Category Archives: Global Politics

मोदी के जीत के मायने कुछ अनकहे संदर्भो के दायरे में!

 ये मोदी की भी जीत नहीं है।  ये उस युवा सोच की जीत है जो अपने राष्ट्र को सचमुच विकास के राह पे ले जाना चाहता है तिकड़मी गन्दी राजनीति से ऊपर उठा कर। ये उस हिन्दू आस्था और स्वाभिमान की जीत है जिसके दायरे में संकीर्ण हित नहीं वरन संपूर्ण विश्व आता है।

ये मोदी की भी जीत नहीं है। ये उस युवा सोच की जीत है जो अपने राष्ट्र को सचमुच विकास के राह पे ले जाना चाहता है तिकड़मी गन्दी राजनीति से ऊपर उठा कर। ये उस हिन्दू आस्था और स्वाभिमान की जीत है जिसके दायरे में संकीर्ण हित नहीं वरन संपूर्ण विश्व आता है।


मोदी के जीत में कुछ गहरे आयाम है। मोदी का जीतना एक विलक्षण घटना है।  इसको कई संदर्भो में समझना बहुत आवश्यक है। ये समझने की भूल ना करे कि ये भारतीय जनता पार्टी की जीत है।  ये मोदी की भी जीत नहीं है।  ये उस युवा सोच की जीत है जो अपने राष्ट्र को सचमुच विकास के राह पे ले जाना चाहता है तिकड़मी गन्दी राजनीति से ऊपर उठा कर। ये उस हिन्दू आस्था और स्वाभिमान की जीत है जिसके दायरे में संकीर्ण हित नहीं वरन संपूर्ण विश्व आता है। ये उसी हिन्दू आस्था की जीत है जिसे सदियों से दासता के आवरण में रखकर खत्म करने की कोशिश की गयी हर तरह के आक्रमणकारियों के द्वारा लेकिन जिसने दम तोड़ने से इंकार कर दिया। मेरी नज़रो में तो प्रथम दृष्टया मोदी की जीत इस विखंडित हिन्दू आस्था को जीवंत करने के दिशा में एक शुरुआत है जिसमे अभी कई  स्वर्णिम पड़ाव आने है।  मोदी में लोगो को इस राष्ट्र को सेक्युलर मायाजाल से ऊपर उठाकर सचमुच के विकास को मूर्त रूप में लाने और इसे गतिमान बनाये रखने की असीम संभावना दिखी। इस कारण उन्हें पूरे राष्ट्र ने कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक उन्हें हाथो हाथ ले लिया। इस आकांक्षा में मोदी कितने खरे उतरते है ये वक़्त बताएगा लेकिन खरे उतरने के अलावा उनके पास विकल्प भी कोई और नहीं है। मोदी तो भारत के राजनैतिक पटल पर एक चक्रवर्ती सम्राट बन कर आ गए लेकिन इसके पहले आसुरी शक्तियों ने चुनावी माहौल में जो करतूतें की उस पर एक नज़र डालना जरूरी हो जाता है।

लोकसभा २०१४ के चुनाव प्रचार सबसे विकृत और बिल्कुल एक व्यक्ति विशेष के विरोध पर केंद्रित थे। ये बहुत दुखी कर देने वाली बात है। आप अमेरिका के राष्ट्रपति के चुनाव को देखे। वह मुद्दो पे आधारित बहस होती है। राष्ट्र हित सबसे ऊपर होता है और कुछ छींटाकशी वहा पर भी होती है लेकिन इसके बावजूद वहाँ राष्ट्र हित से जुड़े हर संवेदनशील मुद्दो पर गंभीर बहस होती है। हमारे यहाँ  राहुल गांधी ने जिनके पास तो अपनी एक टीम भी थी पर युवा सोच के नाम पर मोदी के पत्नी को लेकर टीका टिप्पणी की! शायद हमारे यहाँ विकास इसी तरह किसी के निजी ज़िन्दगी के बारे में इस तरह की सोच रखकर होता है। किसी भी पार्टी ने देश हित से जुड़े मुद्दो पर अपनी राय स्पष्ट रखने की जरुरत नहीं महसूस की। वामदाल प्रकाशक/समर्थक तो लगता है जब तक अस्तित्व में है तब तक वे अपने गढ़े हुए निरथर्क शब्दों के जाल में उलझे रहेंगे और हर वो दंगे जिसमे उन्हें मुसलमानो का समर्थन हासिल हो सके उनकी सहानभूति बटोरकर वे उन्हें उभारते रहेंगे। ये मनहूस पलो को हरा रखते है ताकि जब जरुरत हो इनसे वोट मिल सके। अमेरिका आदि देशो में भी ऐसे ही टाइप के लोग है जो मोदी को गुजरात  दंगो के लिए जिम्मेदार ठहराने वाली बात पे बहस तभी  करते है जब भारत में चुनाव जैसे महत्वपूर्ण क्षण आते है। इसके अलावा हमारे यहाँ कुछ क्षेत्रीय दल है जिनके नेताओ के पास नीति तो कुछ नहीं सिवाय जातिगत राजनीति के विकृत मोहरो के अलावा लेकिन अकांक्षा सिर्फ यही है कि प्रधानमन्त्री कैसे बने। इनके पास भी राष्ट्र को देने के लिए कुछ नहीं सिवाय सीमित लफ़्फ़ाज़ी के कि सांप्रदायिक शक्तियों को रोकना है। जबकि सबसे गन्दी सांप्रदायिक राजनीति ये छोटे क्षेत्रीय दल खुद करते है।

सो इस बार के चुनावी संग्राम में इलेक्शन दर इलेक्शन बेहतर सोच को अपनाते मतदाताओ ने जिस तरह चादर से धूल हटाते है वैसे ही कुछ दलों को भारत के राजनैतिक नक़्शे से निकाल फेंका। ये दल अभी तक केवल विष ही बोते रहे है। इनके पास विकास के एजेंडे के नाम पर लोक लुभावन नीतियों के अलावा कुछ नहीं होता था और उसे भी ठीक से क्रियान्वित नहीं कर पाते थे। इन्होंने इतने सालो तक ना ही केवल मतदाताओ को ठगा वरन देश की संप्रुभता और अखंडता को भी तकरीबन गिरवी रख कर छोड़ा।  वाम मोर्चा के सदस्यों ने तो केवल फ़ासीवाद ना उभरे हर हिन्दू विरोधी गतिविधि को जीवित रखा कांग्रेस के छुपे सहयोग के दम से और सब हिन्दू समर्थक या राष्ट्र समर्थक नायको को हिटलर की संज्ञा देते रहे।  सही है जिस पार्टी ने सबसे बड़े तानाशाहों को जन्म दिया हो गरीब मज़दूरों के हितो के लड़ाई के नाम पर उनका इस तरह के मतिभ्रम का शिकार होना आश्चर्यजनक नहीं लगता। इस पार्टी विशेष के लोगो का आलोचना के नाम पर आलोचना करना कौवों के कर्कश कांव की तरह जगजाहिर है और इसीलिए इनके पेट में जब तक मोदी राज रहेगा तब तक रह रह कर पेट में मरोड़े उठती रहेंगी।

मोदी की जीत सोशल मीडिया की जीत नहीं पर हां ये जरूर है कि कांग्रेस के फैलाये झूठ का पर्दाफाश करने में  इसने अहम भूमिका निभायी। अब तक कांग्रेस अपने मायाजाल को,  स्व-निर्मित अर्धसत्य को लोगो पर थोपते हुए लोगो को ठगती आई।  लेकिन सोशल मीडिया के दमदार इस्तेमाल ने मेनस्ट्रीम के बिके पत्रकारों जो कांग्रेस के लिए झूठ बेचते थे की दाल न गलने दी। कांग्रेस की करतूत वैसे भी सबको मालूम  थी लेकिन सोशल मीडिया ने इस सन्दर्भ में युवा सोच को बेहतर ढंग से जागृत किया। एंटी इंकम्बैंसी भी हमेशा सक्रिय रहती है  लेकिन मोदीराज के आने में  सोशल मीडिया और  एंटी इंकम्बैंसी से भी ऊपर युवाओ की इस सोच ने कामयाबी दिलाई कि अब केवल उसी को सत्ता मिलेगी जो सच में विकास करेगा या विकास लाने में काबिल होगा। इसी वजह से सडको पे हर तरफ युवा धूप में बिना किसी प्रचार के मोदी को सुनने गए, सोशल मीडिया पर मोदी से जुडी हर गतिविधि को ट्रैक किया और फिर हर गली और मुहल्लों में चाहे शहर हो या गाँव उत्साह से भरे रहे। वंशपोषित राजनीति जो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस करती आई रही थी उसका इन्होने इस तरह से नाश कर दिया। ये पहली ऐसी लहर थी जिसका निर्माण किसी घटना विशेष ने नहीं किया। इस राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत लहर ने ही हर तरह के जहरीले प्रचार कि  मुस्लिमो का पतन हो जाएगा को दबाते हुए हिन्दू सोच को सत्ता पे आसीन किया जिसने सदियों से पूरे विश्व को अपना समझा।

