दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म: कुछ वो बाते जिन्हें बताने, दिखाने और समझाने सें मेनस्ट्रीम मीडिया कन्नी काट गया!

दिल्ली में 16 दिसम्बर की रात हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है।

दिल्ली में 16 दिसम्बर की रात हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है।

दिल्ली में 16 दिसम्बर की रात हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है। इसकी वीभत्सता और दरिंदगी का अंदाज़ लगाने में  शायद रूह भी काँप जाए अगर हम इस घटना के बारीकी में जाकर देखे जैसा समाचार पत्रों या अन्य माध्यमो से हमे पता चला है। उसके बाद इंडिया गेट और जंतर मंतर पर हुएँ प्रदर्शनों से हमे ये समझ में आया कि चलिए लोगो में रोष को स्वर देने का सलीका तो आया। लेकिन कुछ ऐसी बाते है जो मेनस्ट्रीम मीडिया में अब तक चर्चा का बिंदु नहीं बन सकी। सो एक कोशिश है प्रबुद्ध पाठको का ध्यान उन पहलुओ की  तरफ खीचना की ।

ये तो तय है कि आसुरी तत्त्वों की प्रधानता हो चली है जिसमे अराजक तत्त्व कुछ भी करके चलते बनते है और एक बड़ा वर्ग सिर्फ चुपचाप खड़ा सा देखता रहता है। सो  जवाबदेही सिर्फ उन लोगो की ही नहीं बनती है जिन्होंने इस कुकर्म को अंजाम दिया। वास्तविक जिम्मेदारी उन लोगो की बनती है जिन्होंने सिस्टम को चलाने का ठेका ले रखा है: राजनेता, प्रशासन, न्यायपालिका और समाज के विभिन्न अंगो के लोग जिनमे से शायद कुछ धरने प्रदर्शन में भी शामिल होंगे। इस मुद्दे का बहुत महीन विश्लेषण करने की जरूरत है। इसके पहले मै विश्लेषण करू इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि अधिकतर प्रदर्शनकारी जो इंडिया गेट पर शामिल थें दुष्कर्म के आरोपियों को मौत की सजा के पक्षधर थें। जैसा कि इन विरोध प्रदर्शन के साथ होता है कुछ फेमिनिस्ट स्पॉन्सर्ड संस्थाएं और कुछ सेकुलर लोग भी अपने हित के लिए इन विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए। जहाँ तक आम आदमी के गुस्से की बात है वो समझ में आता है मगर इन जैसे लोगो का विरोध प्रदर्शन या तो सत्ता के लिए होता है या सिर्फ विदेशी संस्थानों से धन उगाहने के खातिर होता है। ऐसे लोग आपको मानवाधिकार की बाते इन अवसरों पर ज्यादा करते दिख जायेंगे।

सो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ इन दुष्कर्म के आरोपियों को मौत का मांग करती इन तथाकथित प्रदर्शनकारियों पर जो दबाव बना रहे है कि ऐसे कृत्यों के लिए मौत की सजा दी जाए। इस बहस में मै नहीं पड़ना चाहूँगा कि मौत की सजा कितनी जायज होगी पर ये जरूर याद दिलाना  चाहूँगा कि अभी कुछ दिनों पहले जब अजमल कसाब को मौत की सजा दी गयी थी तो हमारे  धर्मनिरपेक्ष समाचार पत्र  द हिन्दू ने हमेशा की तरह एमनेस्टी इंटरनेशनल के माध्यम से विधवा विलाप करते हुए ये जोर दे के कहा था कि मौत की सजा के प्रावधान को खत्म कर देना चाहिए। तो फिर किस मुंह से ये संस्थाएं, काफिला जैसी बकवास पत्रिकाएँ मौत की सजा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वकालत कर रही है? ये दोहरा मापदंड क्यों? ये जानना भी जरूरी हो जाता है कि इस तरह प्रदर्शन में शामिल होने वाले अक्सर वो लोग होते है जिन्होंने सिस्टम को बदलने के लिए कोई ख़ास कवायद नहीं की होती  है। इस सेलेक्टिव चेतना पर घोर आश्चर्य भी होता है और क्षोभ भी होता है। मोहल्ले में बिजली चले जाने, तार टूट जाने पर सबसे ज्यादा शोर मचाने वाले वो लोग होते है जो पावर हाउस में कंप्लेंट दर्ज कराने में भी अपनी  तौहीन समझते है। करप्शन पर सबसे ज्यादा वजनदार लेक्चर वो देते है जिनको इस बात से कोई फर्क  नहीं पड़ता कि उनका जनप्रतिनिधि कैसा है और ये कि उनके वोट न देने से गलत लोग सिस्टम में आ रहे है। इसका नतीजा ये होता है कि कोई जातिवाद के जरिये सत्ता में आकर कुकर्म करता  है तो कोई मुस्लिम कार्ड खेलकर तो कोई  बेरोज़गारी भत्ता/लैपटाप जैसी वाहियात स्कीम से सत्ता सुख का जुगाड़ कर लेता है।

