कहते तो है कि भारतीय गणतंत्र बड़ी उम्मीदें जगाता है विश्व के उन कोनो में जहाँ और सरकारें तमाम तरीको के विरोधाभासों में लिपटी हुई है। उनके लिए भारत में गणतंत्र का लोप एक खतरे के घंटी से कम नहीं है। खासकर जब चीन से तुलना की जाती है तो ये जरूर दर्शा दिया जाता है कि वह पे कितनी दमनकारी व्यवस्था है जहा लोगो पे जुर्म तो होते है, लोगो को सताया तो जाता है लेकिन सेंसरशिप की वजह से कुछ सामने नहीं आ पाता। पडोसी मुल्क पाकिस्तान में फैली अराजकता को देखे जो वैश्विक आतंकवाद का पालन पोषण करने वाला है तो अपना देश किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता। तो क्या परिस्थितयां वाकई इस देश में इतनी सुधरी है? लगता तो नहीं है अगर हम सूक्ष्म निगाहों से देखे तो।
इसकी एक वजह ये है कि इस देश में सरकार जरूर आम लोगो के दम से बनती है लेकिन उसका आम लोगो के दुःख दर्द से इसका कोई सरोकार नहीं। एक दिखावटी लगाव जरूर है लेकिन वह मूलतः अपने को सत्ता में बनाये रखने भर का जुगाड़ भर है बस। ये कैसी बिडम्बना है कि जिस सरकार ने गरीबी हटाओ का लक्ष्य दिया उसी ने इमरजेंसी भी थोपी इस देश में। सारी संवैधानिक संस्थाओ को जानबूझकर कमजोर किया गया। ये उस सरकार के द्वारा किया गया जिसके नुमाइन्दे आज लोगो के सुरक्षा का दम भरते है। हमारी भोली जनता जनार्दन फटी शर्ट में हाथ में मोबाईल लिए ये समझती है कि हम किसी सुनहरी दुनिया में प्रवेश करने वाले है भविष्य में। इस मृग मरीचिका में भारत वासी उलझे हुए है। क्रिकेट, लौंडिया, बेतहाशा पैसा कमाने का जूनून किसी भी कीमत पर ये हमारे देश के नेशनल पैशन है। लोगो को की इस बात से परवाह नहीं है कि उनकी चमचमाती गाड़ी गाली गलौज, खुले मैनहोल और गड्ढो में सड़क पर चल रही है बढ़ी हुई पेट्रोल के कीमतों के साथ ही बढती रफ़्तार के साथ।
मार्कंडेय काटजू, भूतपूर्व सुप्रीम कोर्ट जज, लोगो को मूढ़ तो मानते है लेकिन ये जरूर दर्शा देते है कि साहब इस देश में असल शासन तो सिर्फ आम जनता का ही है। उनके हिसाब से यहाँ राजशाही नहीं प्रजातन्त्र है जहा हर अधिकारी जिसमे नेता और जज भी शामिल है आम आदमी का गुलाम भर है। ये नौकर है और आम आदमी उनका “मास्टर” है। जैसे काटजू साहब लोगो की क्षुद्र मानसिकता पर सवाल उठाते है उसी तरह मुझे भी समझ में नहीं आता कि इनके इतने हसीन इंटरप्रिटेशन को, इतने सिम्प्लिस्टिक अप्प्रोच को किस निगाहों से देखा जाए जहा पे किसी ख़ास पार्टी के गुंडे इसलिए पुलिस अधिकारी को अपनी जीप के पीछे लखनऊ के सडको पर घसीटते हुए ले गए थें कि उसने प्रतिरोध किया था उनके गलत तरीको का। या कोई अदना सा पुलिस का कांस्टेबल भी किसी प्रोफेसर को सडको पर माँ बहन की गालिया दे सकता है जरा सी बात पर। तो आम आदमी को क्या इज्ज़त मिलती होगी सरकारी चमचो से ये सहज ही सोचा जा सकता है। आप भी सोचे कि हमारा गणतंत्र कितना वास्तविक है जो मेरी नज़रो में अय्याशो और गुंडों पे टिका भीड़तंत्र है । धूमिल की ये पंक्तिया आज भी बहुत सटीक बैठती है:
“हर तरफ धुआं है
हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है
अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता। यहां
कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिए, सबसे भद्दी
गाली है
हर तरफ कुआं है
हर तरफ खाईं है
यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है”

जस्टिस काटजू: आम आदमी मास्टर है और सरकारी अफसर/नेता उसके ग़ुलाम है प्रजातंत्र/गणतंत्र में। कितना सही है वो वास्तविक धरातल पर?