मोदी आ जरूर गए है लेकिन अब इनके सामने बेहद दुष्कर कार्य है।  सो मतदाताओ को अपनी आकांक्षाओं में ना सिर्फ संयमित रहना पड़ेगा बल्कि बदलाव की अधीरता से पीड़ित ना होकर मोदी जी को अपने हिसाब से काम करते रहने देना होगा। बदलाव कोई जादू की छड़ी से नहीं आते कि आपने घुमाया और बदलाव हो गया।  वर्तमान में इस राष्ट की ये दशा ये हो गयी है कि जैसे कोई गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीज़ अंतिम साँसे ले रहा हो।  सो ये सोचना कि सत्ता संभालते ही एक दिन के अंदर ऐसा मरीज़ दौड़ने भागने लगेगा केवल कोरी कल्पना है। हां मोदी को इस बात को समझना जरूर है कि अब उनके पास सिवाय अच्छा करने के और कोई अन्य विकल्प नहीं है। हिन्दुओ को अगर दिग्भ्रमित करने की चेष्टा करेंगे तो उन्हें भी हाशिये पर लाने में युवा ब्रिगेड देर ना करेगी। हिन्दू तो वैसे भी अपनी निष्कपट मन के कारण हर तरह का छल का शिकार होता आया है लेकिन अब और नहीं। इसी सोच ने इस अविश्वसनीय  बदलाव को जन्म दिया और यही सोच अब इस बात को भी सुनिश्चित करेगी कि राष्ट्रहित में अच्छे कार्य होते रहे। और इसीलिए ये जरूरी है कि अब आने वाले वर्षो में कोई भी हिंदू विरोधी पार्टी अस्तित्व में ही ना आये।  ये तभी संभव होगा जब मोदीराज में ईमानदारी से सार्थक बदलाव होते रहे। मोदी जी ऐसा ही करेंगे हम सब राष्ट प्रेम से जुड़े लोगो का यही मानना है।

ये जरूरी है कि अब आने वाले वर्षो में कोई भी हिंदू विरोधी पार्टी अस्तित्व में ही ना आये।  ये तभी संभव होगा जब मोदीराज में ईमानदारी से सार्थक बदलाव होते रहे। मोदी जी ऐसा ही करेंगे हम सब राष्ट प्रेम से जुड़े लोगो का यही मानना है।

ये जरूरी है कि अब आने वाले वर्षो में कोई भी हिंदू विरोधी पार्टी अस्तित्व में ही ना आये। ये तभी संभव होगा जब मोदीराज में ईमानदारी से सार्थक बदलाव होते रहे। मोदी जी ऐसा ही करेंगे हम सब राष्ट प्रेम से जुड़े लोगो का यही मानना है।

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तस्वीर प्रथम

तस्वीर संख्या दो

Is Aadhaar (Unique Identification Number) Too Dangerous?

Aadhaar: A Gate To Disaster?

Aadhaar: A Gate To Disaster?

 

The Aadhaar project started with great fanfare, but it’s now on the verge of meeting an untimely death. It became the converging point of great expectations, to an extent that it was hailed as image of “new and modern India”. That’s why  it created great chaos among middle classes, which like always, showed vain excitement to have it by hook or by crook, bothering least about the pros and cons of owning unique identity (UID). This project, bearing close resemblance to similar scheme in United Kingdom, was mired in contradictions right from the beginning. On the top of it, continuous conflicting statements from government, regarding its utility, kept the average mass guessing about its actual worth.

It needs to be informed that several experts in the West have already given enough signals that such project of this type having sensitive data based on biometrics could be used in a wrong way. In fact, they could be used to eliminate and target a large community not serving the interest of people in power. However, in countries like India, where we know how government agencies function, it’s always a great possibility that data could be misused, even if there is no such threat of this magnitude as apprehended by experts in West. It would be interesting to know that similar project in United Kingdom met tough resistance on part of British citizens for many years, which left British government with no other option other than to quash it. A report prepared by London School of Economics made mockery of  tall claims made by the government about its significance and it revealed that “biometrics was not a reliable method of de-duplication.”

However, neither the government nor Nandan Nilekani made Indian citizens aware of such serious flaws inherent in this project. On the contrary, it created tension by giving the impression that not owning it meant losing benefits and subsidies involved in various government run schemes. Ironically, just visit any camp where Aadhaar cards are being prepared and one would be taken aback by the mess which prevails there. It’s hard to believe that government has enough will power (forget about enough infrastructure)  to keep the data safe! I am sure ones whose data get stored either in wrong way or with wrong sorts of details would definitely face huge issues in coming days. Even at infrastructure level, the picture that emerges is quite threatening since its budget has increased phenomenally from nearly 32 billion rupees to over 88 billion rupees for coming phases.

That’s why Supreme Court’s judgement came as a whiff of fresh air. It directed the government not to make it mandatory for Indian citizens, and that it could not be a ground to deny services introduced by government. Above all, it made it clear that details collected by Unique Identification Authority of India (UIDAI) would not be shared by it with any other government agency without prior permission of the concerned individual. At this point, it would not be out of place to refer to Social Security Number (SSN) used in USA, which does not compromises with right to privacy. The most shocking thing is that despite strict provisions there to stop identity theft such cases keep happening there leading to huge revenue loss. Now imagine the state of affairs in India where rules can be easily manipulated to benefit the vested interests! Who would guarantee that data protection and privacy would always remain a top priority in India?

The Supreme Court made this observations in PIL filed by retired Karnataka High Court judge Justice KS Puttaswamy and Maj Gen (retd) SG Vombatkere which dealt with constitutional validity of Aadhaar. As per their counsel even if there was any statute to provide validity to this project, it would still be violation of Fundamental Rights under Articles 14 (right to equality) and 21 (right to life and liberty) of the Constitution. The project facilitating surveillance of individuals was a direct assault on the dignity of any individual. The main arguments rested upon these concerns: “…the (Aadhaar) project is also ultra vires because there is no statutory guidance (a) on who can collect biometric information; (b) on how the information is to be collected; (c) on how the biometric information is to be stored; (d) on how throughout the chain beginning with the acquisition of biometric data to its storage and usage, this data is to be protected; (e) on who can use the data; (f) on when the data can be used.” (As quoted in moneylife)

In fact, Goa case had already made it clear how could biometric data be used against the interests of any individual. In this case UIDAI had challenged  a decision of Goa Bench of Bombay High Court. It had  asked it to share biometric data with the Central Bureau of Investigation (CBI) so that the case involving gang rape of a seven year old girl in Vasco reached to its logical culmination.

Anyway, the Supreme Court’s decision to not to make it mandatory is enough to make Indian citizens heave a sigh of relief. It’s high time that before government embarks upon sensitive project it needs to take enough measures to ensure its appropriateness, relevance and significance quite well.

How will it keep intact the privacy of an individual in such a huge country devoid of infrastructure?

How will it keep intact the privacy of an individual in such a huge country devoid of infrastructure?

कांची के शंकराचार्य की रिहाई इस बात को दर्शाती है कि वर्तमान समय में दुष्प्रचार ज्यादा ताकतवर है बजाय सत्य के!

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे.


इस नए युग के इंडिया यानि “भारत” के अगर हाल के घटनाओ को देखे तो ये आसानी से समझ आ जाएगा कि धर्मनिरपेक्ष सरकारो ने सबसे ज्यादा जुल्म ढाया है हिन्दू संतो पर. ये धर्मनिरपेक्ष सरकारे मुग़लकाल के बाद्शाहो और ब्रिटिश काल के शासको से भी ज्यादा क्रूर रही है हिन्दू धर्मं से जुड़े प्रतीकों को ध्वस्त करने और इनसे जुड़े लोगो को अपमानित करने के मामले में. हिन्दू संतो को निराकरण ही प्रताड़ित किया जा रहा है और इन्हे यौन अपराधो से लेकर देशद्रोह जैसे जघन्य अपराधो में बेवजह घसीटा जा रहा है. बिकी हुई मीडिया इन प्रकरणो का एक पक्ष 
दिखाती  है अपने देश में और देश के बाहर विदेशी अखबारो में. ये आपको अक्सर देखने को मिलेगा कि इस प्रकार के खबरो में ज्यादातर झूठ होता है या अर्धसत्य का सहारा लेकर एक भ्रामक कहानी गाढ़ी जाती है. कोई भी मुख्यधारा का समाचार पत्र तस्वीर के दोनों पहलू दिखाने में दिलचस्पी नहीं रखता.

