Category Archives: Krishna Bhazans

फगुआ की बयार मे भीगा भीगा सा मन, जरा जरा सा बहकता हुआ, जरा जरा सा सरकता हुआ

जय राधे! बरसाने की लट्ठमार होली ..महिला शशक्तिकरण वालो के लिए :P

जय राधे! बरसाने की लट्ठमार होली ..महिला शशक्तिकरण वालो के लिए :P


बसंत ऋतू का आगमन हो चुका है। बहकना स्वाभाविक है। गाँव में तो फगुआ की बयार बहती है। ग्लोबल संस्कृति से सजी संवरी शहरी सभ्यता में क्या होलियाना रंग, क्या दीपावली के दियो की ल़ौ की चमक। दोनों पे कृत्रिमता की चादर चढ़ चुकी है। या तो समय का रोना है या फिर महँगाई का हवाला या फिर जैसे तैसे निपटा कर फिर से घरेलु कार्यो/आफिस के कामकाज में जुट जाने की धुन। त्यौहार कब आते है कब चले जाते है पता भी नहीं चलता। ये बड़ी बिडम्बना है कि त्यौहार सब के लिए दौड़ती भागती जिंदगी में टीवी सीरियल में आने वाले दो मिनट के ब्रेक जैसे हो गए है। सब के लिए त्यौहार के मायने ही बदल गए है। अलग अलग उम्र के वर्गों के लिए त्यौहार का मतलब जुदा जुदा सा है। और मतलब अलग भले ही होता हो लेकिन उद्देश्य त्यौहार के रंग में रंगने का नहीं वरन जीवन से कुछ पल फुरसत के चुरा लेने का होता है।

इन सब से परे मुझे याद आते है कई मधुर होली के रंग। वो लखनऊ की पहली होली जिसमे कमीने तिवारी ने मेरी मासुमियत का नाजायज़ फायदा  उठाते हुए और लखनऊ की तहजीब की चिंदी चिंदी करते हुए मुझे रंग भरे टैंक में धक्का देकर गिरा दिया था। बहुत देर के बाद एक गीत उस तिवारी के लायक बजा है हर दोस्त कमीना होता है। तिवारी का नाम इस लिस्ट में पहले है। ये इतना मनहूस रहा है शनिचर की तरह कि हर अनुभव इसके साथ बुरा ही रहा है। बताइए बैंक के कैम्पस के अन्दर छुट्टी वाले दिन बैंक की चारदीवारी फांद कर हर्बेरिअम फाइल के लिए फूल तोड़ने का आईडिया ऐसे शैतानी दिमाग के आलावा कहा उपज सकती थी। गार्ड धर लेता तो निश्चित ही बैंक लूटने का आरोप लग जाता। वो तो कहिये हम लोग फूल-पत्तियों सहित इतनी तेज़ी से उड़न छू हुएं कि इतनी तेज़ी से प्रेतात्माएं भी न प्रकट होके गायब होती होंगी। गाँव की होली याद आती है जिसमे गुलाल तो कम उड़ रहे थें गीली माटी ज्यादा उड़ रही थी। पानी के गुब्बारों से निशाना साधना याद आता है। सुबह से सिर्फ पानी की बाल्टी और गुब्बारा लेकर तैयार रहते थें। याद आते है वार्निश पुते चेहरे, बिना भांग के गोले के ही बहकते मित्र, गुजिया पे पैनी नज़र। ये सब बहुत याद आता है। अपने मन को धन्यवाद देता हूँ कि मष्तिष्क का अन्दर इन यादो के रंग अभी भी ताज़े है।

स्मृतियाँ तकलीफ भी देती है और आनंद भी। इन्ही स्मृतियों में भींगकर पाठको को होली से जुड़े कुछ विशुद्ध शास्त्रीय संगीत पे आधारित ठुमरी/गीत जिनमे अपने प्यारे राधा और कन्हैय्या के होली का वर्णन है को सुनवा रहा हूँ। ये अलग बात है कि मेरे मित्रो के श्रेणी में इन गीतों को सुनने के संस्कार अभी ना जगे हो लेकिन  इन्हें स्थापित उस्तादों ने  इतना डूब कर गाया  है कि अन्दर रस की धार फूट पड़ती है। कुछ एक गीत चलचित्र से भी है, अन्य भाषा के भी है भोजपुरी सहित। इन्हें जैसे तैसे आप सुन लें अगर एक बार भी तो मुझे यकीन है कि संवेदनशील ह्रदय इनसे आसानी से तादात्म्य कर लेंगे हमेशा के लिए। और इसके बाद भी यदि शुष्क ह्रदय रस में ना भीग सके तो उनके लिए जगजीत सिंह का भंगड़ा आधारित गीत भी है। सुने जरूर। ह्रदय हर्ष के हिलोरों से हिल जाएगा।

गुजिया कम झोरते है तो क्या हुआ पैनी नज़र हमेशा रहती है इस पर :-)

गुजिया कम झोरते है तो क्या हुआ पैनी नज़र हमेशा रहती है इस पर :-)

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1. रंग डारूंगी,  डारूंगी, रंग  डारूंगी नन्द के लालन पे (पंडित छन्नूलाल मिश्र)

पंडितजी को सुनने का मतलब है आत्मा में आनंद के सागर को न्योता देने का सरीखा सा है। बनारस की शान पंडितजी से आप चाहे ठुमरी गवा लीजिये, कजरी गवा लीजिये, या ख्याल वो सीधे आपके रूह पे काबिज हो जाता है। ये किसी परिचय के मोहताज़ नहीं और ईश्वर की कृपा रही है कि प्रयाग की भूमि पर इनको साक्षात सुनने का मौका मिला है। ख़ास बात ये रहती है कि ये गीत के बीच में आपको मधुरतम तरीकें से आपको कुछ न कुछ बताते चलते है। और इस तरीके से बताते है कि आप सुनने को विवश हो जाते है। खैर इस बनारसी अंग में राधा जी ने अच्छी खबर ली है कृष्ण की। मुझे नारी बनाया सो लो अब आप नाचो मेरे संग स्त्री बन के। सुने कृष्ण का स्त्री रूप में अद्भुत रूपांतरण राधाजी के द्वारा होली के अवसर पर।

