ठा साथ निकल लिए. मर्दानगी के आधुनिक नमूने इस तरह के बॉयफ्रेंड की फसलें सदा लहलहाती रहेंगी जिसे इस तरह की लड़किया हमेशा अपने हिसाब से काटती रहेगी।

 

प्यार कम और तकरार ज्यादा होता है आज अधिकारो के हक़ की वजह से !!!

प्यार कम और तकरार ज्यादा होता है आज अधिकारो के हक़ की वजह से !!!

 

Reference:

India Today

News Item Published In Dainik Jagaran.

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अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाने की जरुरत क्यों आन पड़ी? अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस की सार्थकता और उपयोगिता.

Take Men More Seriously!

Take Men More Seriously!


अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस उन्नीस नवंबर को सत्तर से अधिक देशो में मनाया जाता है जिसमे त्रिनिदाद एंड टोबैगो, जमैका, ऑस्ट्रेलिया, भारत, चीन, यूनाइटेड स्टेट्स, रोमानिया, सिंगापुर, माल्टा, यूनाइटेड किंगडम, साउथ अफ्रीका, तंज़ानिया, ज़िम्बाब्वे, बोत्सवाना, हंगरी, आयरलैंड,घाना, कनाडा, डेनमार्क, नॉर्वे, ऑस्ट्रिया, बोस्निआ एंड हेर्ज़ेगोविना, फ्रांस, इटली, पाकिस्तान, अंटीगुआ एंड बारबुडा, सेंट किट्स एंड नेविस, सेंट लूसिया, ग्रेनेडा एंड केमन आइलैंड्स आदि देश शामिल है प्रमुख रूप से। इस सन्दर्भ में व्यापक ग्लोबल समर्थन हासिल हुआ इस दिवस को.

अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस का आयोजन सर्वप्रथम त्रिनिदाद एंड टोबैगो में 1999 से शुरू हुआ डॉक्टर जेरोम टिलक सिंह के द्वारा जिनके लिए उनके पिता एक रोल मॉडल थें.

अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस की जरूरत क्यों?

अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस मनाने का मुख्य प्रयोजन पुरुषत्व और पुरुष होने की भावना का सम्मान करना है.

ये इस वजह से भी मनाया जाना आवश्यक है कि ताकि पुरुषो ने समाज के उत्थान और विकास के लिए जो सहयोग दिया उसको मान्यता मिले; वे जो बलिदान देते है अपनों के लिए उसको महसूस किया जा सके; और वे जिन समस्यायों से ग्रसित है उसके बारे में समाज और औरो को अवगत कराया जा सके.

इस दिवस को मनाने का एक प्रमुख कारण ये भी है कि कुछ प्रमुख समस्याएँ जो पुरुष वर्ग के सामने उभर के आती है उनके बारे में समाज में चेतना जाग्रत किया जा सके.

पुरुष वर्ग को अक्सर समाज के हाथो उपहासत्मक, नकारात्मक और उपेक्षा से ग्रसित मानसिकता का सामना करना पड़ता है जिसकी वजह से अक्सर वे कई प्रकार के मानसिक विकृतियों का शिकार हो जाते है और ऐसा इसलिए होता है क्योकि वे अक्सर अपने समस्याओं को लोगो से नहीं बाँटते है और उन्हें अपने तक ही सीमित रखते है. इस ना बांटने के वजह से ये भ्रम पैदा हो जाता है कि पुरुषों की जिंदगी बिल्कुल चिकनी सड़क के सामान है जिसपे कोई अवरोध नहीं है जबकि हकीकत ये है कि इनकी राहे कांटो से भरी रहती है. और इस अज्ञानता के कारण समाज सही ढंग से कभी भी पुरुषो के अधिकारो पर नहीं  गौर करता है और ना ही उनके हितो को प्राथमिकता देता है.