एक सबसे बड़ी वजह ये है कि ज्यादातर  भारतीय मीडिया समूह का कण्ट्रोल विदेशी ताकतो के हाथो में है. सबके विदेशी हित कही ना कही शामिल है तब हम किस तरह से इनसे ये आशा रखे कि ये सच बोलेंगे? ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जो साध्वी प्रज्ञा के गिरफ्तारी को तो खूब जोर शोर से दिखाते है लेकिन साध्वी के साथ जेल के अंदर हुए अमानवीय कृत्यो को जो बंदियो के अधिकारो का सरासर उल्लंघन था उसको दिखाने या बताने से साफ़ मुँह मोड़ गए. ये वही मुख्यधारा के समाचार पत्र है जिन्होंने देवयानी प्रकरण में देवयानी का साथ इस तरह से दिया जैसी कि उसने भारत के नाम विदेशो में ऊँचा किया हो, जैसे उसने कोई जुर्म ही नहीं किया हो. वो इसलिए से क्योकि इसका सरकार से सीधा सरोकार है और सिस्टम इसके पक्ष में है लेकिन हर वो आदमी जिसने भी सरकार ये सिस्टम के विपक्ष में कुछ कहा उसे इस तरह की  सरकारे या सिस्टम सुनियोजित तरीको से अपराधी घोषित कर देता है.

ये कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के युग मे सत्य से ज्यादा असरदार किसी के खिलाफ सुनियोजित तरीके से फैलायी गयी मनगढंत बाते है. समाचार पत्रो का काम होता है सत्य को सामने लाना सही रिपोर्टिंग के जरिये लेकिन हो इसका ठीक उल्टा रहा है: मीडिया आज सबसे बड़ा हथियार बन गयी है झूठ और भ्रम को विस्तार देने हेतु. इसका केवल इतना काम रहा गया है कि हर गलत ताकतो को जो सत्ता में है उनको बचाना, उनको बल देना. एक बाजारू औरत की तरह अपनी निष्ठा को हर बार बदलते रहना मीडिया का एकमात्र धर्मं बन गया है. साधारण शब्दो में ये सत्ता पे आसीन शासको की भाषा बोलता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी की गिरफ्तारी के प्रकरण के रौशनी में इस प्रकरण को देखे जिन्हे २००४ में बेहद शर्मनाक तरीके से शंकर रमण के हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था. शंकर रमण कांची के एक मंदिर में मैनेजेर थें. उस वक्त के तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने अपने को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए और ये जताने के लिए कि कानून से ऊपर कोई नहीं होता इनकी गिरफतारी सुनिश्चित की. कांची के शंकराचार्य के ऊपर “आपराधिक षड्यंत्र, अदालत को गुमराह करने गलत सूचना के जरिये, धन का आदान प्रदान आपराधिक गतिविधि को क्रियांवित करने के लिये” आदि आरोप लगाये गए.

इस एक हज़ार साल से भी ऊपर अति प्राचीन ब्राह्मणो के अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र के मुख्य संचालक को इस तरह अपमानजनक तरीके से एक दुर्दांत अपराधी के भांति गिरफ्तार करना और फिर मुख्यधारा के समाचार पत्रो के द्वारा अनर्गल बयानो के आधार पर उनको दोषी करार कर देना अपने आप में मीडिया की सच्चाई बयान कर देता है. ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

 ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने  नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

ये बता देना आवश्यक रहेगा कि कांची कामकोटि पीठ हिन्दुओ का अति प्राचीन मठ है जिसको हिन्दू समुदाय में दुनिया भर में बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है. कांची के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती जी बहुत सम्मान की दृष्टि से देखे जाते रहे है हिन्दू शास्त्रो के मर्मज्ञ होने के कारण. इन्होने नवी शताब्दी में स्थापित कांची कामकोटि पीठ के गरिमा को नयी ऊंचाई प्रदान की, जिसकी हिन्दू समुदाय में वेटिकन चर्च सरीखी पकड़ है. जयललिता और ब्राह्मण विरोधी नेता डीएमके प्रमुख करूणानिधि के आपसी मतभेदों के चलते इस हिन्दू मठ के माथे पर कालिख लग गयी.

उस वक्त के प्रमुख समाचार पत्रो ने ये दर्शाया कि पुलिस इस तरह से गिरफ्तार करने का साहस बिना पुख्ता सबूतो के कर ही नहीं सकती. उस वक्त अभियोजन पक्ष के वकील इस बात से पूरी तरह आश्वस्त थे कि शंकराचार्य को दोषी साबित करने के लिए उनके पास पर्याप्त पुख्ता सबूत थें. विवेचना अधिकारी प्रेम कुमार का ये बयान प्रमुखता से छपा कि हमारे पास ठोस साक्ष्य है स्वामी जयेन्द्र सरस्वती के खिलाफ और ये कि शंकर रमण और इनके बीच करीब चार सालो से आपसी मनमुटाव था जिसको सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत इकठ्ठा किये जा रहे है.

खैर ईश्वर के यहाँ देर भले हो पर अंधेर नहीं है. सत्य की अंततः विजय हुई जब पांडिचेरी की विशेष अदालत ने सत्ताइस नवंबर २०१३ को उन सभी लोगो को जो शंकर रमण हत्याकांड में आरोपी बनाये गए थें उनको बाइज्जत बरी कर दिया. इसी के साथ नौ साल से हो रहे ड्रामे का पटाक्षेप हो गया. उन पर लगाये गए सभी आरोपो से उन्हें मुक्त कर दिया गया. जितने भी प्रमुख गवाह थें उन्होंने अभियोजन पक्ष के वर्णन को समर्थन देने से इंकार कर दिया। अभियोजन पक्ष के विरोध में करीब ८० से अधिक गवाहो ने अपने बयान दर्ज कराये।

कांची के शंकराचार्य अंततः निर्दोष और निष्पाप होकर उभरे लेकिन इस नौ साल लम्बे ड्रामे की वजह से इस अति प्राचीन हिन्दू मठ पर जो दाग लगे उसको मिटने में कई वर्ष लगेंगे. हिन्दुओ के आस्था और प्रतीक के साथ जो बेहूदा मजाक हुआ उसके निशान कई वर्षो तक संवेदनशील मनो को कटोचते रहेंगे. लेकिन हिन्दू ब्राह्मण के उदार मन को देखिये कि इतना होने के बाद भी किसी के प्रति कोई कटुता नहीं. इस परिपेक्ष्य में शंकराचार्य के वक्तव्य को देखिये जो उन्होंने बरी होने के बाद दिया: ” धर्म की विजय हुई. सत्य की जीत हुई. सब कुछ खत्म हो जाने के बाद अंत में केवल यही बात मायने रखती है. मुझे मेरे गुरु ने सब कुछ सहन करने को कहा है. इसलिए ये कहना उचित नहीं होगा कि हालात मेरे लिए असहनीय थें. हा कुछ दिक्कते जरूर आयी वो भी उस वजह सें कि हम लोग नयी तरह की परिस्थितयो का सामना कर रहे थें. हमने पूर्व में देखा है कि किस तरह आक्रमणकारियों ने हिन्दू मंदिरो पर हमले कर उनको विध्वंस किया। आज जब हम मंदिरो पर पड़े उन हमलो की निशानियाँ देखते है तो  हमे वे आक्रमणकारी और उनकी क्रूरता याद आती है. आज जो कुछ भी मठ के साथ हुआ ( मेरे पर जो  आरोप लगे) वे बहुतो की नज़र में पूर्व में किये गए आक्रमणकारियों के द्वारा किये गए विध्वंस सरीखे ही है.”

ये बहुत दुःख की बात है कि जैसे ही किसी हिन्दू संत पर कोई आरोप लगते है सारे मुख्यधारा के मीडिया समूह उस संत को बदनाम करने की कवायद में जुट जाते है पूरी ताकत से इस बात से बिल्कुल बेपरवाह होकर कि मीडिया का मुख्य काम किसी भी घटना की सही-२ रिपोर्टिंग करनी होती है ना कि न्यायिक ट्रायल करना। उससे भी बड़ी बिडम्बना ये है कि अगर संत पर लगे आरोप निराधार और झूठे पाये जाते है तो जो अखबार या फिर न्यूज़ चैनल आरोप लगने के वक्त पूरे जोर शोर से संत को दोषी ठहरा रहे थे वे ही अखबार और न्यूज़ चैनल पूरी तरह से कन्नी काट लेते है. संत को बेगुनाह साबित करने वाली खबर कब आती है और कब चली जाती है ये पता भी नहीं चलता है. यही वजह है कि कांची के शंकराचार्य की बेगुनाही और बाइज्ज़त बरी होना किसी भी शीर्ष अखबार के सुर्खियो में नहीं आया. शायद सेकुलर मीडिया ने ये सोच कर इस खबर को प्रमुखता से नहीं बताया क्योकि हिन्दुओ से जुडी कोई भली खबर सेक्युलर भावना के विपरीत होती है!