 
 
 
  2. होली खेलो मोसे नंदलाल 
  
डॉ गिरिजा देवी भी बनारस घराने से सम्बन्ध रखने वाली प्रख्यात शास्त्रीय गायिका है। इनको सुनना भी आत्मा के ऊपर से बोझ हटाने सरीखा है। सुने तो समझ में आएगा कि राधाजी किस तरह से कृष्ण को भिगोने के लिए व्याकुल है कि आग्रह लगभग मनौती सरीखा बन गया है।
 
 
3. होरी खेलन कैसे जाऊं ओ री गुइयाँ 
 
शोभा गुर्टू को मैंने बहुत सुना है और जितनी बार भी सुनता हो तो लगता है कि एक बार और सुन लूँ। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में पारंगत इस गायिका को ठुमरी क्वीन भी कहते है। इनको फिल्मो में भी सुनना बहुत मधुर अनुभव है। “सैय्या रूठ गए” (मै तुलसी तेरे आँगन की) आप सुनिए तो आपको समझ में आएगा। वैसे इस मिश्र पीलू पे आधारित ठुमरी में राधा की उलझन दूसरी है। यहाँ प्यारी राधा उलझन में है कि होली खेलने कैसे जाऊं क्योकि कृष्ण सामने रास्ता छेंक कर खड़े है। इसी झुंझलाहट का चाशनी में भीगा वर्णन है। 
 
 
4. कौन तरह से तुम खेलत होली

संध्या मुखर्जी को मैंने पहले नहीं सुना। इस लेख को लिखने के दौरान इनको सुनने का सौभाग्य मिला। बंगाली संगीत में निपुण इस गायिका की आवाज़ मन में घर कर गयी। उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खान की शिष्या बंगाली फिल्मो सहित हिंदी फिल्मो के लिए भी गीत गाये। इस शास्त्रीय गीत को सुनने के बाद आपको राधाजी का किसी बात पे रूठना याद आता है। कोई शिकायत जो अभिव्यक्त होने से रह गयी उसी की खीज इस गीत में प्रकट हो रही है।  दर्द है तो प्रकट होगा ही। इसमें कौन से बड़ी बात है लेकिन ये क्या कि आप फगुआ की बयार में बहने से इन्कार कर दे? शिकायत दूर कर के होली जरूर खेले मै तो बस यही कहूँगा। 


 
5. होली खेलेछे श्याम कुञ्ज 
     
पंडित अजोय चक्रबोर्ती को सुना है शास्त्रीय संगीत को सुनते वक्त और तभी से जब कभी मौका मिलता है सुन जरूर लेता हूँ। इनकी ठहराव भरी आवाज़ मन के किसी कोने में अटक कर रह गयी है। ख्याल गायन हो या ध्रुपद या भजन गायिकी हो सब पे लगभग बराबर सा अधिकार रखते है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित इस गायक ने बंगाल के बाहर भी अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा है। इतना मीठे तरीक़े से कृष्ण के होली खेलने का वर्णन किया है कि बंगाली भाषा में होने के बावजूद इसका भाव ह्रदय के तार झंकृत कर गया।

 
 
6. अरी जा रे हट नटखट    
  होली पे मुझे तो वैसे अक्सर ये गीत “होली आई रे कन्हाई” (मदर इंडिया) याद आ जाता है लेकिन ये गीत कम बजता है। बहुत मधुर गीत है। व्ही शांताराम के फिल्मो के ये विशेषता रही है कि भारतीयता के सुंदर पक्षों को उन्होंने बड़े कलात्मक तरीके से उकेरा है हम सभी के चित्तो पर। नवरंग के सभी गीत बेहद सुंदर है जैसे “श्यामल श्यामल वरन” और “आधा है चन्द्रमा रात आधी” लेकिन कृष्ण और राधा के होली प्रसंग पर आधारित गीत कालजयी बन गया। कौन कहता है कि भारतीय स्त्री बोल्ड नहीं रही? देखिये क्या कह रही है राधा इसमें जिसको जीवंत कर दिया संध्या के सधे हुए नृत्य की भाव भंगिमाओ ने। महेंद्र कपूर और आशा भोंसले ने गीत में स्वर दिया है। संगीत सी रामचंद्र का है और गीत हिंदी गीतों को शुद्ध हिंदी के शब्द देने वाले भरत व्यास का लिखा है। 

 
7. प्यार के रंग में सैय्या रंग दे मोरी चुनरिया 
 
दुर्गेश नंदिनी 1956 में प्रदर्शित हुई थी। बंगाली जगत में इसी नाम से बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का प्रमुख बंगाली उपन्यास है। वैसे इस फिल्म के ये गीत “कहा ले चले हो बता दो ए मुसाफिर” तो बहुत बार सुना है लेकिन ये मधुर होली गीत लताजी की आवाज में कम सुना गया है। हेमंत कुमार का सौम्यता से परिपूर्ण संगीत है और राजिंदर क्रिशन का गीत है।
 
8. जोगी रे धीरे धीरे

नदिया के पार ने ऐतहासिक सफलता प्राप्त की थी भोजपुरी में होने के बावजूद। रविन्द्र जैन का गीत और संगीत मील का पत्थर बन गया। और यही से भोजपुरी संगीत ने एक नयी उंचाई प्राप्त की लेकिन ये अलग बात है उस मूल तत्त्व से भटक गया जिसके दर्शन इस फिल्मो के गीतों में हुए है।  भारतीय फिल्मो  में गाँव कभी भी असल तरीके से प्रकट नहीं हुआ। ये कुछ उन विलक्षण फिल्मो में से एक है जिसमे गाँव ने अपनी आत्मा को प्रकट किया है अपने कई मूल तत्वों के साथ।