इस दिवस पर ये एक दिन इस बात को समर्पित है कि हम पुरुषो के प्रति अपनी कृतज्ञता जता सके, जिन्होंने दुनिया जो बेहतर बनाने के खातिर अपने पसंदगी और नापसंदगी और अपने हितो को ताक पर रख दिया।थीम 2013:इस बार का अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस इस बात को समर्पित है कि पुरुषो को बोलना चाहिए ( अपने समस्याओ के सन्दर्भ में) और लोगो के बीच अपनी बाते बांटनी चाहिए।

आज पुरुष के ऊपर कार्य को उत्कृष्ट तरीके से करने का अत्यधिक दबाव है जो पुरुषत्व की भावना के प्रधान होने के कारण उन्हें जड़ और कठोर बना दे रहा है. पुरुष होने के नाते ये अपमानजनक सा लगता है अगर वे अपने समस्यायों के बारे में लोगो से बात करते है और औरो को इससे अवगत कराते है. बांटने का खतरा ये रहता है कि इन बातो कि वजह से वो उपहास का बिंदु बन सकता है और अगर वो ना बांटे तो वो अहंकारग्रस्त करार दे दिया जाता है.

पुरुष होना आज के युग में अपने कुछ नए मायने लेके आया है, कुछ नए लक्ष्य लेके आया है. अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस पर पुरुष इस बात के लिए प्रेरित होते है कि वे पुरुष होने के महत्व और चुनौतियों पर बात कर सकते है.

पुरुष के पास अपनी समस्याएँ रखने का कोई उचित मंच या स्पेस नहीं है. पुरुषो के समस्याओं पर मुख्यधारा के मीडिया में शायद ही चर्चा होती हो. उसकी एक वजह ये है कि पुरुष कभी नहीं अपने दुखो, चिंताओ और तनाव पर लोगो के बीच विचार विमर्श करते है.  

अपने में सीमित रहने कि एक वजह ये है कि बचपन से इन्हे गलत संस्कारो के बीच पाला पोसा जाता है जहा बहुत ज्यादा अपने बारे में बोलने को पुरुषत्व के विपरीत माना जाता है. सो ये अक्सर सुनने में आता है जहा पे एक लड़के को ये कहा जाता है कि क्यों लड़कियो की तरह रो रहे हो … मर्द बनो!

इस तरह के गलत सुझाव् जो बचपन से पुरुषो के मन पर थोप दिए जाते है उनकी वजह से ये होता है कि वो कभी भी खुलकर अपनी बाते बांटने में झिझकता है और कतराता है. अपनी तमाम समस्यायों और उलझनो को अपने में कैद करके रखता है जिसकी वजह से मनोवैज्ञानिक रूप से उसका सही विकास अवरुद्ध हो जाता है.

इस वजह से सारी  समस्याएं इस प्रकार से उसके अंदर फँस जाती है जिस तरह एक नाली में सें गंदे पानी का बहाव का रुक जाना। इस वजह से वे कई प्रकार की बीमारियो का शिकार हो जाते है. समाज को आगे बढ़कर पुरुषो की इन समस्याओं को समझना पड़ेगा। इनके भावनाओ और जस्बातों को ठीक ठीक समझना होगा।

वे दिन शायद अब सिर्फ किसी सपने के समान है जब समस्या से दो चार होने पर पुरुष एकांतवास ले लेते थे किसी गुफा में.

इस वजह से पुरुषो को ना सिर्फ अपने को बेहतर तरीके से अपने को अभिव्यक्त करना सीखना पड़ेगा बल्कि अपने साथी पुरुष मित्रो के भावनाओ, समस्याओ और दुखो को सही सही समझने की कला विकसित करनी  पड़ेगा। अक्सर हम अपने साथी पुरुष मित्रो के समस्याओं को कमतर करके आंकते है. इस गलत प्रवत्ति पर अंकुश लगाना पड़ेगा। सो इस बार के अंतराष्ट्रीय पुरुष दिवस का विषय है कि पुरुष मुखर हो ( अपने समस्याओ के सन्दर्भ में) और लोगो के बीच अपनी बाते रखे.

