Monthly Archives: December, 2012

दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म: कुछ वो बाते जिन्हें बताने, दिखाने और समझाने सें मेनस्ट्रीम मीडिया कन्नी काट गया!

दिल्ली में 16 दिसम्बर की रात हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है।

दिल्ली में 16 दिसम्बर की रात हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है।

दिल्ली में 16 दिसम्बर की रात हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना की जितनी भी निंदा की जाए वो कम है। इसकी वीभत्सता और दरिंदगी का अंदाज़ लगाने में  शायद रूह भी काँप जाए अगर हम इस घटना के बारीकी में जाकर देखे जैसा समाचार पत्रों या अन्य माध्यमो से हमे पता चला है। उसके बाद इंडिया गेट और जंतर मंतर पर हुएँ प्रदर्शनों से हमे ये समझ में आया कि चलिए लोगो में रोष को स्वर देने का सलीका तो आया। लेकिन कुछ ऐसी बाते है जो मेनस्ट्रीम मीडिया में अब तक चर्चा का बिंदु नहीं बन सकी। सो एक कोशिश है प्रबुद्ध पाठको का ध्यान उन पहलुओ की  तरफ खीचना की ।

ये तो तय है कि आसुरी तत्त्वों की प्रधानता हो चली है जिसमे अराजक तत्त्व कुछ भी करके चलते बनते है और एक बड़ा वर्ग सिर्फ चुपचाप खड़ा सा देखता रहता है। सो  जवाबदेही सिर्फ उन लोगो की ही नहीं बनती है जिन्होंने इस कुकर्म को अंजाम दिया। वास्तविक जिम्मेदारी उन लोगो की बनती है जिन्होंने सिस्टम को चलाने का ठेका ले रखा है: राजनेता, प्रशासन, न्यायपालिका और समाज के विभिन्न अंगो के लोग जिनमे से शायद कुछ धरने प्रदर्शन में भी शामिल होंगे। इस मुद्दे का बहुत महीन विश्लेषण करने की जरूरत है। इसके पहले मै विश्लेषण करू इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि अधिकतर प्रदर्शनकारी जो इंडिया गेट पर शामिल थें दुष्कर्म के आरोपियों को मौत की सजा के पक्षधर थें। जैसा कि इन विरोध प्रदर्शन के साथ होता है कुछ फेमिनिस्ट स्पॉन्सर्ड संस्थाएं और कुछ सेकुलर लोग भी अपने हित के लिए इन विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए। जहाँ तक आम आदमी के गुस्से की बात है वो समझ में आता है मगर इन जैसे लोगो का विरोध प्रदर्शन या तो सत्ता के लिए होता है या सिर्फ विदेशी संस्थानों से धन उगाहने के खातिर होता है। ऐसे लोग आपको मानवाधिकार की बाते इन अवसरों पर ज्यादा करते दिख जायेंगे।

सो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ इन दुष्कर्म के आरोपियों को मौत का मांग करती इन तथाकथित प्रदर्शनकारियों पर जो दबाव बना रहे है कि ऐसे कृत्यों के लिए मौत की सजा दी जाए। इस बहस में मै नहीं पड़ना चाहूँगा कि मौत की सजा कितनी जायज होगी पर ये जरूर याद दिलाना  चाहूँगा कि अभी कुछ दिनों पहले जब अजमल कसाब को मौत की सजा दी गयी थी तो हमारे  धर्मनिरपेक्ष समाचार पत्र  द हिन्दू ने हमेशा की तरह एमनेस्टी इंटरनेशनल के माध्यम से विधवा विलाप करते हुए ये जोर दे के कहा था कि मौत की सजा के प्रावधान को खत्म कर देना चाहिए। तो फिर किस मुंह से ये संस्थाएं, काफिला जैसी बकवास पत्रिकाएँ मौत की सजा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वकालत कर रही है? ये दोहरा मापदंड क्यों? ये जानना भी जरूरी हो जाता है कि इस तरह प्रदर्शन में शामिल होने वाले अक्सर वो लोग होते है जिन्होंने सिस्टम को बदलने के लिए कोई ख़ास कवायद नहीं की होती  है। इस सेलेक्टिव चेतना पर घोर आश्चर्य भी होता है और क्षोभ भी होता है। मोहल्ले में बिजली चले जाने, तार टूट जाने पर सबसे ज्यादा शोर मचाने वाले वो लोग होते है जो पावर हाउस में कंप्लेंट दर्ज कराने में भी अपनी  तौहीन समझते है। करप्शन पर सबसे ज्यादा वजनदार लेक्चर वो देते है जिनको इस बात से कोई फर्क  नहीं पड़ता कि उनका जनप्रतिनिधि कैसा है और ये कि उनके वोट न देने से गलत लोग सिस्टम में आ रहे है। इसका नतीजा ये होता है कि कोई जातिवाद के जरिये सत्ता में आकर कुकर्म करता  है तो कोई मुस्लिम कार्ड खेलकर तो कोई  बेरोज़गारी भत्ता/लैपटाप जैसी वाहियात स्कीम से सत्ता सुख का जुगाड़ कर लेता है।