क्यों दुष्कर्म जैसे अपराध या अन्य अपराध चरम पर है उसका एक सबसे अहम कारण है कि हमारे सिस्टम में सही चीज़ के लिए या सही लोगो के लिए कोई जगह नहीं। और न्याय भी इतनी देर से मिलता है कि उसकी कोई अहमियत नहीं रह जाती। ये सिस्टम किस तरह से काम करता है ये देखिये। किसी एक समारोह में एक सज्जन व्यक्ति नें अपनी आपबीती बयान करते हुए ये बताया कि सड़क हादसे मे मृत व्यक्ति के बारे में जब सूचना देने थाने पहुचे तो दरोगाजी ने उसे मर्डर के चार्ज की धमकी देते हुए थाने पे ही रोक  लिया। बाद में वो खुद पच्चीस हज़ार की रकम को देकर किसी  तरह थाने से सकुशल घर पहुच सके। खुद इसी प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कांस्टेबल की मौत का मामला देखिये।  जहा एक ओर प्रत्यक्षदर्शी, जो समाचार पत्रों  के अनुसार पत्रकारिता का छात्र है, के अनुसार मौत सहज है, पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट के अनुसार गहरे धारदार चोट से हुई है। इस मौत का जिम्मेदार कौन है और कौन इसकी भरपाई करेगा? सिर्फ सख्त क़ानूनी प्रावधान बना देने भर से क्या होगा जब आपका सिस्टम इतना सड़ गल चूका है कि किसी भी कानून के दुरूपयोग के सम्भावनाएं असीमित हो जाती है और सदुपयोग सीमित हो जाता है। दहेज़ हत्या के प्रावधान और एस सी एस टी एक्ट का हश्र देखिये। अपने गाँव में जो मिर्ज़ापुर जिले में पड़ता है मेरे खेत पर कुछ अनुसूचित जाति के लोगो ने अवैध रूप से झोपड़ी बनाकर कुछ हिस्से पे काबिज हो गए है। सीधी कार्यवाही से इनको हटवा सकता था मगर मुझे पता था ये एक्ट के तहत दांव खेल सकते है इसलिए न्यायालय की लम्बी प्रक्रिया के तहत मंद गति से कार्यवाही चल रही है।   