 
9. कौन दिशा में लेके चला रे बटुहिया

 

 इस गीत को सिर्फ इसलिए सुनवा रहा हूँ कि इस गीत में मेरे गाँव का स्वरूप बिलकुल यथावत तरीकें से प्रस्तुतीकरण हुआ है। इस में दीखते रास्ते, पगडण्डीयाँ, खेत, नदी बिलकुल अपने गाँव सरीखा है। गीत के बीच में आपको पालकी पे विदा होती दुल्हन भी दिख जायेगी। क्योकि पालकी पे सवार होकर कभी दुल्हन को विदा होते हुए होते देखा था सो इस युग में जहाँ पे सजी धजी कार में दुल्हन को  भेज़ने की नौटंकी होती है वहां ये दृश्य आपको बिलकुल भावविभोर कर देता है। खैर गीत सुने जो बहुत मधुर है ऐसा शायद बताने की जरुरत ना पड़े। ये बताने की जरुरत अवश्य पड़ सकती है कि गीत को गाया  है हेमलता और जसपाल सिंह नें। 

 
10. गोरिया चाँद के अजोरिया 

 

मनोज तिवारी की आवाज में ये भोजपुरी गीत मन को भाता है। ये अलग बात है कि गीत को भोजपुरी गीतों में व्याप्त लटको झटको जैसा ही फिल्माया गया है। वही रंग बिरंगी परिधानों में कूदती फांदती स्त्रिया जो गीत के साथ न्याय नहीं करती प्रतीत होती। फिर भी हरे भरे  खेत मन में उमंग को जगह तो दे हे देते है। भाग्यश्री “मैंने प्यार किया” के बाद लगभग गायब ही हो गयी। मैंने प्यार किया जैसी वाहियात फ़िल्म मैंने देखी नहीं सो बता नहीं सकता कि ये टैलेंटेड है कि नहीं लेकिन जहा तक इस गीत की बात है गीत में इनकी उपस्थिति से चार चाँद तो लग ही रहे है लुक्स की वजह सें। खैर इतने दिनों बाद देखना इस एक्ट्रेस को और वो भी एक भोजपुरी गीत में एक सुखद आश्चर्य है।

 
11. लारा लप्पा ( जगजीत सिंह)

लारा लप्पा “एक थी लड़की” से बहुत ही सुंदर गीत है। इसी के खोज में ये जगजीत सिंह का ये पंजाबी गीत हाथ लग गया। इसको जगजीत सिंह ने जिस चिरपरिचित दिलकश अंदाज़ में गाया है उतने ही कमाल के तरीकें से इनके साजिंदों ने बजाया है। निश्चित ही सुनने योग्य गीत अगर आप चाहते है कि आप का दिल बल्ले बल्ले करने पे मजबूर हो उठें। वैसे इस गीत के शुरू में मजनू ने अपनी लैला को काली कहने वालो की दृष्टि को गरियाया है सभ्य तर्कों के साथ वो भी सुन लें। हम तो भाई मजनू से बस इतना ही कहेंगे कि जो बकते है उनको बकने दो काहे कि “यथा दृष्टि तथा सृष्टि” ( जैसी हमारी दृष्टि होती है, वैसी ही यह सृष्टि हमें दिखती है)

राधा कृष्ण के प्रेम की याद दिलाता होली। उनके सखा सखियों, उनके गौओं, बछड़ो सबकी याद दिलाता :-)

राधा कृष्ण के प्रेम की याद दिलाता होली। उनके सखा सखियों, उनके गौओं, बछड़ो सबकी याद दिलाता :-)

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Kundal Lal Saigal: A Singer Who Sang Like A Divine Being

 

K.L. Saigal:  Invoking Sound Of Heaven

K.L. Saigal: Invoking Sound Of Heaven


Some souls are reflection of divinity. The great singer Kundal Lal Saigal was one such soul, who manifested divinity in a great way. In fact, true artists are never devoid of divine touch. Creativity cannot emerge from mental landscape not submerged in ocean of divinity. I belong to a generation, which believes in worshiping new icons of modernity. For them these legendary creative artists of yesteryear might not seem that appealing but anyone who have had glimpse of their creativity would certainly stand amazed. 

The noticeable thing about K. L. Saigal  was that he managed to sing straight from the heart. This phrase seems so commonplace but not many realize that how difficult it is to demonstrate it in practical terms. That’s because shades of ego block our ability to exhibit true colour of simplicity. The complex persona creates blockade. One reason why K. L. Saigal could stir the emotions was that deeper emotions were so naturally rendered by him without compromising with the raga and raginis.

It’s really surprising that at a time when Indian film music was still in its nascent stage of growth, it traced such a sensational singer, which set high standards in world of popular music, hard to emulate by future singers. The influence of his voice can be understood by the fact that even likes of Amitabh Bachchan came to praise him. The singers like Lata,  Rafi and Kishore, all treated him like demigod. Mukesh, was, in fact,  very sincere follower of his style of singing, who found it difficult to develop his own style. After mesmerizing everybody with his “Dil jalta hai to jalne de”, sung in Saigal style, Mukesh went on to develop his own style of singing.

His impact can also be felt in crude way in modern times when someone made caricature of his voice to sell a particular brand of toothpaste! Of late, I found one singer paying tribute to him in infamous movie Delhi Belly! Not many remember that Kishore Kumar treated K L Saigal as his Guru (The Master). He always practiced singing his songs and when he first met Saigal, he was asked by the legendary Saigal to sing a song. He sang one of his songs ” Man moorakh kyo deewana hai, aaj rahe kal jaana hai”. Saigal was very impressed by his singing but he suggested him that he should remove “Anga Dosha” (defects associated with body). Kishore used to sing with vigorous body movements also in action! Though Kishore Kumar did not strictly followed his advise but he managed to keep his body still while singing songs of Saigal in later days! 