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Radhakrishna Lambu said:
टाइम लगेगा इंडियनस या हिन्दुओ को डेमोक्रेसी समझने में। अँगरेज़ भी रोमन्स के ग़ुलाम थे 400 साल तक। रोमन साम्राज्य ढह जाने के बाद वेस्टर्न यूरोप टूट गया था, फिर बना फ्रांस, जर्मनी, इटली, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स, आयरलैंड। बारवही शताब्दी में अंग्रेज़ के एक राजा ने ये बोला कि अंग्रेज़ सुपीरियर है। फिर स्कॉटलैंड, वेल्स, आयरलैंड पर conquest शुरू हुएँ जिससे UK बना। सोलवही शताब्दी से लेकर अब तक अँगरेज़ ही राज कर रहे है। बहुत वक्त लगेगा इंडिया को आगे बढ़ने में।…And on top of that, our industrialization is not complete yet, it is still in nascent stage. It is a painful process, but it must happen.
In last 1000 years, HINDUS OR INDIA had seen TURMOIL, even though we overcame all the HURDLES, still our KNOWLEDGE SYSTEM got obliterated. IT takes time. Now we are getting a sense of history. We need to have Indianness, in our KNOWLEDGE SYSTEM, Indianness in engineering, or anything. Only then, we will be a civilization which can turn the tables on any given day
Author’s Response:
सारगर्भित टिप्पणी देने के लिए धन्यवाद। ये देश जिस तरीके से आगे बढ़ रहा है मंजिल लक्ष्य से ज्यादा खतरनाक हो चला है। बात सिर्फ इतनी सी है।
धन्यवाद इन पाठको को भी:
Ravi Hooda, Canada; Deepak Sarin; Brittle Hearted, Kolkata; Sudhir Dwivedi, New Delhi; Anand G. Sharmaji, Mumbai; Vidheshwari Pandey, Rewa, Madhya Pradesh; Mudit Pandey, Bangalore; Inderjit Kaur,Jalandhar,Punjab; Debasis Pandey,Puri, Orissa; Ankit Sharmaji, Ahmedabad, Gujarat; Swami Prabhu Chaitanya, Patna, Bihar; Nita Pandey, Chennai, Tamil Nadu, and Himanshu B.Pandey, Siwan, Bihar.
Using an online Hindi translator, I was able to read it:
“The Indian republic is called great expectations of the world fosters the कोनो where the liberalization and governments of all the ways. In India for deletion of the Republic of a danger from bell is no less. especially when compared with China, it is but they show is given…”
How cool is that?!
@ Laurie Buchanan
Many thanks for going out of the way to comment on this post. I am taken aback by your sincerity
…Well, the online translator did not do the job well for you. So let me supply you the exact version of the said paragraph. Whenever I have also used online translators, I have also got such weird interpretations ha..ha..ha
I was trying to drive home the point that India is hailed as successful democracy among the wold- a role model for all the nations wherein rulers are behaving in autocratic fashion. In India, however, the real power lies in hand of people.
However, I have tried to present a different picture that even though India proclaims that ordinary citizens are the ones who enjoy real power, the real power lies in hand of corrupt politicians and bureaucrats, using the innocence of electorates to serve their own vested interests. The point is if democracy fails in India, it would sound a death knell for all other democracies across the world. So let’s try to make democracy successful in meaningful terms in our country instead of making it a tool to serve the interests of unholy nexus between haughty bureaucrats- greedy businessmen- corrupt politicians.
Let’s not come to vain conclusion that we are a better nation only because our neighbor Pakistan-the sponsor of global Islamic terrorism- and China, the one involved in brutal suppression of rights of its people, are in mess. Instead, the political heads in this nation should make democracy come alive in real way.
Anand G. Sharmaji, Mumbai, said:
पिछले 64 वर्षों से मुल्क के अवाम को गुमराह कर के लूटा जा रहा है – और अब तो आलम यह है कि अवाम को भी लुटने में मजा आने लगा है । बहुत दिनों से किसी घोटाले की खबर नहीं आयी – बहुत सूना सूना लग रहा है ।
Author’s Response:
देखिये घोटाले की खबर आते ही Archimedes की तरह यूरेका-2 कहते कहते किसी टब से बाहर न निकल आइयेगा वरना घोटाले के बाद स्कैंडल हो जाएगा।वैसे भी हिन्दुओ को व्यर्थ ही बदनाम किया जा रहा है हा हा हा
Author’s Words For Mr. Rajendra Mishraji, Poet/Journalist, Chunar, Mirazapur, Uttar Pradesh:
लेख पर दृष्टि डालने के लिए धन्यवाद। एक लेख की सार्थकता इसी बात में होती है कि आप जैसे सार्थक पाठको के आगमन से उसमे निहित बात ना सिर्फ दूर तक पहुचती है वरन वो देर सबेर क्रियान्वन में भी आ जाता है।।।।