मेनस्ट्रीम मीडिया को प्रोपगेंडा ज्यादा रास आता है बजाय सत्य के. सेक्युलर ताकतो ने और इनके द्वारा संचालित मीडिया समूहो ने कांची के शंकराचार्य के गिरफ्तारी के वक्त ये बहुत जोरदार तरीके से ये दर्शाया कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं होता. तो क्या यही सेक्युलर ताकते जो कानून की बात करती है शाही ईमाम सैय्यद अहमद बुख़ारी को गिरफ्तार करने की हिम्मत रखते है जिन पर कई धाराओ में देश के विभिन्न थानो में एफ आई आर दर्ज है? क्या यही सेक्युलर ताकते उन क्रिस्चियन मिशनरीज को बेनकाब करने की ताकत रखती है जो देश के पिछड़े और दूर दराज के इलाको में लोगो को बहला फुसला कर उनका धर्म परिवर्तन कर रही है? लेकिन ये सबको पता है कि सेक्युलर मीडिया ऐसा कभी नहीं करेगा. ऐसा इसलिए कि इन सेक्युलर लोगो की निगाह में कानून के लम्बे हाथ केवल हिन्दू संतो के गर्दन तक पहुंचती है. ये हिन्दू संतो को केवल बदनाम करने तक ही सीमित है और हिन्दू आस्था को खंडित और विकृत करने भर के लिए है. ये दुष्प्रचार के समर्थक है सत्य के नहीं.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.

हिन्दू संत अपनी जाने गंवाते रहे है लेकिन ये खबरे कभी भी सेक्युलर मीडिया की सुर्खिया नहीं बनी. ये स्वामी लक्ष्मणानन्द जी की तस्वीर है जिनकी हत्या क्रिस्चियन ताकतो ने कर दी थी.


References:

IBN Live

The Hindu

The Hindu

Wiki


Pics Credit:

Pic One

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Pic Three

Acquittal of Kanchi Seers: A Sad Reminder Of The Fact That Propaganda Is More Powerful Than Truth!

The Acquittal Of Kanchi Seer: Truth has won over propaganda!

The Acquittal Of Kanchi Seer: Truth has won over propaganda!

Any close observer of the happenings in modern India would easily confirm that secular governments have unleashed a sort of war against Hindu saints. They have been framed in number of heinous crimes right from sexual crimes to crimes against national security. The paid media ensures that one-sided coverage gets highlighted not only within Indian landscape but also in International arena. In such matters wherein Hindu saints are involved, a striking feature is that news coverage is full of lies and twisted truths spread by secular press. None of the mainstream media dares to reveal both sides of the story in an impartial way.

One important reason is that most of the Indian media houses are in some way controlled by hidden powers in Western nations. How can we then expect truth to make its presence felt? After all, the mainstream media which harps about involvement of Sadhvi Pragya in blasts never found it important enough to report in same candid fashion about severe violation of rights of prisoners, about inhuman treatment meted out to her inside the jail! The same media is so hyper-sensitive about rights of Devyani who made mockery of India’s honour in West but yet she is being portrayed as if she committed no crime at all! That’s because she is part of the system. But anybody who dared to expose the misdeeds of government was branded as criminal in a well-planned manner!

What I am trying to ascertain that we have given way to era wherein propaganda has become more powerful than version close to truth. One of the most important job of media is to reveal the real picture but exactly opposite has taken place: Media has become carrier of falsehood and distorted versions. It’s main agenda has become to shield dubious powers in rule. Like a prostitute it keep changing its loyalty or, in other words, it generally speaks the language of rulers! Remember the arrest of Kanchi Shankaracharya Swami Jayendra Saraswati in year 2004 in most humiliating manner for allegedly playing a role in murder of Sankararaman, manager of the Sri Varadarajaswamy Temple. The then Chief Minister of Tamil Nadu,J Jayalalithaa, in an attempt to appear more secular than others and to give an impression that no one is above law ensured his arrest! The Kanchi seers were charged with” criminal conspiracy, misleading the court by giving false information, criminal trespass and supply of funds to carry out the criminal activity.”

The Truth Had The Last Laugh!

The Truth Had The Last Laugh!

The head of a 1,000-year-old Brahmin monastic order was presented as petty criminal in mainstream media and even before case was put to trial he was portrayed as accused. Let’s remember that Kanchi Kamakoti Peetham is one of the oldest Hindu mutts in the country and Shankarcharyas belonging to this mutt command a great respect among Hindu communities across the globe. In fact, Swami Jayendra Saraswati is a highly respected figure having profound knowledge of Hindu scriptures. He like his predecessors provided new heights to this mutt established in 9th century by Sri Adi Shankaracharya, enjoying similar status the way Vatican enjoys amid Christians. However, clash of interests between J Jayalalithaa and DMK chief Karunanidhi, who represented anti- Brahminical movments, ensured that this highly revered pontiff got disgraced.

Prominent media analysts of that period conveyed the impression that “police would not have acted unless they had sufficient evidence.” Ironically, the prosecution at that time was supremely confidant about involvement of Kanchi seers in abetting murder of Sankararaman, claiming that it had “incriminating evidence”. The investigating officer Prem Kumar came out with version that made mutt head appear guilty: “We have strong evidence about the involvement of Sri Jayendra Saraswathi in Sankararaman’s murder. There has been animosity between the two for the past four years and further investigation is on to corroborate the evidence collected on the involvement of the Kanchi Acharya.” The allegations had deepened with revelations of  Tamil magazine Nakkeeran. Amid these bizarre turn of events, the case got transferred to Pondicherry to ensure fair trial. To make the matters worse for Kanchi mutt head, even allegations of sexual exploitation surfaced. (The Hindu)

However, the truth had the last laugh when verdict delivered by a special court in Pondicherry acquitted all the accused involved in this sensational murder. The verdict was delivered on November 27, 2013 after nine years of suspense and drama of all sorts. They were acquitted of all the charges which included “criminal conspiracy, misleading the court by giving false information, criminal trespass and supply of funds to carry out the criminal activity.” The main witnesses failed to corroborate the prosecution’s theory. More than 80 witnesses went against the story presented by the prosecution.

Well, it’s true that Kanchi seers got acquitted but in the process it caused irreparable damage to the reputation of an institution, which represented the collective psyche of Hindus. This “collective psyche” of Hindus made its presence felt again the way Kanchi Mutt Head responded to this verdict: ” Dharma has prevailed. Truth has won. That is what matters…I have been trained by my Guru to bear everything. There is no question of situation being tough. Times were challenging because we were facing completely new set of situations. ..There are several invaders who vandalized our temples. Today when you see the disfigured temples you remember the invaders and their acts of vandalism. What was perpetrated on the mutt has been termed as an act of vandalism by several people.” (Kanchi Sathya Org)

Swami Shraddhanand:  Killed By A Muslim Fanatic in 1926.  He Was Part Of The Movement To Reconvert Muslims Back To Hinduism!

Swami Shraddhanand: Killed By A Muslim Fanatic in 1926. He Was Part Of The Movement To Reconvert Muslims Back To Hinduism!

It’s really saddening that moments allegations against Hindu saints surfaces, the whole mainstream media goes berserk and paints them in wrong colours, forgetting that its main task is to report the incident and not to conduct trials. Worse, when the allegations are found false and saints get acquitted the same news item does not get prominence. Acquittal is never important than false stories planted by vested interests. No wonder acquittal of Kanchi’s Shankracharya did not get the same coverage. After all, it strengthens cause of Hindus, which is antithetical to secular spirit of this nation. The mainstream media is more interested in propaganda than emergence of truth.

The secular forces always convey the impression that no one is above law.  And so will they dare to arrest Shahi Imam Syed Ahmad Bukhari against whom so many cases have been registered? Will they dare to bring in open and convict Christian missionaries involved in conversion of tribals in remote corners of India? That will never take place. The law exists only for Hindu saints. It’s an instrument of oppression for Hindus and all that which represents self-pride of Hindus. It’s there to support propaganda and not to sustain truth.

Swamy Lakshmanananda Saraswathi and four of his disciples namely Sadhvi Bhaktimayee, Baba Amritanand, Kishor Baba and Puranjan Ganthi at his Ashram in Jaleshpatta of Kandhamal district in Orissa by a group of Christian zealots on the Janmashtami day, 23 August, 2008.  But the mainstream media made no uproar!