Coming to myself, I have nearly heard all his popular numbers. His songs instill deep peace within me. His amazing range and soulful rendering enabled me to get above the harsh episodes of life in effortless manner. His song sung during the fag end of his career, “Gham Diye Mustaqil” (Shahjahaan, 1946), always brings tears in the eyes. The superb rendering, which also reflected his own personal sufferings, makes one attain trance like state. Another song, which left an everlasting influence on me is from movie Tansen (1943): Kahe Guman Kare. Every time I hear it, the simplistic approach adopted by Saigal in this song makes me smile. After all, the singer is trying hard to convince a beautiful woman not to take pride in her  beauty!

I still remember the day when I found a very rare album of Saigal in one lesser heard music shop of my city. That shop was not frequently visited by the buyers since the shopkeeper was not customer-friendly, who always had heated argument over the price of cassettes. The fight also started with me when he priced this cassette three times the original price on a pretext that it was a rare album. Though I had not sufficient money, I still managed to buy this album! After all, it had a soothing devotional song associated with Lord Krishna: Suno Suno Hey Krishan Kala ( Chandidas, 1934). One can notice in this song that Saigal has sung high notes in effortless manner, without compromising with the depth of the emotions.

It’s a peculiar phenomenon that souls, governed by divine instincts, often leave the earthly plane of existence in an young age. K L Saigal also proved to be no exception when he died at the age of 42. The lesser souls speak about his habit of  heavy drinking but that’s the way how worldly people treat exceptional souls. For me and others, he shall always be remembered for making songs a mean to invoke divinity.


Reference:

K. L. Saigal

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The Bhagavad Gita: Gateway to ineffable peace and bliss

Lord Krishna: The Ultimate Goal

Lord Krishna: The Ultimate Goal

The messages of Krishna offer great solace to us in present times marred by confusion and disorder of worst types. I know it’s one of the easiest tasks to read the great words. It’s proper reflection and subsequent action plans that really matters in the long run.  However, such shortcomings on part of human beings do not make these words lose relevance. Even a casual approach on our part while dealing with these pearls of wisdom proves to be a meaningful gesture.
 

A beginning is something that really matters. It’s better to be part of the journey than remain always trapped in a statue mode. In most cases, the beginning is often in the form of casual interactions with words spoken by enlightened souls. Have you noticed that when we are journeying we often read great messages posted on walls of railway stations? You are in great hurry but even then these words manage to catch your attention. From that very moment a reflection takes place birth inside your mind which if given conscious direction on part of us could lead to miraculous transformation.

So on this occasion when the world is celebrating the birth of Lord Krishna, let’s try to reconnect with Him for one more time via his messages. In lighter vein, Lord Krishna is representative of Absolute Self that’s above birth and death, and still we celebrate his birth with great fanfare. But is it that easy to keep the great charmer Krishna away from one’s life whose very name means the one who has power to attract us-the attractive one?
 

In the end, I wish to quote the words of Sri Aurobindo Ghosh to make us aware of the worth of messages spread in The Bhagavad Gita. According to Sri Aurobindo Ghosh one should always remember Krishna’s teaching because it ensures “perfection of action. It makes man great. It gives him the utter strength, the utter bliss which is the goal of life in the world.
 

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yajna-dana-tapah-karma
na tyajyam karyam eva tat
yajno danam tapas caiva
pavanani manisinam  

-Bhagavad Gita 18.5 

“Acts of sacrifice, charity and penance are not to be given up; they must be performed. Indeed, sacrifice, charity and penance purify even the great souls.”

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manushyanam sahasresu
kascid yatati siddhaye
yatatam api siddhanam
kascin mam vetti tattvatah

-  Bhagavad Gita 7.3 

“Out of many thousands among men, one may endeavor for perfection, and of those who have achieved perfection, hardly one knows Me in truth.” 

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gatir bharta prabhuh saksi
nivasah saranam suhrt
prabhavah pralayah sthanam
nidhanam bijam avyayam

-  Bhagavad Gita 9.18 

“I am the goal, the sustainer, the master, the witness, the abode, the refuge, and the most dear friend. I am the creation and the annihilation, the basis of everything, the resting place and the eternal seed.”

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ananyas cintayanto mam
ye janah paryupasate
tesham nityabhiyuktanam
yoga-ksemam vahamy aham

-  Bhagavad Gita 9.22 

“But those who always worship Me with exclusive devotion, meditating on My transcendental form—to them I carry what they lack, and I preserve what they have.”

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tvam aksharam paramam veditavyam
tvam asya vishvasya param nidhanam
tvam avyayah sasvata-dharma-gopta
sanatanas tvam purusho mato me

 -  Bhagavad Gita 11.18 

“You are the supreme primal objective. You are the ultimate resting place of this entire universe. You are inexhaustible, and You are the oldest. You are the maintainer of the eternal religion, the Personality of Godhead. This is my opinion.”

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yam hi na vyathayanty ete
purusham purusharsabha
sama-duhkha-sukham dhiram
so ’mrtatvaya kalpate

 -Bhagavad Gita 2.15 

“O best among men [Arjuna], the person who is not disturbed by happiness and distress and is steady in both is certainly eligible for liberation.”

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daivi hy esa guna-mayi
mama maya duratyaya
mam eva ye prapadyante
mayam etam taranti te

 -  Bhagavad Gita 7.14 

“This divine energy of Mine, consisting of the three modes of material nature, is difficult to overcome. But those who have surrendered unto Me can easily cross beyond it.”