The Society Should Stop Undermining The Contributions Made By Men!

The Society Should Stop Undermining The Contributions Made By Men!

पुरुषो के मुख्य मुद्दे:

पुरुष कई प्रकार के समस्याओ से जूझ रहे है जिनके बारे में लोगो को जानकारी ना होने के कारण, चेतना के अभाव के कारण समाज में पुरुष विरोधी माहौल व्याप्त रहता है. कुछ प्रमुख मुद्दे इस प्रकार से है:

पुरुषो के साथ अक्सर भेद भाव होता है पारिवारिक न्यायालयों में.

इस बात की सम्भावना नब्बे प्रतिशत तक है कि अगर तलाक होता है तो पिता अक्सर बच्चे पर अपना कानूनी हक़ खो देते है.

विवाहित पुरुष विवाहित स्त्रियो के मुकाबले दुगने रफ़्तार से आत्महत्या करते है.

सरकार और न्यायालयों के पास विवाहित पुरुषो के आत्महत्या को रोकने की कोई नीति नहीं है.

अगर महिला पुरुष का शोषण करती भी है तो भी समाज ऐसी महिलाओ को सजा  नहीं देता है.

स्त्रियो की अपेक्षा पुरुष चार गुना अधिक रफ़्तार से हादसो में मरते है.

समाज ने पुरुष को इस सांचे में ढाल रखा है कि वे सब तरह का जोखिम उठाते है, अपनी जाने गंवाते है और वो भी ज्यादातर अवैतनिक मजदूर की तरह.

पुरुष जो आहुति देते है, जो बलिदान करते है उनका कोई मोल नहीं होता और वे मात्र उनका कर्तव्य मान लिया जाता है.

पुरूष जो समाज के उत्थान में अपना सहयोग देते है वे अक्सर चर्चा का विषय नहीं बनती और ये सहयोग इतिहास के पन्नो में कही दब सा जाता है.

ये तो केवल कुछ ही मुद्दे है जो अभी उभर कर आये है. अभी बहुत से मुद्दे है जो तह में दबे हुए है और जिन पर अभी चर्चा होनी बाकी है.

पिताओ के मुख्य मुद्दे:

पिता भी कई मुद्दो से रूबरू है जो संक्षेप में इस प्रकार है:

अलगाव के उपरान्त अगर पिता अपने बच्चे से मिलना चाहे या उनके साथ समय बिताना चाहे तो उसे कई प्रकार से अपमानित होना पड़ता है.

ऐसे कई पिता है जिनको अपनी अत्याचारी पत्नियों के हाथो कई प्रकार की मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है, इमोशनल ब्लैकमेल होना पड़ता है अगर वे अलगाव के बाद अपने बच्चो से मिलने का प्रयास करते है.

अगर क़ानूनी तौर पे अलगाव हो गया है तो अक्सर पिता को अपने बच्चो से मिलने नहीं दिया जाता, उन्हें एक दूसरे के साथ समय नहीं व्यतीत करने दिया जाता।

न्यायालय और समाज के द्वारा पिता को सिर्फ “एटीएम मशीन” और “स्पर्म डोनर” मान लिया गया है जिसकी वजह से भारतीय समाज “फ़ादरलेस सोसाइटी” की तरफ बढ़ चला है.

अंतराष्ट्रीय स्तर पर हुए शोधो और अध्ययन से ये पता चला है कि “फ़ादरलेस सोसाइटी” में निम्नलिखित बाते प्रधान है:

पिता के अस्तित्व से वंचित समाज में बच्चे:

पांच गुना अधिक आत्महत्या करते है.

बत्तीस गुना अधिक सम्भावना रहती है उनके घर से भागने की.

बीस गुना अधिक  इस बात कि सम्भावना है कि उनमे व्यवहार सम्बधित दोष उत्पन्न हो जाए.

चौदह गुना इस बात कि सम्भावना है कि वे बलात्कार करे.