क्यों दुष्कर्म जैसे अपराध या अन्य अपराध चरम पर है उसका एक सबसे अहम कारण है कि हमारे सिस्टम में सही चीज़ के लिए या सही लोगो के लिए कोई जगह नहीं। और न्याय भी इतनी देर से मिलता है कि उसकी कोई अहमियत नहीं रह जाती। ये सिस्टम किस तरह से काम करता है ये देखिये। किसी एक समारोह में एक सज्जन व्यक्ति नें अपनी आपबीती बयान करते हुए ये बताया कि सड़क हादसे मे मृत व्यक्ति के बारे में जब सूचना देने थाने पहुचे तो दरोगाजी ने उसे मर्डर के चार्ज की धमकी देते हुए थाने पे ही रोक  लिया। बाद में वो खुद पच्चीस हज़ार की रकम को देकर किसी  तरह थाने से सकुशल घर पहुच सके। खुद इसी प्रदर्शन के दौरान हुई पुलिस कांस्टेबल की मौत का मामला देखिये।  जहा एक ओर प्रत्यक्षदर्शी, जो समाचार पत्रों  के अनुसार पत्रकारिता का छात्र है, के अनुसार मौत सहज है, पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट के अनुसार गहरे धारदार चोट से हुई है। इस मौत का जिम्मेदार कौन है और कौन इसकी भरपाई करेगा? सिर्फ सख्त क़ानूनी प्रावधान बना देने भर से क्या होगा जब आपका सिस्टम इतना सड़ गल चूका है कि किसी भी कानून के दुरूपयोग के सम्भावनाएं असीमित हो जाती है और सदुपयोग सीमित हो जाता है। दहेज़ हत्या के प्रावधान और एस सी एस टी एक्ट का हश्र देखिये। अपने गाँव में जो मिर्ज़ापुर जिले में पड़ता है मेरे खेत पर कुछ अनुसूचित जाति के लोगो ने अवैध रूप से झोपड़ी बनाकर कुछ हिस्से पे काबिज हो गए है। सीधी कार्यवाही से इनको हटवा सकता था मगर मुझे पता था ये एक्ट के तहत दांव खेल सकते है इसलिए न्यायालय की लम्बी प्रक्रिया के तहत मंद गति से कार्यवाही चल रही है।   