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tam eva saranam gaccha
sarva-bhavena bharata
tat-prasadat param shantim
sthanam prapsyasi sasvatam

 -  Bhagavad Gita 18.62 

“O scion of Bharata, surrender unto Him utterly. By His grace you will attain transcendental peace and the supreme and eternal abode.”

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References:

The Bhagavad Gita

The Bhagavad Gita

Wiki

Voice Of Dharma

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Unfolding the Magic Of K L Saigal: The Evergreen Golden Voice

Unfolding the Magic Of K L Saigal: The Evergreen Golden  Voice

There are many mysteries in the world whose real elements keep eluding us. It’s beyond human intellect to comprehend the making of such mysteries with our limited human understanding. The enchanting voice of K L Saigal which refuses to lose its appeal, having transcended many generations since it first appeared in early 30s, is one of the karishmas (miracles) nature brought in existence.  One is filled with awe and wonder on noticing that with changes in world of music coupled with changes in taste of youngsters the voice of K L Saigal keeps making its presence felt. If that’s not the case what was the need to have a spoof on K L Saigal’s voice in Delhi Belly(2011) via Chetan Shashital’s Saigal Blues?

Let’s not try to analyze the charm inherent in the voice but let’s try to feel it within. That’s the only way to realize the elements which have immortality to songs sung by K L Saigal. In my eyes, one of the greatest factors that his voice never fails to deep lasting impressions on the listeners is that these songs have been rendered in amazingly simple manner. It appears that emotions of hearts are manifesting in a rhythmic way without being influenced by the impurities existing in the mental plane. When I delve deep into the K L Saigal’s magic it becomes evidently clear that his voice was the medium to unfold our own divinity lying in latent form within us.

We are potentially divine in nature no matter what’s the level of our materialistic association. Any happening that helps us to connect with us divinity within is sure to retain its appeal and charm. That’s the case with Saigal’s songs too. These songs help us to attain meditative pose. They let us move into newer realms of thought patterns- the ones closest to divine plane. Even people who just cannot identify themselves with songs sung by K L Saigal shall be deeply influenced by his silver screen presence. Notice him on the silver screen. This tall guy with ocean like depth eyes and face wrapped in innocence appears some Gandharva ( male spirit who facilitates communication between the gods and humans) having lost his way and landed on our planet earth !

It’s time to listen some of his songs to realize that what we today listen is not music but mere cacophony of harsh voices. These songs I have been hearing since early 80s. Listen these great songs to realize that to be simple is to be divine. Hear these songs to realize that there was an age when humans knew the art from speaking straight from the heart- the rarest of rare art in our times when complexities rule the roost !

1. Madhukar Shyam Humare Chor ( Bhakta Soordas, 1942)

2. Suno Suno He Krishna Kala (Chandidas, 1934)

3. Kahe Guman Kare ( Tansen)

4. Gham Diye Mustaqil (Shahjehan, 1946)

5. Do Naina Matware (My Sister)

6. Karun Kya Aas Nirash Bhai
(Dushman, 1939)

Unfolding the Magic Of K L Saigal: The Evergreen Golden  Voice

References:

K L Saigal

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जगजीत सिंह: तुम चले गए तो गुमसुम सा ये जहाँ है !!!

जीवन क्या है ? चलता फिरता एक खिलौना है..

जीवन क्या है ? चलता फिरता एक खिलौना है..

“अब  यादों  के  कांटे  इस  दिल  में  चुभते  हैं  
ना  दर्द  ठहरता  है  ना  आँसूं   रुकते  हैं” .

इस वक्त जगजीत सिंह के सुननेवालो और चाहनेवालो का यही हाल होगा. सबको अपने गीतों, ग़ज़लों और भजनों से एक रूहानी शान्ति प्रदान करने वाले की आत्मा आज खुद इंसानी चोला छोड़कर परम शान्ति में विलीन हो गयी. इस सत्य से हम सब परिचित है कि एक दिन हम सबको जाना है पर सब के दिलो पे राज करने वाले का यूँ चले जाना तकलीफ देता है. कोई  जड़ भरत की तरह इतना निर्लिप्त तो नहीं रह सकता ना कि कोई अपना चला जाए और आप की आँख से दो आंसू भी ना गिरे. गुलज़ार जी कहना बिल्कुल सही है कि “जगजीत का जाना, एक पूरी दुनिया का उठ जाना है इक पूरे दौर का उठ जाना है .” उनके चले जाने के बाद जिस रिक्तता का अनुभव हम सब को हो रहा है उसकी पूर्ती करना आसान नहीं. 

जगजीत सिंह ने जब गायकी की दुनिया में प्रवेश किया तो उनको भी उन्ही मुसीबतों का सामना करना पड़ा जो हर एक सच्चे कला के पुजारी के सामने आ खड़ी होती है.  नाकामी और असफलताओ से खिन्न आकर वे अपने घर जालंधर को लौट आये मुंबई से जहा पे वे उस वक्त पढ़ते थे और एक प्रोफेशनल  गायक के तौर पे रेडिओ से जुड़े भी थे. पर किस्मत ने इनके लिए कुछ और ही सोच रखा था. कुछ अंतराल के बाद ये फिर मुंबई लौटे और  एच एम वी के साथ कुछ एक दो गाने रिकार्ड कराने के बाद इसी कंपनी द्वारा इनका पहला एल पी  “द अनफ़ोरगैटेबल्स ” ( The Unforgettables) निकला. इसके बाद जगजीत ने पीछे मुड़ के नहीं देखा और मौत के पहले तक इतना काम किया कि गुलज़ार ने अपनी श्रद्धांजली में इस बात को महसूस किया कि शायद जगजीत सिंह ने अपने शरीर को आराम नहीं दिया.