इसलिए विरोध प्रदर्शन जो “हैंग द रेपिस्ट्स” तक ही केन्द्रित हो उठा है वो खतरनाक है। इस सीमित सोच से बात नहीं बनेगी जब तक सिस्टम का हर अंग सुचारू रूप से काम न करे।  आप देखिये जिस वक्त दुष्कर्म की शिकार इस लड़की के लिए उत्तेजित भीड़  इंडिया गेट पर तख्ती, बैनर, मोमबत्ती के सहारे अपनी बात कह  रही थी ठीक उसी वक्त उत्तर  प्रदेश में  एक अभागी माँ  सामूहिक दुष्कर्म की शिकार अपनी बेटी, जिसने आत्मदाह कर लिया इस घटना के बाद , न्याय के लिए भटक रही है , धरने पर बैठी है जिलाधिकारी कार्यालय पर कोई  सुनवाई नहीं, उल्टा पुलिस ने मनगढ़ंत कहानी रच डाली है। दूसरा आप सेलेक्टिव चेतना से ऊपर उठें। क्या बात है कि गरीब  किसान क़र्ज़ में डूबकर आत्मदाह कर लेते है पर उसके लिए कभी जनाक्रोश नहीं उभरता बल्कि सरकार  खरीद मूल्य और कम कर देती है, उसके द्वारा उगाये अन्न सड़ कर गल जाए इसकी व्यवस्था सुनिश्चित कर देती है। अफज़ल गुरु की फांसी टलती जा रही है  जबकि इस प्रकरण से जुड़े शहीद परिवार के लोग संसद के आगे आत्मदाह तक कर डाल रहे है पर हम खामोश रहते है। व्यवस्था को जड़ से हटाने के लिए तब अन्ना, रामदेव या अरविन्द केजरीवाल जैसो को सामने आना पड़ता है, जिनको मिटाने और तोड़ने की हर साज़िश सरकार कर डालती है पर समाज का हमारा एक बड़ा वर्ग निश्चिंत होकर बीवी बच्चो के लिए मगन होकर अथाह पैसा सही गलत तरीके से बना रहा होता है। तब रोष या आक्रोश नहीं उभरता है। लिहाज़ा इस सामूहिक दुष्कर्म का शिकार इस लड़की के लिए उभरे आक्रोश पर ख़ुशी तो है पर  इसकी अपूर्णता का भान होते ही ख़ुशी काफूर हो जाती है।

ये बात हमको समझ में आना चाहिए कि जहा सिस्टम इतना दोषपूर्ण हो चला है कि जब तक हम सच और झूठ का फैसला कर पाते है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है वहा पर सख्त कानून बना देने भर से उलझने और समस्याएं और बढ़ सकती है। हम आज जिस समाज में रहते है वहा  दुष्कर्म भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, स्त्रिया भी उतनी ही अय्याश बन कर उभरी है जितने की पुरुष और उन्हें अपने मकसद के लिए नीचे गिरने में कोई संकोच नहीं है लिहाज़ा अगर आप सख्त कानून बनाते है बिना सिस्टम में उतने ही बारीक सुधार किये तो ये तय है कि इस तरह के कानून से समाज में बिखराव और बढेगा। इससे बेहतर तरीका ये रहेगा कि उपभोक्तावादी संस्कृति में स्त्री पुरुष अपने आचरण को लेकर सजग रहे बजाय हर बदलाव के लिए कानून की बैसाखी का सहारा लेने के लिए।  इंडिया गेट पर प्रदर्शन हर्ष तो देता है पर इस बात का भान तो सदा बना रहता कि स्वार्थी तत्त्व इनको अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते है जिससे बजाय कोई अच्छा हित सधने से स्त्री-पुरुष के बीच वैमनस्य की खाई और चौड़ी हो जाती है। अगर हम इनसे ऊपर उठकर, इनसे बच कर अपनी लड़ाई लड़ सके तो समाज का सचमुच में भला हो सकेगा नहीं तो ऐसे आक्रोश स्वार्थी तत्त्वों का सिर्फ हित साधने का साधन भर बन के रह जाते है। सड़ी गली सेक्युलर संस्थाएं ऐसे ही आक्रोश को सामाज विरोधी शक्ल दे देते है। सो गुस्सा सार्थक बदलाव के लिए करे ना कि गलत लोगो का  हित साधने के लिए करे। अंत में  लोगो का आक्रोश क्या रंग लाता है  ये तो वक्त बतायेगा पर उम्मीद है कि सिंगापुर के हास्पिटल में भर्ती ये बहादुर लड़की जल्द ही स्वस्थ होकर बाहर फिर उन्मुक्त होकर विचरण कर सकेगी।  

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19 responses

  1. @Laurie Buchanan, Holistic Health Practitioner—Board Certified with the American Association of Drugless Practitioners, USA:

    Many thanks for liking the post…

  2. Bhaot sahi Arvind ji agar iska koi upaya hai to wo ye hai ki aap jaise log kalam ke madhyam se ye baat jan jan tak pahunchaaye tabhi kuch sambhav ho sakata hai is goongi behri sarkaar ke saamne .Aur sabse badi baat ki insaan ko apne kartavya ka gayan hona chahiye ki sirf dharm aur jaati ke naam pe vote dene se ek galat sarkaar chunnke aati hai,Aur aisi sarkaar se sirf aam log hi nahi trast rehte balki iska khamiyaza pura desh bhugatata hai.

    1. @Sudhir Dwivediji,

      तभी तो वक्त की कमी के बावजूद अब हिंदी संस्करण के बाद इसके अंग्रेजी संस्करण की तैयारी है।।। आप जैसे सुलझे, चेतनासंपन्न पाठको/मित्रो से बल मिलता है। आप तो नई दिल्ली में ही है।।आपने नज़दीक से चीजों को देखा होगा। बहुत कुछ पहले ही कहा जा चूका है। लिहाज़ा सिर्फ इतना ही कहूँगा कि सिर्फ जोश में संघर्ष में कूदने से कुछ नहीं होता सिर्फ ये कि आप गलत ताकतों के जरिये इस्तेमाल होने लगते है। बाकी तो आप को मनन करने के लिए मैंने ढेर सारे बिंदु तो दे ही दिया है। वैसे उम्मीद है कि ये ज़िन्दगी और मौत की जंग लडती ये लड़की विजयी बन कर उभरेगी।

  3. Vijai K Singh said:

    ठीक कहा …..

    Author’s Response:

    अब जो शोर मचाने वाले नहीं कह पाए तो मुझे तो ये सब बताना ही था अंधे बहरे लोगो को।।।

  4. Sudhir Gawandalkar, Bangalore, Karnataka, said:

    अरविन्दजी , बहुत अच्छा लिखा है।।।

    Author’s Response:

    धन्यवाद इसे नए तरीकें से समझने के लिए।।।

  5. इन पाठको को विशेष रूप से धन्यवाद इस लेख पर नज़र डालने के लिए।।।

    Ashok Kumar Tiwari ,Chief Medical Officer, Bagaha, Bihar; Bachharaj Apurwa, Dammam, Saudi Arabia; Naeem Ahmed Malik, Karachi, Pakistan; Swami Prabhu Chaitanya, Patna, Bihar; Ranbir Bahadur Singhji, Calcutta, West Bengal; Yogesh Pandey, Lucknow, Uttar Pradesh; Nityanand Sharmajo; Vishnu Dutt Tyagi, Asst. Teacher; Mohar Singh Munda,JMG-1 OFFICER at Punjab National Bank, Ranchi, Jharkhand; Jitendar Kumar Agarwalji, Lawyer, Jalandhar,Punjab; Taha Baloch; DrManoj Agrawal, Senior Resident Doctor, Dehri-on-Sone, Bihar;Guddu Pandey; Shakteesh Dwivedi, Allahabad, Uttar Pradesh; Rajendra Rathoud,Bureau Chief,Rajasthan Patrika,Janjgir, Chhattīsgarh; Prakash Chandra, Patna Bihar; Shubhranshu Pandey’ Butul’, Advocate, Allahabad High Court, Allahabad; Ashish Nigam,Advocate, Allahabad High Court, Allahabad; Shashikant Singh, Patna, Bihar; Kumar Vidrohi, New Delhi; Himanshu B. Pandey, Siwan, Bihar;Vikas Kumar, Allahabad, Uttar Pradesh; Vivek Singh,Jaipur,Rajasthan; Akpn Singh, Haridwar, Uttarakhand; Vijay Krishna Pandey, Gorakhpur, Uttar Pradesh; Ajay Tyagi, Noida,Uttar Pradesh; Manjoy Laxmi, Nagpur,Maharashtra; Nita Pandey, Chennai, Tamil Nadu, and Rakesh Pandey, Bhopal, Madhya Pradesh.