Swamy Lakshmanananda Saraswathi and four of his disciples namely Sadhvi Bhaktimayee, Baba Amritanand, Kishor Baba and Puranjan Ganthi at his Ashram in Jaleshpatta of Kandhamal district in Orissa by a group of Christian zealots on the Janmashtami day, 23 August, 2008. But the mainstream media made no uproar!

References:

The Hindu

The Hindu

Wiki

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The Curious Case Of Devyani Khobragade: Aspects Which Will Never Be Discussed!

Devyani: Taken Laws For Granted!!

Devyani: Taken Laws For Granted!!

The complex issue of Devyani Khobragade has come as a boon for ruling party in India on the verge of facing one of the worse defeats in upcoming Parliamentary Elections in 2014. It has allowed its leaders, who have lost their sheen, to talk big about saving the pride of nation, forgetting that most of them enjoy a chequered past! Its most of the leaders, who have been relegated to the background, have now emerged on the surface, speaking aloud about attributes which they rarely displayed both in public and personal lives. Consider the manner in which the Lokpal Bill got passed after the government was left with no other option but to take cognizance of growing unrest over this issue in nation! 

The Indian leaders, especially from the ruling party, definitely lack the moral right to make shrill cry about violation of standard provisions in case of Devyani Khobragade. It’s quite evident from a deeper analysis of issue at hand that facts have been blown out of proportion. Like always the issue has been given a larger-than-life colouring, making it look like some shrewd diversionary tactics on the part of hidden players behind the curtain.

Devyani Khobragade is no child that she could not apprehend the consequences of misrepresentation of facts on visa application of the domestic help Sangeeta Richard. How come she is so much aware of  “Vienna conventions” but pretty unaware about the violation of domestic laws of U.S. even as there were reported incidents of atrocities committed upon domestic help in the past by other Indian diplomats in the same country? Being an Indian diplomat she should have set high precedents instead of giving impression of being a “victim” in the aftermath of strict actions on part of U.S. authorities.

Let’s be very clear that it’s not the case of making mockery of sovereignty of India but it’s more the case of playing with the fire. Devyani conveniently forgot that she was living in United States and not in India where even a petty “Sarkari Babu” (government official) can use his power to thwart the investigation on being caught.

The urgency exhibited and absurd statements on part of Congress Ministers make them laughing stock in the eyes of all conscious people, who believe in the rule of law. The paid mainstream media might give the impression that knee jerk reactions on part of Indian counterparts back in India are “bold measures” and fitting response to United States, but it would never diminish the ugly truth that she is guilty. The moves on part of U.S. sound more appropriate when Preet Bharara makes it clear that “This office’s sole motivation in this case, as in all cases, is to uphold the rule of law, protect victims, and hold accountable anyone who breaks the law — no matter what their societal status and no matter how powerful, rich or connected they are.”

All those who are talking aloud about diplomatic immunity granted to Indian officials posted at consular office surely needs to answer questions posed by this U.S. prosecutor: “One wonders whether any government would not take action regarding false documents being submitted to it in order to bring immigrants into the country. One wonders even more pointedly whether any government would not take action regarding that alleged conduct where the purpose of the scheme was to unfairly treat a domestic worker in ways that violate the law. And one wonders why there is so much outrage about the alleged treatment of the Indian national accused of perpetrating these acts, but precious little outrage about the alleged treatment of the Indian victim and her spouse?”

Yes, it’s disturbing that mainstream media pressure and chaotic voices within the government have made it a “diplomatic row” when it’s nothing more than criminal action committed by a responsible Indian officer. However, let’s view critically the actions taken on part of U.S. The WikiLeaks have proven beyond doubt that American leaders are no saints. The U.S. might give the impression that dealing fairly with violation of human rights is always their topmost priority but when their own men get trapped it takes recourse to most shrewd measures to save them.

Or, for that matter, it can go to any extent to get its job done, even if it means sabotaging the sovereignty of other nations. It’s no secret that documents and evidences were forged to justify their attack on Iraq. The drone attacks in various parts of Pakistan make it clear that borders become meaningless in face of its interests, and so death of innocent civilians means nothing! The controversial release of Ramyond Davis, C.I.A contractor guilty of double murder in Pakistan, speaks volume about subtle pressure employed by American leaders.

 The U.S. claims it’s very much in pain over episodes of violation of human rights but see the treatment meted out to prisoners at Guantanamo Bay! So it’s evident that rich and powerful nations have dual standards and the U.S. is no exception. It’s not at all wrong to presume that it used its domestic laws to enter in  barbaric behaviour which many in India see it as an assault on the pride of India and modesty of a woman.

India needs to learn few lessons from this episode instead of entering in retaliatory actions. Before I come to that point let me state that introduction of gender-neutral laws in India or need of tough measures to punish abusive women always lead to raised eyebrows.The so-called messiahs of women’s rights start making noise in India. The U.S. has perfectly demonstrated that laws are equal for men and women and, therefore, women cannot claim special privileges or concession. 

In India despite the leap of so many centuries  woman is still inherently seen as a weak specie, a saintly figure, who can first commit no crime and even if she commits crimes she needs to be given special treatment! It’s an impression that’s even supported by foreign based agencies, working for the rights of women in India but the same agencies would remain silent about inhuman behaviour done with Devyani just because it happened in U.S.!

Anyway, India needs to demonstrate its own strength not in reactionary way but in a more mature way. It needs to take away all the special privileges and concessions it offers to U.S. citizen in extraordinary way. Very recently a Visa Officer in India was transferred because she had refused to grant visa to a gay American diplomat on the ground that such marriages are not legal in India. The Indian government instead of supporting her argument, transferred her to a lesser department.
 

In the light of recent Supreme Court judgement, which has upheld the validity of section 377, one needs to follow the words of former Finance Minister of India, Yashwant Sinha, to let United States become aware of consequences if other nations also become strict in implementing their domestic laws.”My suggestion to the Government of India is, the media has reported that we have issued visas to a number of US diplomats’ companions. ‘Companions’ means that they are of the same sex. Now, after the Supreme Court ruling, it is completely illegal in our country. Just as paying less wages was illegal in the US. So, why doesn’t the government of India go ahead and arrest all of them? Put them behind bars, prosecute them in this country and punish them.” (Yashwant Sinha).

Sometimes back there was controversy about alleged permission granted to American sniffer dogs to enter Rajghat as a part of the security drill before the visit of U.S. President George Bush. In future this sort of “desecration” could be avoided since it’s not permissible as per our own rules. It’s time for India to exhibit that it has a backbone, instead of entering in knee-jerk reactions. That can be perfectly demonstrated by pursuing its own interests in a rigid way without granting extraordinary privileges to outsiders, being least influenced by their nationality and position.

Nation's Pride Should Be Saved In A Sensible Way!

Nation’s Pride Should Be Saved In A Sensible Way!

References:

Time

MSN

DNA

Zee News

The Indian Express

Financial Express

The Indian Express

The Hindu

IBN Live

Raymond Davis

Yashwant Sinha

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Pic Two Is From Internet

Two Faces Of Masculinity From The Crude Real World Supposedly Belonging To Men In The Eyes Of Feminists!

Men Will Keep Losing Lives For The Sake Of Society!

Men Will Keep Losing Lives For The Sake Of Society!

*Scene One*

This year in the month of September a senior police officer, belonging to IPS cadre, tried to commit suicide in Maharashtra. Such news report now do not stir the emotions of common mass other than creating short-lived ripples within some sensitive minds. Even when it forces the thinking class to take cognizance of such news items, the centre of gravity in these discussions remain governed by flimsy causes and after a certain period the issue gets swept under the carpet.
 

In this particular sensational incident, this senior police officer was at the receiving end of humiliating gestures at the hands of another junior officer, belonging to IAS cadre. This harassment continued for a certain period of time and seeing no way to get out of this mess this hard-working and honest police official set himself on fire. The reason why this police officer faced the ire of this junior IAS officer was that he had found this junior officer responsible for alleged irregularities in the Maharashtra State Road Transport Corporation (MSRTC). This IPS officer in his capacity as the Chief Vigilance Officer of the MSRTC submitted an inquiry report, which found this officer guilty, who was, ironically, the head of this department at that point of time.

That’s one of the few examples from world of ours, which contradicts the claims of  feminists always unfailingly harping on the same string that world belongs to men! Unfortunately, they never realize that it’s rough, cruel and hellish for men-at-large for most of the time. The wives of such hard-working honest officials, who see such husbands as no more than a source to have ready cash all the time for their sense gratification, either in form of buying costly jewelries, costly attires, rarely come to realize what’s actually the state of affairs in lives of the their husbands. Worse, being unaware of the harsh realities prevailing in the world of men, the women show no haste in throwing tantrums on one pretext or another.