जगजीत सिंह ने भोजपुरी, उर्दू,  पंजाबी आदि भाषाओ में खूब गया. एक समाचार पत्र  के हवाले से मुझे पता चला कि इलाहाबाद से उनका लगाव बहुत गहरा था क्योकि यही से उन्होंने भारतीय संगीत संस्थान प्रयाग संगीत समिति से गायन में प्रभाकर की डिग्री प्राप्त की थी. अभी मौत से कुछ महीनों पहले ही इलाहाबाद में एक कार्यक्रम करके गए थे. ये अपने में एक विलक्षण बात थी कि जिस ऊंचाई को उन्होंने पहले एल्बम से हासिल किया वे अंत तक बरक़रार रही. कला के दुनिया में ये एक विलक्षण घटना है .क्योकि सत्तर के दशक से अब तक के संगीत में ना जाने कितने बदलाव हुए और लोगो के पसंद और नापसंद करने का तरीका भी बहुत बदला. मगर इन सब के बीच अविचलित से जगजीत सिंह एक के बाद एक ह्रदय को झकझोर कर रख देने वाले एल्बम निकालते चले गए. ये कहना गलत नहीं होंगा कि चित्राजी का उनके जीवन में जीवन संगिनी के रूप में आना उनके संगीत यात्रा को एक नयी ऊंचाई दे गया. इन दोनों के संयुक्त रूप से जारी एल्बम श्रोताओ के बीच खासे लोकप्रिय हुए.
 
ऐ साउंड अफैअर (A Sound Affair),  पैशन्स (Passions) बियोंड टाइम (Beyond Time) , होप (Hope)  , इन सर्च (In Search) , इनसाईट (Insight) , फेस टू  फेस (Face To Face) , मरासिम (Marasim ) , मिराज (Mirage) , विशंस (Visions) , लव इस ब्लाइंड ( Love Is Blind) , सजदा (Sajda) , सहर ( Saher)   और चिराग (Chirag)  ऐसे कई हिट एल्बम जगजीत सिंह के आये जिनमे चित्राजी और जगजीत सिंह की गायी  ग़ज़लों ने लोगो का मनमोह लिया. जगजीत सिंह की  लम्बी पारी खेलने की वजह ये रही कि जो संगीत यात्रा उन्होंने बेगम अख्तर , मेहँदी हसन और ग़ुलाम अली के दौर से शुरू की उसको हमेशा वो साधना से मांजते रहे. उन्होंने ग़ज़ल को बोझिल परंपराओ से, उसके अपने सीमित दायरों से बाहर निकालकर साधारण जन में लोकप्रिय बनाया. सुनने में आसान लगता है पर वास्तव में ये एक बहुत कठिन कार्य था.  खासकर उस पीढ़ी में जो ग़ज़ल सुनने या सुनाने  के नाम पे नाक भौ सिकोड़ने लगती है. आप ये समझिये कि जगजीत साहब ने बिल्कुल नए पैमाने और तौर तरीको को जन्म दिया जिसमे ग़ज़ल गायिकी सतही मैखानो और जाम से मुक्त हुई.  उन्होंने अपनी लगन से आधुनिक वाद्य यन्त्र और प्राचीन वाद्य यन्त्र दोनों का बेहतरीन संगम करके यादगार धुनें दी जिन्होंने ग़ज़ल को लोकप्रिय तत्त्व प्रदान किया. जगजीत सिंह के बारे में ये कहा जाता है कि इन्हें मधुर धुनें तैयार करने  में कोई ख़ास दिक्कत नहीं आती थी.  इसके पीछे वजह यही थी इनको संगीत की समझ गहरी थी और इस गहरी समझ के बाद भी ये रियाज में कंजूसी नहीं करते थे. लिहाज़ा जो भी काम इन्होने किया वो अपनी एक अलग छाप छोडता चला गया. 
 
अब देखिये कि उनकी इस लम्बी पारी के इस अवधि में कितने अच्छे  ग़ज़ल  गाने वाले आये मगर वो बदलते दौर में अपने को ढाल नहीं पाए और कुछ एक दो एल्बम को देकर वो गुमनामी में खो गए पर जगजीत सिंह के साथ ऐसा नहीं हुआ. क्योकि वे हद से अधिक सचेत थें. उन्होंने श्रोताओ के मूड को हमेशा ध्यान में  रखा पर साथ में ये भी ध्यान रखा कि वे इतना परिवर्तनशील ना हो जाए कि गुणवत्ता कही खो जाए. जगजीत सिंह के सफल होने का  राज ये भी था कि वे एक सच्चे कलाकार की तरह बेहद संवेदनशील थे लिहाजा उन्होंने बहुत ही बेहतर शायरी का चाहे वो किसी गुमनाम शायर की हो या किसी मशहूर बन्दे के कलम से निकली हो का इस्तेमाल किया. निदा फ़ाज़ली , सुदर्शन फाकिर, गुलज़ार , ग़ालिब , फिराक गोरखपुरी जैसे शायरों की सुंदर ग़ज़लों को बेहतरीन धुनों में सजाकर जो लड़ी उन्होंने बनायीं वो हर भावुक इंसान के दिलो दिमाग पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ गया. जगजीत सिंह ग़ज़लों के चुनाव में  कितना सजग रहते थे सुनिए उनके ही शब्दों में  जो  बी बी सी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा : ” सबसे पहले तो देखता हूँ की ग़ज़ल की भाषा सरल हो और जो शायर कहना चाहता है कहने में सफल हुआ हो. ग़ज़ल प्रेम पर हो या फिर उनमे कोई चौंकाने वाला तत्व हो, ज़िंदगी के क़रीब हो, उस में अश्लीलता नहीं होनी चाहिए. मुख्यतः मैं इन्हीं बातों का ध्यान रखता हूँ.”
 