नौ गुना अधिक वे हाई स्कूल की पढाई से वंचित रह जायेंगे मतलब अधूरी छोड़ देंगे।

१० गुना इस बात कि अधिक सम्भावना है कि वे ड्रग्स लेने के आदि हो जाए.

नौ गुना इस बात कि सम्भावना है कि वे राज्य द्वारा स्थापित संस्थानो के भरोसे रह जाए जीवन यापन के लिए.

बीस गुना इस बात कि सम्भावना है कि वे जेल जाने को मजबूर हो जाए.

इस प्रकार के समाज में तीन मिलियन लड़किया सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीसेस से पीड़ित है और इस प्रकार के समाज में चार में से एक टीनेजर बच्चा सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीसेस से पीड़ित है.

सिफ्फ़ और क्रिस्प के बारे में:

सेव इंडियन फॅमिली फाउंडेशन एक गैर सरकारी संगठन (NGO) है जो पुरुषो के अधिकारो के लिए लड़ रही है, लिंगभेदी कानूनो के खात्मे के लिए प्रयासरत है और समाज में व्याप्त पुरुषो के प्रति घृणा के खात्मे के प्रति प्रतिबद्ध है. ये भारत में शुरू पहला ऐसा संगठन है जो पुरुषो को एक मंच प्रदान करता है अपनी बात रखने का, अपने चुनौतियों का जिक्र करने का और जिन विपरीत परिस्थितयो में वे काम कर रहे है खासकर वैवाहिक समस्याओं के सन्दर्भ में उनके बारे में खुलकर अपनी बाते रखने के लिए. सिफ्फ़ रिश्तो के उलझाव में फंसे पुरुषो को उनसे निदान पाने के बारे में रास्ते दिखाता है, उन्हें प्रक्षिक्षण देता है और ऐसा कॉर्पोरेट संस्थाओ के लिए काम करने वाले पुरुषो के लिए भी किया जा रहा है. अब तक हज़ारो पीड़ित पुरुषो ने सिफ्फ़ से जुड़कर समस्यायों से निज़ात पाने में कामयाबी पायी है.

चिल्ड्रन राइट्स इनिशिएटिव फॉर शेयर्ड पैरेंटिंग (CRISP) एक गैर सरकारी संघटन (NGO) है जो पिताओ को अपने बच्चो से तादात्म्य स्थापित करने में सहयोग प्रदान करता है खासकर उस स्थिति में जहाँ माता पिता के बीच अलगाव हो गया हो. क्रिस्प ने कई अवसरों पर विधि आयोग से संवाद स्थापित किया है और सांसदो से मुलाकात कर पिताओ के बच्चे के प्रति लगाव को अधिक संवेदनशीलता से देखे जाने का अनुग्रह किया है. अब क्योंकि ज्यादा से ज्यादा पुरुष सरंक्षक की भूमिका का निर्वाहन करने में सलंग्न है क्रिस्प का कहना ये है कि अलगाव की स्थिति में शेयर्ड पैरेंटिंग मतलब संयुक्त रूप से पालन पोषण को अनिवार्य कर दिया जाए.

Is Violence Against Men At Hands Of Women Not An Issue?

Is Violence Against Men At Hands Of Women Not An Issue?

The post also got extensive coverage in leading Hindi Newspapers, courtesy Rajesh Vakahariaji, President, Save India Family Foundation, Nagpur, Maharashtra:

The post got featured in Navbharat which is a leading newspaper in Maharashtra :-)

The post got featured in Navbharat which is a leading newspaper in Maharashtra :-)

 

 

Reference: 

The article is based on literature provided by SIFF and CRISP

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Beginning Of A New Era: Men’s Rights News Reports Which Featured In Newspapers Published From Lucknow And Allahabad

Author Of This Post At Fifth Men's Rights National Conference Held In Nagpur, Maharashtra,  From August 16- August 18, 2013.

Author Of This Post At Fifth Men’s Rights National Conference Held In Nagpur, Maharashtra, From August 16- August 18, 2013.