इसलिए विरोध प्रदर्शन जो “हैंग द रेपिस्ट्स” तक ही केन्द्रित हो उठा है वो खतरनाक है। इस सीमित सोच से बात नहीं बनेगी जब तक सिस्टम का हर अंग सुचारू रूप से काम न करे।  आप देखिये जिस वक्त दुष्कर्म की शिकार इस लड़की के लिए उत्तेजित भीड़  इंडिया गेट पर तख्ती, बैनर, मोमबत्ती के सहारे अपनी बात कह  रही थी ठीक उसी वक्त उत्तर  प्रदेश में  एक अभागी माँ  सामूहिक दुष्कर्म की शिकार अपनी बेटी, जिसने आत्मदाह कर लिया इस घटना के बाद , न्याय के लिए भटक रही है , धरने पर बैठी है जिलाधिकारी कार्यालय पर कोई  सुनवाई नहीं, उल्टा पुलिस ने मनगढ़ंत कहानी रच डाली है। दूसरा आप सेलेक्टिव चेतना से ऊपर उठें। क्या बात है कि गरीब  किसान क़र्ज़ में डूबकर आत्मदाह कर लेते है पर उसके लिए कभी जनाक्रोश नहीं उभरता बल्कि सरकार  खरीद मूल्य और कम कर देती है, उसके द्वारा उगाये अन्न सड़ कर गल जाए इसकी व्यवस्था सुनिश्चित कर देती है। अफज़ल गुरु की फांसी टलती जा रही है  जबकि इस प्रकरण से जुड़े शहीद परिवार के लोग संसद के आगे आत्मदाह तक कर डाल रहे है पर हम खामोश रहते है। व्यवस्था को जड़ से हटाने के लिए तब अन्ना, रामदेव या अरविन्द केजरीवाल जैसो को सामने आना पड़ता है, जिनको मिटाने और तोड़ने की हर साज़िश सरकार कर डालती है पर समाज का हमारा एक बड़ा वर्ग निश्चिंत होकर बीवी बच्चो के लिए मगन होकर अथाह पैसा सही गलत तरीके से बना रहा होता है। तब रोष या आक्रोश नहीं उभरता है। लिहाज़ा इस सामूहिक दुष्कर्म का शिकार इस लड़की के लिए उभरे आक्रोश पर ख़ुशी तो है पर  इसकी अपूर्णता का भान होते ही ख़ुशी काफूर हो जाती है।

ये बात हमको समझ में आना चाहिए कि जहा सिस्टम इतना दोषपूर्ण हो चला है कि जब तक हम सच और झूठ का फैसला कर पाते है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है वहा पर सख्त कानून बना देने भर से उलझने और समस्याएं और बढ़ सकती है। हम आज जिस समाज में रहते है वहा  दुष्कर्म भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, स्त्रिया भी उतनी ही अय्याश बन कर उभरी है जितने की पुरुष और उन्हें अपने मकसद के लिए नीचे गिरने में कोई संकोच नहीं है लिहाज़ा अगर आप सख्त कानून बनाते है बिना सिस्टम में उतने ही बारीक सुधार किये तो ये तय है कि इस तरह के कानून से समाज में बिखराव और बढेगा। इससे बेहतर तरीका ये रहेगा कि उपभोक्तावादी संस्कृति में स्त्री पुरुष अपने आचरण को लेकर सजग रहे बजाय हर बदलाव के लिए कानून की बैसाखी का सहारा लेने के लिए।  इंडिया गेट पर प्रदर्शन हर्ष तो देता है पर इस बात का भान तो सदा बना रहता कि स्वार्थी तत्त्व इनको अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करते है जिससे बजाय कोई अच्छा हित सधने से स्त्री-पुरुष के बीच वैमनस्य की खाई और चौड़ी हो जाती है। अगर हम इनसे ऊपर उठकर, इनसे बच कर अपनी लड़ाई लड़ सके तो समाज का सचमुच में भला हो सकेगा नहीं तो ऐसे आक्रोश स्वार्थी तत्त्वों का सिर्फ हित साधने का साधन भर बन के रह जाते है। सड़ी गली सेक्युलर संस्थाएं ऐसे ही आक्रोश को सामाज विरोधी शक्ल दे देते है। सो गुस्सा सार्थक बदलाव के लिए करे ना कि गलत लोगो का  हित साधने के लिए करे। अंत में  लोगो का आक्रोश क्या रंग लाता है  ये तो वक्त बतायेगा पर उम्मीद है कि सिंगापुर के हास्पिटल में भर्ती ये बहादुर लड़की जल्द ही स्वस्थ होकर बाहर फिर उन्मुक्त होकर विचरण कर सकेगी।  

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Vividh Bharati Should Now Be Either Known As Rafi Bharati or Vigyapan Bharati!

Prasar Bharati: Dictated By Propaganda!

Prasar Bharati: Dictated By Propaganda!