Husbands usually do not protest over such whimsical demands of wives since in their eyes giving way to demands of their wives appears to be some sort of fulfilling one’s duty towards them! And that’s how women come to rule over them and in turn exploit them.  Ironically, now laced with new rights, wives have become more possessive, greedy and irrational. It’s a sad declaration but it’s true that scenario would not change in future. It would remain the same, wherein husbands like, bonded labourers, would continue to serve their wives, even as they remained at the receiving end of most tragic developments in world outside the confines of drying room.

Suicide By Men Is Not A Serious Issue For Governments!

Suicide By Men Is Not A Serious Issue For Governments!

  *Scene Two*      

In one of the famous restaurants of Allahabad, popular among love birds, arrived one such couple. Everything went alright between these two lovers, enjoying a happy conversation amid refreshments. Suddenly, a call arrived on the phone of male friend and he went on to have a long conversation. Being suspicious about the nature of the phone call, the female partner inquired about it from her lover. The explanation offered by the male partner did not appear convincing to her and that led to heated debate between the two. The happy mood gave way to high voltage drama marred by panic and tension. The female partner, who belonged to elite class, being unaware of the consequences of involving police, telephoned the police station of that area stating she was being sexually assaulted. The police acted in prompt manner, beating his male partner black and blue, right in front of her eyes, dragged him to the police station.

The girl who did not imagine such fatal consequences and to an extent feeling sorry about the whole episode informed the police officer in the police station that her complaint was fake! She telephoned merely to teach a fitting lesson to his male partner! Perhaps she did not want that matter should reach to their homes, which was going to be the case in next few minutes. The police, taking a liberal view on the whole episode, released both of them warning them not to indulge in such drama again, which involved police. The couple promising them to behave responsibly left the police station with happy and relaxed faces. Such boyfriends, new face of masculinity in modern times would grow in numbers, willing to serve their girlfriends at all costs, no matter if it involves putting at stake one’s self-respect! 

Girlfriends Would Continue To Exploit Men At All Levels!

Girlfriends Would Continue To Exploit Men At All Levels!

Reference:

India Today 

News Item Published In Dainik Jagaran

Hindi Version Of This Article By Me

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यथार्थ से उठायी गयी मर्दानगी की दो अलग-अलग तस्वीरे: अफ़सोस ऐसा होता ही रहेगा!

… और पुरुष मर्दानगी के चलते ऐसे ही मरते रहेंगे उस समाज के लिए जो उनकी क़द्र नहीं करता :-(

… और पुरुष मर्दानगी के चलते ऐसे ही मरते रहेंगे उस समाज के लिए जो उनकी क़द्र नहीं करता :-(


                                                     *तस्वीर एक* 
                                
इसी साल सितम्बर महीने में महाराष्ट्र में एक सीनिअर पुलिस अफसर ने आत्महत्या करने की कोशिश की. ऐसी बाते हमारे भारतीय परिदृश्य में आम जनमानस के एक अल्पकालिक सनसनी के सिवाय ज्यादा कुछ पैदा नहीं करती। कुछ बतकही होती है इधर उधर की कुछ समय तक और फिर मामला ठंडा पड़ जाता है. लेकिन मै कुछ सोचने पर मजबूर हो गया. इस घटना के पीछे इस अधिकारी की प्रताड़ना थी जो ये एक अपने से जूनियर आई ए एस के हाथो कई वर्षो से झेल रहा था. वो भी इस वजह से कि इस अफसर ने ईमानदारी से काम करते हुए इस अधिकारी को एक इन्क्वायरी रिपोर्ट में कुछ मामलो में दोषी पाया था। और बात इस कदर बढ़ी कि इस अफसर ने अपने को आग के हवाले कर लिया। 

इस घटना का उल्लेख करने की वजह ये है कि जिन ऐसी अफसरो की बीवियाँ गहनो और महँगी साड़ियों से सुसज्जित पति को प्राप्त हर सुख सुविधा का भोग करती है उनको शायद इस बात का जरा सा भी अंदेशा नहीं रहता कि उनके पति किस तरह के समस्यायों से जूझ रहे है. उस पर से तुर्रा ये कि किसी चीज़ की कमी बेसी पर आसमान सर पर उठा लेने में जरा भी देर नहीं लगाती है. और ये घर घर की कहानी है. इस घर और ऑफिस के दो पाटो में हर मर्द पिस जाता है लेकिन अपने शोषण पर उफ़ नहीं करता क्योकि ये उसको अपना कर्त्वय लगता है. और जबकि इनकी पत्नियाँ हर तरह के अधिकारो से लैस इस तरह के मर्दो को कोल्हू का बैल बना के रखती है. और जिस तरह से इनको अधिकार मिलते ही जा रहे है उससे नहीं लगता कि आने वाले समय में परिदृश्य बदलेगा।     

                                                      *तस्वीर दो*

इलाहाबाद का एक प्रसिद्ध रेस्टॉरंट जहा हमेशा की तरह आधुनिक प्यार को विस्तार देते कई प्रेमी प्रेमिकाएँ बैठे है. इन्ही तमाम जोड़ो में से एक के बीच ऐसा हुआ. एक प्रेमी प्रेमिका बैठे हुए है कि अचानक प्रेमी का मोबाइल बज उठता है जिस पर वो किसी से लम्बी बात करता है तो प्रेमिका ने डिटेल्स लेनी चाहिए लेकिन प्रेमी के जवाब से संतुष्ट ना हुई. और जो इन दोनों के बीच मधुर बातो का सिलसिला चल रहा था वो तकरार के भयंकर रूप में परिवर्तित हो गया. बात यहाँ तक बढ़ी कि प्रेमिका ने तुरंत पुलिस को फ़ोन पर सूचित किया कि उसके साथ छेड़ छाड़ हो रही है. ऐसे मामलो में अति सक्रिय पुलिस तुरंत आ पहुँची और उसके बॉयफ्रैन्ड को तुरंत मारते पीटते थाने ले गए. प्रेमिका चूँकि एलिट क्लास से थी सो उसको अंदाजा ना था कि फ़ोन करने पर ऐसा भी हो सकता है. बात क्योकि अब थाने और घरवालो तक पहुचने वाली थी सो प्रेमिका ने मामले को खत्म करने के इरादे से सच बता दिया कि ऐसा कुछ नहीं था. वो केवल बॉयफ्रेन्ड को सबक सीखना चाहती थी. सो पुलिस ने हलकी से दोनों को चेतावनी देते हुए दोनों को छोड़ दिया। दोनों भविष्य में ऐसा ना करने की कसम खाते हुए फिर से इकट्ठा साथ निकल लिए. मर्दानगी के आधुनिक नमूने इस तरह के बॉयफ्रेंड की फसलें सदा लहलहाती रहेंगी जिसे इस तरह की लड़किया हमेशा अपने हिसाब से काटती रहेगी।

 

प्यार कम और तकरार ज्यादा होता है आज अधिकारो के हक़ की वजह से !!!

प्यार कम और तकरार ज्यादा होता है आज अधिकारो के हक़ की वजह से !!!

 

Reference:

India Today

News Item Published In Dainik Jagaran.

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Muzaffaranagar Riots: Would The Real Reasons Which Caused The Riots Ever Get Revealed?

Akhilesh Yadav:  Miserably Failed To Rise Above Dirty Politics!!

Akhilesh Yadav: Miserably Failed To Rise Above Dirty Politics!!

              (Also published in Northern India Patrika, Sep. 28, 2013) 

Uttar Pradesh expected better developments in the regime of young Chief Minister. However, such expectations turned out to be a great illusion. Akhilesh Yadav, who represents the spirit of youth, gave way to same means exhibited by worn out old minds, proving beyond doubt that mere youth force is of no use but youth force backed up by noble vision and sound policies does the real magic. No wonder Uttar Pradesh is today witnessing one of the darkest phases of its existence as a state. Since the time of his becoming Chief Minister, a year and a half, the state has witnessed series of riots, making it a disturbed zone. The bureaucratic system has fallen prey to casteist politics, to an extent that even an impartial constitutional body like Uttar Pradesh Public Service Commission (UPPSC) is finding hard to retain its glory of yesteryear. The honest bureaucrats like Durga Shakti Nagpal are being harassed and bullied on concocted grounds. Ironically, the real culprits who are actually disturbing the communal harmony, a ground cited as a cause for suspending IAS officer Durga Shakti Nagpal, are roaming scot free.

Coming to riots of serious magnitude which hit Muzaffarnagar couple of weeks ago, one needs to know the actual reasons which triggered them. The mainstream media circulated state sponsored corrupt version of actual reasons, marred by half lies and manipulation of facts. It’s believed that an incident of eve teasing led to this riot. However, that’s an insignificant reason blown out of proportion to hide the real factors. It  has been very cleverly suppressed that for  past few months Muzaffarnagar region was simmering with anger over series of rapes with Hindu girls committed  by Muslim youths. The ineffective state machinery remained mute spectator to such rising number of sexual assaults on Hindu girls. It’s real shame that although this nation witnessed an unprecedented level of protest in case of Nirbhaya the Damini gang-rape case, the series of brutal rapes in this part of Uttar Pradesh were not taken into cognizance by anybody.  Any conscious citizen would like to know why were state machinery and Central government so unconcerned about these rape incidents?