The Fifth Men’s Rights  National Conference, held in Nagpur in the second week of August 2013,  got tremendous coverage in mainstream media in Allahabad and Lucknow. It’s matter of self-pride since newspapers in this region are still not that familiar with concept of men’s rights. It’s a new phenomenon for them. In fact, issues pertaining to rights of men are still taken in lighter vein. Even the ones who are supposed to be more informed than ordinary class of people like reporters, editors and lawyers remain nonchalant when they come to hear about exploitation of men.

Fortunately, the extensive coverage of news related with Men’s Rights National Conference held in Nagpur marks a beginning of new era in this part of India. I am sure in coming days talks related with rights of men will not evoke irresponsible remarks. Have a look at the various news reports which appeared in Allahabad region’s prominent newspapers. It proved to be a herculean task to make them find meaning in talks related with men’s issues.I am happy that I was able to shatter the inertness prevalent in the minds of people who are supposed to be the custodians of human rights and made them understand the seriousness attached with cause of men.  Many thanks to those reporters, editors and lawyers who responded positively as I spoke about the rights of men. Hope the cause of men’s attain new heights in coming days

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1. The Times Of India

The Times Of India, September 01, 2013

The Times Of India, September 01, 2013

Link Related To This News Report: The Times Of India, Allahabad Edition

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2. Northern India Patrika 

Northern India Patrika: Oldest English Newspaper In Allahabad Region Gave Enough Coverage To Rights Of Men...

Northern India Patrika: Oldest English Newspaper In Allahabad Region Gave Enough Coverage To Rights Of Men…

Link To This News Report:  Northern India Patrika

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3.  Daily News Activist Published From Lucknow

Daily News Activist Published This News Report On September 26, 2013.

Daily News Activist Published This News Report On September 26, 2013.

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4. Jansandesh Times Published From Allahabad, Varanasi, Gorakhpur And Lucknow. 

This News Report  Published In  Jansandesh Times Created Huge Sensation In Various Important Circles.

This News Report Published In Jansandesh Times Created Huge Sensation In Various Important Circles.

Links Related To This News Report Published On October 03, 2013:  Visit The Archives Section Of Jandsandesh Times

And yes, many thanks to Amlesh Vikram Singh,  Correspondent associated with Jansandesh Times,  who made sincere efforts to get this news report published.  

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An Important News Item Related With Rights Of Men:

Deciphering The Significance Of Men’s Rights On Indowaves

Deciphering The  Significance Of Men’s Rights Movement Published In Northern India Patrika 

Deciphering The Significance Of Men’s Rights Movement On Website 498.in 

It's Not Bad To Aware Of One's Worth And Contributions..Many thanks to The Lord Almighty...

It’s Not Bad To Be Aware Of One’s Worth And Contributions..Many thanks to The Lord Almighty…

 


Deciphering the Significance Of Men’s Rights Movement

Men Provide A Perfect Balance In A Society!

Men Provide A Perfect Balance In A Society!

(This Article Written By Arvind K.Pandey First Appeared On Website 498a.in) 

I remember my visit to Delhi in early 90s. I saw billboards which talked about helpline centers for harassed husbands. These billboards initially left me in a state of dismay but I soon realized their worth. It was an awakening of sorts for me, but a greater lot remained a sleeping giant! One of the most difficult tasks is to create a new vision by bringing a change in the attitudes and precepts governing the society. The conditioning of brainwaves, age-old retarded practices and worn-out ideas cannot be changed overnight. That’s why we need a mass movement in organized way to create a new path. The significance of men’s rights movement need to be understood in light of principles controlling mass movements of previous eras, which believed in the fact that Rome wasn’t built in a day.