जगजीत सिंह के बारे में शुरू शुरू में लोग कहते थें कि फिल्मो में आवाज उनकी  नहीं सूट करती. इस भ्रम को उन्होंने अर्थ, साथ साथ, प्रेमगीत और बाद के सालो में दुश्मन,  तुम बिन, जॉगर्स पार्क और सरफ़रोश में एक से बढ़कर एक ग़ज़ले गाकर तोडा. अगर हम छोटे परदे की बात करे तो दूरदर्शन के लिए “मिर्ज़ा ग़ालिब” और नीम का पेड़ धारावाहिक के लिए उनका योगदान उनके संगीत सफ़र में खासा महत्त्व रखता है.  उल्लेखनीय बात ये है कि जिस तरह डूब के वे ग़ज़ले गाते थे उसी तरह से वे भजन भी गाते थे..अक्सर ये होता है कि ग़जल गानेवाले भजन गायिकी में इतने उभर के नहीं आ पाते पर जगजीत सिंह ने ये भी कर दिखाया  एक से बढ़कर एक आत्मिक शांति  देने वाले भजन संग्रह  निकल के. कृष्ण भज़नो पे आधारित इनकी भजन श्रंखला काफी लोकप्रिय हुई जैसे मोक्ष,  जय  राधा  माधव ,  सांवरा समर्पण ,  हरे  कृष्ण  हरे  राम ,  हरे  कृष्ण , राधा  बल्लभ  कुञ्ज  बिहारी .  इसके आलावा ध्यान योग पे आधारित एल्बम और माँ के भजनों का एक संग्रह “माँ  ” जो अरबिंदो सोसाइटी से सम्बद्ध है  भी काफी प्रसिद्ध हुआ..
अंखिया  हरी दर्शन की प्यासी !!

अंखिया हरी दर्शन की प्यासी !!

जगजीत सिंह काफी सचेत रहते थे और इसलिए वे काफी बेबाक भी थे. उन्होंने एक विदेशी चैनल को दिए साक्षात्कार में इस बात को साफ़ साफ़ कहा कि ग़ज़ल गायिकी का स्तर भारत और अन्य जगह काफी गिर रहा है और जिस तरह से हर माध्यम से घटिया चीज़ संगीत के नाम पे बांटी जा रही है उससें समझ में आता है कि कुछ ना कुछ गलत तो है ज़रूर. वे आजकल के संगीत को शोर मानते थे. यही वजह है कि ऐ आर रहमान के यांत्रिक संगीत की उन्होंने साफ़ तौर पे आलोचना की. और ये सच भी है कि आइटम नंबर के दौर में कम्पूटर आधारित संगीत बिल्कुल  टीन कनस्तर पीटने के समान हो गया है. संगीत की आत्मा लगता है इस लोक से निकलकर दूसरे लोक में चली गयी है..

चलते चलते अपने अंतर्मन में दबी  गहरी संवेदनाओ  को उभारना चाहूँगा जिसको निखारने में जगजीत सिंह की गज़लों ने उत्प्रेरक का काम किया. जगजीत सिंह की गज़ले सम्पूर्ण जीवन दर्शन को अच्छी  तरह से परिभाषित करती है. बचपन से शुरू करे तो क्या आपको लगता है ” वो कागज़ की कश्ती” से भी बेहतर कोई संगीतमय रचना हो सकती है जो बचपन को इतना यादगार बनाती हो ? ये रचना देखी जाये तो अलग से मील का पत्थर है. यौवन काल की तरफ बढे तो उस दौर को याद करे जब हम प्रेम के पहले अहसास को महसूस करते है और उसे प्रेम पत्र के रूप में उभारते है तो क्या हमको ये ग़ज़ल नहीं याद आती “प्रेम का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है ”  या ये बात नहीं याद आती ” तेरा चेहरा कितना सुहाना लगता है ” . दोस्ती के ही बदले हुए स्वरूप को हम याद करे तो क्या इस ग़ज़ल में जो सीख है  उसकी हम उपेक्षा कर सकते है “दोस्ती जब किसी से की जाये, दुश्मनों की भी राय  ली जाये” ..और जब ये दोस्ती टूट जाए तो क्या हम ये ग़ज़ल नहीं गुनगुनाते : “ तुमने दिल की बात कह दी ये बड़ा अच्छा किया, हम तुम्हे अपना समझते थे बड़ा धोखा  हुआ“. 

जीवन  में जब हम और आगे बढ़ते है और जीवन की कडुवी सच्चाइयो से आमना सामना होने पर हमारे सपने टूट कर बिखरते है तो क्या हम ये नहीं महसूस करते ”  दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है ” और फिर यही एहसास हमारे साथ रह जाता है ” शायद मै ज़िन्दगी की सहर लेके आ गया…अंजाम  ये  के  गर्दे  सफ़र  ले  के  आ  गया“.  इन आत्माओ के संपर्क में रहने से ही शायद मै आज कह पाने में  सक्षम हूँ  “बदला ना अपने आपको जो थे वोही रहे” 

इस बहुत भली सी आत्मा को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि ..आपके लिए जगजीतजी इस वक्त मेरे मन में कुछ और नहीं बस आपकी यही ग़ज़ल कबसे गूँज रही है : “ सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ  मै” 

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इसमें मैंने बहुत सी ग़ज़लों का जिक्र किया है. ये सब तो मेरे दिल के करीब है पर ये रहे कुछ और ग़ज़ल /भजन जो मुझे बहुत पसंद है. 

. या तो मिट जाइए या मिटा दीजिये 

. तेरे आने की जब खबर महके 

.उस मोड शुरू करे फिर ये ज़िन्दगी 

. आदमी आदमी को क्या देगा 

 
 
 
 
 
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Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

It’s never an easy task to pay tribute to great maestros. They have so many shades, which remains elusive from the normal human eyes. Jagjit Singh, the legendary Ghazal singer with infinite beautiful shades, left the world quietly, leaving his fans caught in the fervour of celebrations virtually stunned. It’s hard to believe that he is no more with us. He was recovering fast but ultimately death like always had the last laugh. The icy hands of death prevailed over the wishes of his lovers, proving that nature wanted this singer to give eternal peace. The same peace which his ghazals, songs and bhazans provided to millions of listeners spread across the globe.