  6. @Arvind K Pandey जी के आलेख से सहमत हूँ ……. मूल प्रश्न है कि ऐसी घटनाएं यदि थोड़ी सतर्कता हो और छोटी छोटी चीजों को नजरअंदाज ना किया जाए तो शायद इनमे कोई रोक लगे?

    मेरा अपना निजी विचार है कि फाँसी इस व्यवस्था का हल नहीं है! बेहतर हो कि ऐसी प्रवृत्तियों पर प्रारम्भिक अवस्था में ही रोक लगाईं जाए …… और वह बेहतर पोलिसिंग और एक समान पोलिसिंग से ही संभव है!

    1. @Praveen Trivediji:

      आपको बहुत धन्यवाद कि आपने अपने सचेत होने का प्रमाण दिया। हर्ष हुआ कि आपने लेख का इस तरह से उल्लेख किया।। सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा अभी कि नज़रंदाज़ कर देने से चीज़े सिर्फ और उलझ जाती है हल नहीं होती। हम बार टानिक देकर बच निकलते है जबकि असल जरूरत सर्जरी की होती है।…

  7. Brijesh Shrivastava, Asst. Teacher, Jalaun, Uttar Pradesh:

    जी हाँ ! मैं भी आपसे और अरविन्द जी से सहमत हूँ जब तक सिस्टम में बदलाव नहीं होगा तब तक कोई भी कानून बेकार है…

    Bholanath Kushwaha, Journalist, Mirzapur, said:

    Kade kanoon, suraksha dono jaruri hai….

  8. Teekam Singh Rathore,प्रभारी प्रधानाध्यापक, Firozabad, Uttar Pradesh, said:

    इस दुनिया में विभिन्न प्रकार के लोग है ।स्वअनुशासित लोगों से समाज को कोई खतरा नहीं है क्योंकि वे ही समाज के लिए दिग्दर्शक होते हैं ।

    दुसरे अनुशासनहीन लोगों में वे जो दूसरों के द्वारा अनुशासित होते हैं उन्हें खुद को सामाजिक नियमों की जानकारी या तो होती नहीं है या वे प्रायः उन नियमों की अनदेखी करते हैं ।

    एक अन्य प्रकार के लोग जिन्हें सामाजिक नियमों की जानकारी भी होती है और उनके परिणामों की जानकारी भी होती है । परन्तु फिर भी वे उन नियमों को अक्सर तोड़कर समाज के नियमों को चुनोती देने खड़े हो जाते है ।

    इन लोगों को अनुशासित करने के लिए समाज के स्व अनुशासित लोगों को आगे आकर उन्हें सबक सिखाना ही होगा चाहे इसके लिए उन्हें कड़े से कड़ा दण्ड ही क्यों न देना पड़े ।

    Praveen Trivediji said:

    सबक देने के लिए end point तक जाने से बचना चाहिए ……. क्यों नहीं कडवी दवा पहली अवस्था से ही दे दी जाए?

    *********************************

    Praveen Trivediji said:

    Arvind K Pandey जी …… आपके आलेख में कुछ था ही ऐसा …..लेकिन ठीक वैसा चाह कर भी नहीं लिख पाया सो ……..

    ******************************

  9. कुछ गौर करने वाली और बाते जिन्हें सोचने समझने वालो ने फेसबुक पर रखा इस लेख के सापेक्ष:

    *********************

    Teekam Singh Rathore said:

    कडवी दवा देगा कौन ?यही तो यक्ष प्रश्न है …..इस दवा के लिए यदि हम शासन, प्रशासन, पुलिस का मुंह ताकेंगे तो फिर तो उस व्यक्ति के हौसले बढेंगे ही । इसलिए उसे कडवी दवा देने का सहस भी हमें ही करना होगा ।

    ********************

    Praveen Trivedi said:

    सहमत हूँ लेकिन जिसका दायित्व है वह ना दे तो जिम्मेदारी का क्या ? सवाल है कि हर आदमी को क्रांतिकारी बनाने से अच्छा है जो जिसकी जिम्मेदारी है वह उसको ठीक से निभाये !