As a result of this bureaucratic apathy and partisan approach of mainstream media in reporting such incidents with same intensity, the local community organised  a mass meeting to deal with such grave developments, mainly to ensure the safety of women and daughters. On September 07, the participants going to attend this meeting were attacked, leading to tense situation, which later spiralled out of control. What added fuel to the fire was that subsequent developments were remote controlled to allegedly benefit Muslim community. It’s learned that Jat-Muslim equations in this area constitute a huge vote bank. That was cited as a main reason as to why riots came to hit this area. However, it’s far away from truth. This might be one of the reasons but not a strong ground to give way to riot of this volatile nature, which made even the prime minister Manmohan Singh hail it as a “big tragedy”.

Mazaffarnagar riots, one of the worst riots to hit this country, revealed shades of murkier politics involved in riots, making it clear that riots are often well planned in advance and execution of these nefarious designs take place effectively by the hidden hands at a suitable time. The witnesses of Muzaffarnagar riots categorically stated before the media that police did not respond to the calls of victims crying for help. The victims also stated about inaction of police before the PM and other senior leaders from the Centre.  This corroborates the alleged involvement of State Minister, who was seen in a sting operation instructing a police official to act in a irresponsible way!

In fact, Union Minister Jairam Ramesh bluntly stated that Akhilesh Yadav was “masterly inactive” during the heated phase of riots. “On Muzaffarnagar, none of us will keep quiet. What he (Akhilesh) has done is inexcusable.” Let’s not forget that one of the allegations against Narendra Modi is that he did not act swiftly during the riots in Gujarat, and thus, secular media quickly labelled him as the architect of pogrom in Gujarat. Ironically, the same secular media remained silent over the Godhra victims and Muslim perpetrators involved in burning of the train- a prime cause that led to the start of riots! Will these riots be attributed to Akhilesh as controlled pogrom the Gujarat way?

Illegal Arms Supply To The Minorities: How Would You Curb It?

Illegal Arms Supply To The Minorities: How Would You Curb It?

Arms and ammunition  in large quantity were seized by police in aftermath of the riots. This proves beyond that misguided forces in minority community are involved in illegal arms racket. So what were Intelligence agencies doing when these illegal weapons got supplied to these anti-social elements? One of the problems faced by this country is that appeasement of Muslims has spread like a plague. It never allows Intelligence agencies to act in effective manner. The moment any strict action is taken against the anti-social elements present in the minority community, it leads to shrill cry of harassment of minorities in India by the so-called secular forces operating in India and abroad.

This is a serious issue which involves a key question: What is the way to ensure the complete elimination of anti-social elements present among the minorities? Since we cannot expect political heads to answer this sensitive question, the Supreme Court, taking suo moto cognizance of such critical developments needs to deal sternly with such anti-national developments. Why should members of one particular community be not subjected to stern actions in an attempt to wipe out wrong elements? It’s laughable that Muzaffarnagar riots are being stated as fallout of eve-teasing incident, making the focus of probe get limited by minor aspects. These riots have exposed serious loopholes in our intelligence mechanism besides revealing the nexus of politicians with negative forces. It’s these aspects which need to be dealt with by the mainstream media and legal enforcement agencies.

Social media which is not the part of paid media, dictated by politicians, should stop the great game played in name of empowerment of women and upliftment of minorities. It should honestly reveal the unsaid. Needles to state that most of the programmes in the garb of improving the lives of women and minorities have wrecked the citadels of Indian society. They both have become convenient way to enter in crude vote bank politics. The institutions like Supreme Court, High Court, and impartial bodies run by conscious citizens should come to the fore to prevent the nation from going to dogs. There is no other way left to make this nation safe from anti-social elements. The Muzaffarnagar riots have revealed that so-called politicians talking about honouring the ideals of democracy cannot be relied upon. They are dangerous wolves masquerading as human beings.

Uttar Pradesh Is Passing Through One Of Its Worst Phases Of Its Existence!

Uttar Pradesh Is Passing Through One Of Its Worst Phases Of Its Existence!

References:

Firstpost

Zee News 

 

 Jairam Ramesh

The Hindustan Times 

 
 
 
The Times Of India      

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गुजरात के दंगो का सच: वो बाते जो सेक्युलर मीडिया नहीं बताता है या तोड़ मरोड़कर कर पेश करता है!

क्यों सेक्युलर मीडिया इस आदमी की तस्वीर का गलत इस्तेमाल करके इसका जीवन नर्क सामान बना दे रहे है?

क्यों सेक्युलर मीडिया इस आदमी की तस्वीर का गलत इस्तेमाल करके इसका जीवन नर्क सामान बना दे रहे है?


गुजरात की बात होती है तो 2002 के दंगो का जिक्र अवश्य होता है। खासकर अगर सेक्युलर मीडिया गुजरात के बारे में कुछ कह रहा हो तो। जब भी मै सेक्युलर मीडिया द्वारा प्रायोजित इन चर्चाओ को सुनता हूँ तो इस उम्मीद में कि कभी इन सेक्युलर प्रवक्ताओ की आत्मा जागेगी और ये सच बोलेंगे। लेकिन ये लकीर के फकीर जड़ मानसिकता से लैस लोग सिवाय झूठ और अर्धसत्य के कुछ नहीं बताते। असल में इनका अस्तित्व ही झूठ की बुनियाद पे खड़ा है सो सच बोलना इनके लिए आत्मघाती सरीखा सा कदम हो जाता है। इसलिए 24 प्रतिशत हिन्दू जो मारे गए इन दंगो में इनके बारे में जिक्र करना ये कभी जरूरी नहीं समझते। 

यहाँ पे मै कुछ बाते रख रहा हूँ जो मेरी बात बिलकुल नहीं है। ये बाते किसी चर्चा में मीनाक्षी लेखी ने रखी, जो  भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय प्रवक्ता है। मुझे उनकी बाते सारगर्भित लगी। कम शब्दों में उन्होंने सेक्युलर झूठ को तार तार करने की एक सफल कोशिश की है। मै उनकी बातो को ठीक वैसा ही रख रहा हूँ जैसा कि उन्होंने चर्चा में व्यक्त किया। इसके लिए मै आभारी हूँ अपने सोशल मीडिया के मित्रो का जिन्होंने मुझे इन तथ्यों से परिचित कराने में मदद की।

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1. एक अंसारी नाम  का मुस्लिम युवक जो पुलिस के सामने हाथ जोड़ रहा था,उसकी हाथ जोड़ते हुए की फोटो को  मीडिया वालो ने ऐसे प्रसारित किया जैसे वो पुलिस से अपनी जान बख्श देने की भीख मांग रहा हो जबकि वो युवक अपनी जान बचाने के लिए पुलिस का हाथ जोड़ कर धन्यवाद कर रहा था.
 

2.  गोधरा में ट्रेन में आग लगाने वाले कांग्रेस के मुस्लिम कार्यकर्ता थे पर मैं उनको मुस्लिम कम और कांग्रेसी कार्यकर्ता ज्यादा मानती हूँ.

3.  जिस तीस्ता सीतलवाड़ को लेकर आप मीडिया वाले मोदी जी पे कीचड़ उछालते हैं उसने गुलबर्ग सोसायटी से खूब माल बनाया है और इस बात को लेकर उसके ऊपर हाईकोर्ट में केस चल रहा है ये बात आप मीडिया वाले क्यों नही बताते हैं?

4.  भारत में अब तक जितने भी दंगे हुए हैं और दंगो के बाद सरकारों ने जो भी कदम उठाये हैं और गुजरात के दंगो के बाद मोदी जी ने जो कदम उठाये उनकी तुलना आप अपने मापदंडो पे करके देश को सच बताये की किस सरकार ने दंगों से निबटने के लिए सबसे ज्यादा प्रभावशाली कदम उठाये थे?

5.  1969 के गुजरात दंगो; 1984 के सिख दंगो; 1986, 1992 के मुंबई दंगो; मुरादाबाद के दंगो; बिहार के दंगो; गोपालगड, राजस्थान में हुए दंगो और अभी असम में हुए दंगो के लिए कौन सी पार्टी जिमेदार है?

साभार:  मीनाक्षी लेखी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी।

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और क्या सेक्युलर मीडिया ने अंसारी के बारे में इस खबर को भी उजागर किया? और अगर नहीं किया तो क्यों नहीं किया? 
 