The Indian society, or for that matter, societies across the globe are still heavily polarized in the favor of females. Men are still treated as supposedly stronger sex and women as a weaker lot, tormented and oppressed by the former. The paid media and government controlled public information services repeatedly churn out lies and manipulate the facts to sustain the myth that women alone face discrimination and harassment. Such anti-human practices ensured that the men’s rights movements be the order of the day! The way feminists employed dirty tricks to project female victim-hood and create mass hysteria ensured that a counter movement came in existence to counteract them effectively. The purpose of men’s movement was not only to eliminate the propaganda and white lies of feminist but to ensure that manhood got the respect it deserved.

Fortunately, the movement has been recognized as an emerging force but it needs to cover a long distance creating bodies and institutions on par with ones born out of feminist movements. It needs to topple biased International bodies, which are promoting anti-societal tendencies in the name of emancipation of women. The average class of people, solely confined to livelihood may not be able to establish this great conspiracy, but MRAs need to understand this dangerous game. This great game involves likes of Arundhati Roy who says that “the feudal India has a huge history and legacy of disrespect and violence against women.” These so-called movers and shakers are systematically destroying cherished Indian institutions. Besides that they are also eroding the self-esteem of men’s community by continuously showing them in bad light.

Sounds True..

Sounds True..

 

“Feminism is the intellectual organization of gender hatred, just as Marxism was the intellectual organization of class hatred. Feminism’s business is fashioning weapons to be used against men in society, education, politics, law and divorce court. The feminist aim is to overthrow “patriarchal tyranny.” In this undertaking, the male’s civil rights count for no more than those of the bourgeoisie in Soviet Russia or the Jews in National Socialist Germany.” (‘What civil rights has wrought’ by Paul Craig Roberts, July 26, 2000).  Ruth Wisse, a Professor at Harvard University,  feels the same: “By defining between men and women in terms of power and competition instead of reciprocity and cooperation, the movement (read women’s liberation movement)  tore apart the most basic and fragile contract in human society, the unit from which all other social institutions draw their strength.’ These wise gentlemen make  it clear that men’s movement in India needs to be a perfect a mix of  intellectual movement in league with revolutionary ways of shaking the institutions.

After all, the men’s organizations are not only against powerful lobby supported by governments in covert and overt fashion but they are also fighting the hidden enemy- one without a face! An enemy that uses government information services like Doordarshan to indulge in Ardhasatya ( Half truths) in name of “Satayameva Jayate” ( Truth Alone Prevails). Sometimes back New Delhi was hit by a rape. A committee got formed, which invited views from representatives of women’s and men’s bodies. Most of the representations there vilified men, and naturally the final recommendations went against the men. That’s the way how laws are passed in other cases. So whether it’s defining sexual harassment or shaping criminal jurisprudence in laws pertaining to property rights, maintenance rights and etc. the final outcome is always against the interest of men. The mother of all questions is: Are advocates of men’s rights fully prepared to fight such a powerful faceless enemy? And that too amid horrible and hopeless situation. Anyway, this terrible question provides a great permanence to the significance of movements related with men’s rights!

In India, the road to success for men’s rights movement is filled with virtually insurmountable obstacles. That’s because a vast section of men lives in villages whose lives are closely connected with prejudices and age-old beliefs related with “aham ( ego), sampatti ( property) and aurat ( woman)”.  Coming to urban population, the society is chiefly divided into a great middle class and rich elite class. The former is deeply involved in struggles, pertaining to bread and butter, while the latter is completely submerged in ills flowing excess money supply. This class structure should make it very clear to MRAs that they need not to be sloppy while conveying the importance of having a movement for the rights of men. A lack of seriousness on their part might make their sincere efforts go in vain. After all, this age belongs to crude values hinging around materialism! So when you are advocating about finer values of newer types, like having a commission for men, one needs to demonstrate a high degree of logical precision side-by-side real seriousness. A louts emerges from mud. The associations related with men should borrow the spirit of lotus. Let them bloom amid such hopeless scenario. Instead of being discouraged, let’s use the disadvantages in our favor. That alone would keep the significance and relevance of men’s movement evergreen in a right way!

And these human rights have always been denied!

And these human rights have always been denied!

 

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