    ******************
    Nirmal Paneri said:

    कड़वी दवा घर में सबके पड़ी है ….उसको खोलना और चम्मच में डालना साहस ..और उसको गिटवाना संस्कार की बातें है …और वही हम सब खो चुके/ये मानसिक इच्छा शक्ति पनपा नहीं पा रहें है कही हद तक हम 40 -60 साल के इंसानों ने खुद को आलसी बना दिया है …कड़वा लेकिन सच …और उसका कारन भी की हम नव संस्कृति से खुद को अच्चम्भित पा रहें है और देखने की लालसा भी ….!!एथिक्स का समय के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाए …सच सच तो ये ही है !!!

    *********************

    Teekam Singh Rathore said:

    !!श्रीमंत!! फिर तो वर्तमान सिस्टम को पूरी तरह परिवर्तित करना होगा ।मेरा मानना है कि हम स्वयं समझदार बने और दूसरों को बनायें ।

    *********

    Sudhir Singh said:

    केवल स्पीडी ट्राइल ही बहुत अंतर ला देगा। चालीस साल के बाद फाँसी से दो महीने के अन्दर बीस साल की जेल ज्यादा डर पैदा करेगी।।।

    *****************

    Arvind K.Pandey, Author Of The Post, said:

    ये कडवी दवा वाली बात को समझे जरा सा। अमेरिका में बहुत सख्त नियम है लेकिन फिर भी दुष्कर्म का ग्राफ चरम पर है। ये नैतिक मूल्यों के पतन की भी निशानी है – यूज़ एंड थ्रो संस्कृति। बिडम्बना ये है कि अपने देश में मूल्यों के उत्थान की बात नहीं कर सकते क्योकि इससें मॉडर्न विचारको के अनुसार हम समय में पीछे चले जाते है मतलब हिन्दू विचारधारा के हावी होने का खतरा पैदा हो जाता है। खैर बात दूसरी हो रही थी। कडवी दवा और सिस्टम को बदलने की। अमेरिका में माना सख्त कानून होने के बावजूद दुष्कर्म नहीं रुकता लेकिन इसके बावजूद उनका सिस्टम दुरुस्त है। वहा पे जुर्म होते ही ये सुनिश्चित हो जाता है कि आपको सजा मिलना तय है। यही भारत और अमेरिका में सबसे बड़ा अंतर है। यहाँ जुर्म करने के बाद आदमी निश्चिंत रहता है कि किसी न किसी स्तर पर जुगाड़ कर के बच जाएगा। तो जब कडुवी दवा और सिस्टम को बदलने की बात है तो वो कोई एक बारगी किसी सख्त नियम के एप्लीकेशन की बात नहीं हो रही है किसी व्यक्ति विशेष या संस्था के द्वारा। ये एक ऐसी व्यवस्था को जन्म देने की बात हो रही है जहाँ पर जुर्म करने वाले का बचकर निकलना नामुमकिन हो जाए, जहा अच्छे लोगो के लिए सम्मानित स्थान हो। इसके लिए अपने स्तर से जो भी हो सके वो हर आदमी करे। ये एक लम्बी प्रक्रिया है। ठहरे रहने से बात नहीं बनेगी सो बदलाव की प्रक्रिया अभी से शुरू हो जाए तो बेहतर है।

  10. Rajesh Pandey, Jalandhar, Punjab said:

    अब वह एक बेहतर दुनिया में होगी। जहां कोई उसकी हालत पर सियासत करने नहीं जाएगा। कोई उसपर झूठा लाड़ नहीं बरसाएगा। कोई उसे अमानत, दामिनी और निर्भया घोषित कर टीआरपी, रीडरशिप या लिस्नरशिप हासिल करने की कोशिश नहीं करेगा। उसके इलाज के नाम पर फंड्स इकट्ठा करने की मुहिम नहीं छेड़ेगा।

    Author’s Response:

    बिलकुल सही कहा आपने …इस मानव जगत की त्रासदी यही है कि आपके जख्म भी किसी के लिए फायदे की बात बन जाते है।। हर मसला संकीर्ण मनोवृत्ति या निजी लाभ में परिवर्तित हो जाता है। उम्मीद है कि उसकी नयी यात्रा बेहतर मंजिल पर जा कर रुकेगी।। ईश्वर उसकी आत्मा को शांति प्रदान करे।

  11. Ankit Sharma:

    All rapists must be hanged publicly….We are helpless Arvind ji

    Author’s Response:

    Sad about the developments in this regard….Let’s not lose hope…Even the most dark night is always followed by morning.

  12. Arun Prakash Srivastava, Allahabad, Uttar Pradesh, said:

    Arvind je, U are absolutely right….

    Author’s Response:

    It’s hard to find a perfect expression for happenings in this nation !!

  13. Deewaker Pandey, New Delhi, said:

    सही विवेचना…..यही सच है समाज का.

    Author’s Response:

    अभी कुछ नहीं कहना।।।। कोहरे की तरह एक उदासी की चादर भी छा गयी है मन पर।।।।

  14. Dharmendra Sharmaji said ( Not on This Post):

    Arvind K Pandey ji, यही तो विडम्बना है, कि पढ़े-लिखे तथाकथित माडर्न कहलानेवाले, पाश्चात्य संस्कृति का अनुकरण करने को आतुर लोगों से जो देश के महत्वपूर्ण पदों पर काबिज हैं, समाज प्रेरणा लेता है। (वो राजनेता भी हैं, अभिनेता भी हैं, आई ऐ एस भी हैं, समाजसेवक भी हैं, पत्रकार भी हैं) । ऐसे मुट्ठीभर लोग वातानुकूलित कमरों मे बैठकर, धूप मे झुलसते मध्यवर्ग के लिये आधुनिकता के मानदण्ड निर्धारित करते हैं ।

    Author’s Response:

    You sound so right..

  15. Sw Prabhu Chitanya | Reply

    जैसे एक बुरा और दुष्ट डॉक्टर कभी नहीं चाहता कि
    उसका धनी मरीज जल्दी ठीक हो जाये
    मुझे लगता है
    वैसी ही यह न्याय की व्यवस्था बनाई गई है कि
    एक बार इस में फँस कर
    लोग अपनी ज़िन्दगी तबाह कर लें

    कहावत यूँ ही नहीं बनी कि
    सुखी जीवन के लिए तीन चीजों से बचना चाहिये
    डॉक्टर (अस्पताल), दरोगा (पुलिस थाना) और वकील (कोर्ट – कचहरी).
    पहले दो से किसी तरह आदमी निबट भी जाये
    मगर न्याय व्यवस्था के जाल से निबटना सुनते हैं बहुत कठिन है

    शोषण के लिए दुरूह व्यवस्था रहना ही ठीक है
    लोगों को जल्दी न्याय मिल जायेगा तो बहुतों को खाना ही हज़म नहीं होगा
    वकीलों की फौज फीस और नाम का क्या होगा
    ये अंग्रेज़ बहुत बुरी गुलामी में हमें फँसा कर चले गए।

    और काले अंग्रेजों को भी अपना उल्लू सीधा करने के लिए
    व्यवस्था को वैसे ही बनाये रखने में फायदा दीखता है

    1. @Swami Prabhu Chaitanyaji

      आप सही कह रहे है। ये व्यवस्था आपके हित के लिए नहीं आपके शोषण के लिए बनायीं गयी है।।।। हद तो अब हो गयी है कि निजी लाभ के लिए डाक्टर बिना किसी कारण आपरेशन कर डाल रहे है।।। जरूरत है अपने स्तर से आप जितना सुधार सकते है सुधारे ताकि आगे आने वाले लोग बेहतर व्यवस्था में जी सके।।।

  16. Raghu Swami said:

    बलात्कार और आतंकवादी, इन दोनों के लिए फाँसी से कम में काम न चलेगा, किसी भी कीमत पर
    फाँसी….

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