“अंसारी का कहना है कि लोग अपने फायदे के लिए मेरे फोटो का उपयोग करते हैं। दंगों के कई साल बाद भी मुझे चैन नहीं है। लोगों ने मेरी शांति को नष्ट कर दिया है। मैंने जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश की लेकिन कहीं न कहीं, कोई न कोई मेरा फोटो दिखाकर मुझे फिर पीछे मुड़कर देखने के लिए मजबूर करता है।अंसारी ने खुद को कलंक के रूप में पेश करने को लेकर फिल्म निर्माताओं को कानूनी नोटिस भी भेजा है। 38 साल के अंसारी खुद की तस्वीर को बार बार दिखाने से तंग आ चुका है। उसका कहना है कि मुझे दया के पात्र के रूप में दिखाया जाता है। मैं अपनी प्लास्टिक सर्जरी करवाना चाहता हूं ताकि लोग मुझे नहीं पहचान सके।”
 

साभार:  That’s Me

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गोधरा सेक्युलर मीडिया को कभी सही संदर्भो में क्यों नहीं याद आता?

गोधरा सेक्युलर मीडिया को कभी सही संदर्भो में क्यों नहीं याद आता?

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Globalization Is A Great Leveller: Patterns Of Exploitation And Corruption Now Become Same In India And Peru!

Bambamarca:  A Beautiful Place In Peru Haunted By Illegal Mining! Such places would become history!

Bambamarca: A Beautiful Place In Peru Haunted By Illegal Mining! Such Places Would Become History!


Globalization has reduced differences in geographical terms. But, at the same time, it has also changed the geography in a crude way by mindless destruction of flora and fauna. The sad thing about whole affair is that the stories depicting better aspects of globalization do reach us regularly but the negative sides either get censored or, for that matter, fail to get extensive coverage. Just to take an example, the commercials promote McDonald’s pizzas and burgers but are there enough advertisements which highlight the negative effect of consuming them?  Globalization believes in the fact that “all that glitters is gold”. It has nothing to do with pains of exploited workers who work in MNCs like a caged parrot, having no power to execute their discretion other than one serving the interests of global masters.

Sometimes back S Ambika, a 22 year old woman factory-worker, permanently employed at Nokia Telecom Special Economic Zone (SEZ) in Sriperumbadur in Kancheepuram district of Tamil Nadu, got killed in a tragic way when she tried to repair the jam inside the loader machine. It proved to be fatal exercise for her since she was not a technician, but she still came to do that to meet the production targets. A wait for the technicians meant slowing the pace of production! That’s one of the stories, which reveal in sad way the plight of people working in MNCs.

Vaibhav Mani Tripathi, a by-product of Jawahar Lal University (JNU), in his research paper titled, “Democracy and globalization: Are they really compatible”, highlights the ways and means employed by the MNCs to ensure growth in democracies across the globe. ” In democracies of third world, which are new and have lesser degree of accountable governments; methods of bribery, and loot system were adopted by MNCs, in order to get established. By dealing in such ways MNCs get some illegal relaxations and manage to cut cost by getting cheapest labour and denying rules of pollution control etc. In democracies, which are most established and transparent, MNCs change their techniques. By promising high taxes and employment to countrymen, they demand for special industrial estates or special economic zones. This is the biggest irony of Globalization. They demand tax relaxations in order to get established and they promise government to pay huge aid for fighting poverty, pollution and social evils like AIDS!”  

One having a close look at the progress stories of various countries, especially the nations trying to emerge as economic giants, one would find that exploitation of workers along with rapid destruction of ecological balance are the integral part of every such story! Before I contrast the happenings in two different countries, India and Peru, to highlight the woes of globalization, I wish to highlight grave tale of negligence which suggests that so-called progress is not only destroying cherished values but also destroying cultural artifacts. One of Belize’s largest Mayan pyramids, which remained in existence for more than 2,300 years, got destroyed by a construction crew involved in a road project.The company used the structure’s limestone walls as road fill! In fact, Time Magazine reports that “much of the monumental architecture at Belize’s San Estevan site, which dates back to 800 B.C., was bulldozed during the late 1990s to provide material for roads.”

From Belize in Central America, now, let’s move to Peru in South America to notice the impact of gold rush in amazon! The lust for gold in other nations keeps increasing but the heavy price other nations pays to satiate the lust never becomes subject of discussion in mainstream media. True, there is lack of jobs and illegal gold mining ensures survival of large number of families but then how can one ignore the dangerous consequences of deforestation in Amazon? A report issued by NASA says that ‘with the price of gold skyrocketing (360 percent in 10 years from 2001 to 2011), unlicensed miners began pouring into Peru’s Madre de Dios. They cleared 12,500 acres from the forest between 2003–2009. Landsat images showed local deforestation increasing at a rate of 26 percent per year.”

The report also highlights the fatal consequences of mercury used in the mining process. The extracts of mercury which after vaporization turn airborne contaminate the water resources, which later enter into the bodies of residents.  A very recent study suggests “unsafe levels of the toxic metal in almost 80% of adults and 60% of fish sold at local markets” in Peru. The Peru’s mining department taking stern steps against illegal mining began raiding Madre de Dios. That has led to tense formation between miners, environmental activists and the authorities. However, it appears that such strict steps are now a necessity  to reduce the loss of forest area in amazon, which has already lost 18,000 hectares. Needless to state, that Peruvian amazon is remarkable for   its large degree of biodiversity. 

Farmers Protesting In Peru!

Farmers Protesting In Peru!

India is also facing severe consequences caused by deforestation. One of the major causes of deforestation has been depletion of forests to extract minerals of various types. Expansion of agriculture, timber harvesting and shifting cultivation are some of the prime reasons for loss of forest area in India. However, another grim consequence has been displacement of tribal people, leading to militant movement like Naxalism. It establishes something quite well that pattern of exploitation in India and Peru is one and the same and in both the places original inhabitants are in direct conflict with the authorities. If Peru is tormented by illegal gold mining, India is haunted by illegal coal mining and diamond mining! The “Coalgate scam” has clearly revealed that how sensitive rulers of this nation have been while dealing with mineral resources of this nation. In other words, globalization has ensured huge profits for government and private bodies but the same profit never got distributed to tribal people-ones who were responsible for protecting these resources. On the contrary, they got displaced and faced bullets instead of receiving rewards for their indigenous efforts. Now if we see such developments in light of environmental issues, like erratic weather pattern in Indian subcontinent, the situation is pretty grim.

Even Children Protested In Nandigram!

Even Children Protested In Nandigram!

It’s good that people, the ones affected by government’s poorly planned projects, have learnt to come in conflict with the authorities. Nandigram bears testimony to the fact that the Special Economic Zones, not taking care of interests of people in judicious way, shall always meet fierce opposition from people. The farmers in Uttar Pradesh also entered in violent protests in year 2011 over land acquisition policy framed by the state government. The trend pattern involved is that big corporate houses either forcibly acquire the land or they come to acquire it in fraudulent means by keeping in dark the actual content of the deal. The Allahabad High Court staying Ganga Expressway project, expressed deep anguish the way it got initiated without having environmental clearance! This project involving JP Group required acquisition of huge lands situated in the alluvial belt and still no homework was done on part of state government.

Even Indian Farmers Are Protesting!

Even Indian Farmers Are Protesting!

One can notice that how rules get manipulated to benefit big corporations, caring a damn for the interests of people. In fact, the concerns related with environment also get neglected. It’s not hard to decipher that two nations even if they are situated  in different continents could still exhibit similar pattern of exploitation and corruption. Globalization has not only roped in similar lifestyle patterns across the globe but also introduced identical methods of corruption. And who is the victim? The underprivileged, who never gets a chance to visit McDonald, who never gets a chance to buy gold ornaments, and who also never gets a chance to drive SUV on Expressways!  Noam Chomsky sounds quite right when he says that ‘  Market discipline is perfect for poor people in El Salvador, or working mothers in the slums. They have to learn responsibility, but not the rich and the powerful. They have to be protected.”

References:

Madhumita Dutta And Venkatachandrika Radhakrishnan: Ambika’s Death; An Article Published In Kafila.

Ollie John: Road Workers Destroy Ancient Mayan Pyramid; Time Magazine 

Cecilia Jamasmie: Mercury pollution linked to illegal gold mining in Peru reaches lethal levels

NASA: Gold Mining In The Peruvian Amazon

The Hindu: Protest against power plant in U.P. hits 1000th day

The Economic Times: UP agitation: Farmers protest continue on Day 2; four dead

Noam Chomsky: Can Civilization Survive Capitalism?

Noam Chomsky:  Globalization: The New Face of Capitalism

“Democracy and globalization: Are they really compatible”- An article by Vaibhav Mani Tripathi in Aavartan.

See The Impact Of Illegal Mining In Goa!

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