Jagjit Singh burst upon the ghazal scene like a whiff of fresh air in the seventies and shattered the established norms associated with the ghazal singing. There were big names like Mehadi Hassan, Ghulam Ali, Farida Khanum and Noorjehan but their appeal was restricted to certain class. Let’s also not forget that seventies was age of transition for music world. The western beats were fast replacing traditional appeal and, therefore, making room for qualitative singing was a difficult task. In fact, the early experiences of Jagjit Singh, were bitter ones in the world of Mumbai. This man who sang shabads in Gurudwaras in his early days of singing met with series of bad happenings in an attempt to carve a niche for himself in the Mumbai. He went back to his hometown with heavy heart but he was born to become successful so after a gap he made fresh attempts. The big break came in form of ” ‘The Unforgettables’ and after that there was no looking back for him. Happily he found a sweet partner in form of Chitra Singh. This highly popular duet team gave us number of popular albums like “Someone Somewhere”, “Ecstasies” , “Emotions” , ” A Sound Affair”, “Live at Wimbley” and ” A Milestone”, to name a few.

We need to understand what made them gain such a terrific mass appeal. It was their intimate deep bond with music which made them make a permanent inroad in the hearts of the listeners. They came to be aware of the fact that unless ghazal singing is subjected to new changes both content wise and music wise it would be hard to retain the existence of ghazal among the listeners. However, in the name of changes, he didn’t gave way to gimmicks. His subtle understanding of the music prevented him giving way to lesser traits. Ultimately, he roped in better poetry from both well known names and lesser known names. However, he ensured that selected ghazals conveyed their emotions in simpler language.

As a result of his fine selection, the fine poetry from some well known names like Dr. Bashir Badr, Sudarshan Fakir, Qateel Shifai, Gulzar and Javed Akhtar became hot favourite in Indian households. However, the ghazals became everlasting because of his unique ability to synthesize modern beats with traditional Indian instruments. He has the uncanny ability to create catchy tunes. Probably, his rigorous musical sadhana (practice) paid him rich dividends as he moved ahead in the musical journey.

Remember his ghazal Woh Kagaz Ki Kashti“? This masterpiece became a darling of the masses. Now anybody interested in taking a step back in time to his childhood had to anticipate this ghazal. For love birds, his ghazals served as surest means to convey their emotions. In fact, I am myself guilty of reaching to conclusions if I hear a young person listening his ghazals that he/she is in love!! One need not forget that ghazals gained prominence in Hindi movie world with his arrival. The albums “Saath Saath” and “Arth” are still the most sought after albums in the music stores across the globe. A fact that I came to be aware of when I interviewed many music shop owners way back in late nineties for one of my articles.

Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

Apart from making ghazals popular in movies, the T V portrait related with great Urdu poet Mirza Ghalib attained huge popularity when Ghalib’s ghazals rendered in soulful manner attained a new dimension. May be his golden voice did justice to whatever he came to sang- something that kept him a busy soul till the end of his life’s journey. It’s no secret that how many great ghazal singers lost their relevance in age dominated by cheap gimmicks. So if Jagjit Singh, managed to dictate the rules and worked on his own terms with no compromise, then that in itself is a great achievement.

The tribute would be incomplete if I fail to mention about his bhazans. His tender mellifluous voice gave birth to innumerable beautiful bhazans. His Krishna series with Chitra Singh including albums like Bhajan (HMV), Hare Krishna Hare Rama,Hare Krishna..Hare Krishna, Jai Radha Madhav, Mokasha-Sri Krishna, Saanwara, Hare Krishna and Radha Ballabh Kunj Bihari, to name a few, became great hits. For a huge section of listeners he is more popular as a bhazan singer than a ghazal singer. The wonderful synthesis of western and Indian musical notes worked wonders in bhazan singing as well.

This man was a fearless in his confessions as well. He was not reluctant in admitting that in our age music has gone to the dogs. The media’s devastating role in promoting worthless people has led to demise of good singing. He was also highly critical of A R Rahman’s musical abilities. He found him an incompetent soul, who relied heavily on computerized beats !! He sounds so true because when one listens the songs of A R Rahaman it’s strikingly clear to any conscious listener that there is huge lack of completeness or totality. Jagjit Singh was conscious of the fact that the present age listeners as well as the new age composers have lost hold over refined musical sensibilities. Still , he did not fail to shower compliments upon new talents like Kumar Shanu when Shanu was new in the movie world. In our times, he appreciated the singing of Kay Kay.

In the end, I must reiterate the cliche that artists enjoy an advantage over other souls. While other souls are soon forgotten after their deaths, the creative geniuses like Jagjit Singh always make their presence felt. I am sure he would always make his presence felt in form of his ghazals, bhazans and songs. I am holding back my tears as ”

Ishq meiN GHairat-e-jazbaat ne rone na diyaa
Warna kyaa baat thi kis baat ne rone na diyaa
.

( In love my fear of being shamed/exposed did not allow me to cry )
Otherwise, what reason/thing was it that did not allow me to cry)

Some of my favourites:

Shayad Mai Zindagi Ki Shahar

Us Mod Se Shuru Kare Phir Ye Zindagi

Tere Aane Ki Jab Khabar Mahke

Jai Radha Madhav Kunj Bihari

Tum Meri Rakho Laaj Hari

Tum Dhoondho Mujhe Gopal

A Memorable Interview In Two Parts:

Part One

Part Two

Jagjit Singh: The Musical Peacemaker Merges In Eternal Peace!!!

References:


The Economic Times

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