Sometimes you avoid taking note of an important development, treating it to be a passing affair-something born out of coincidence. However, that’s not always the case. The hindsight, sooner or later, proves beyond doubt that this development was part of some prevailing well-executed pattern. The people involved in projecting such pattern try their level best to make you feel as if all is taking place naturally but is it possible for a pregnant lady to hide her pregnancy status for long? There comes a point when you cannot lie any further.   

 
I am great fan of Rafi but the way his songs are being played in atrocious manner, on the Vividh Bharati, really makes me sad. The Vividh Bharati has stooped down to all time low dirty manipulations, being dictated by propaganda, sponsored by people behind the curtain. The songs of Rafi are being virtually pushed down your throat 24/7. It appears Vividh Bharati is not in mood to tolerate even those listeners, who have somehow managed to boast of their affiliation with this great institution of yesteryear. It’s no secret that majority of listeners have already given way to other channels, being disappointed over its functioning style. Anyway, anyone aware of how the bureaucratic mind functions in this nation, are not at all surprised over the falling standards.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      
Not a long time ago, a beautiful female voice, probably from Indore, registered her protest in a strong way in one of the programmes based on listener’s choice. She said: ” You people ( the announcers) are constantly playing cheap numbers, all in the name of listener’s choice, but it appears to me that there’s more than meets the eye. It’s simply not possible that these tasteless numbers have replaced haunting melodies of yesteryear without shrewd maneuvering.” I was really inspired by her bold outburst but   constraints of time prevented me from having a take on the whole issue in a strong way. Given the unholy nexus, which prevails inside the corridors of the Vividh Bharati, a strong protest has become need of the hour. That’s because silence at this moment would appear criminal. How can any conscious listener keep quiet, over this drama, taking place inside the studios of Vividh Bharati?  

Earlier it appeared that royalty might be the reason why songs of Rafi were being played in this mindless fashion. However, it’s just the tip of the iceberg. At this point of time, when India stands on the threshold of embracing some bold changes, the old minds refuse to part ways with mediocre means, which keep intact their lust for power. Remember, when governments change, the premier government bodies also shift their loyalties. There is a major overhaul within all government bodies, and key positions get shifted to people in tune with the agenda of government. The same thing has taken place inside Vividh Bharati as well.  It’s not presenting programmes: It’s sponsoring propaganda.What else could one assume after presentation of Baba Azmi- Shabana Azmi’s interview on the eve of Bhaiyya Dooj -a Hindu festival dedicated to celebration of bonding that exists between sisters and brothers? 

If these dirty tricks were not enough, it now gave way to subtle form of marketing. Sample this: The interview of Aamir Khan was presented at a time when Aamir Khan’s movie was scheduled to be released the very next day. The interview which was in two parts, ended on November 29, 2012 and the movie Talash got released on November 30, 2012. Is that’s the way a government body should function in this nation, which boasts of secular credentials?
 
The job of government institution is to function in impartial manner, without offering undue advantage to any particular group in name of religion etc. After all, if the approach gets biased, how are we supposed to get real information? The Vividh Bharati is one of the few institutions, which enjoy close rapport with people living in remote areas of India, and so it’s an ideal medium to apprise people about key issues in honest manner, so that they can have real picture- the ultimate truth. But now I have every reason to believe that it’s now no longer reliable. More so, in the wake of Rafi madness, which has led to marginalization of all other geniuses in the world of movie and music. It has gagged the voice of other beautiful singers.
 
In fact, its foreign counterpart, Radio Ceylon, is performing superbly. Not only it’s sincerely devoted to the cause of music but also it’s picture of perfection in presentation of programmes. It’s not insensitive in suggesting conscious listeners that minting money is the first choice of commercial services! A senior journalist from my city, Allahabad, is pretty shocked about Vividh Bharati’s new-found love for lowering the volume of song and subsequent announcement of details, the moment a song gets played. Above all, he is unhappy with the current lot of announcers, who have little patience for presentation of necessary details. Unfortunately, his demand to make the presentation of details, for one more time, at the end of each song, has fallen on deaf ears. 

Anyway, if one is unsure about the credibility of facts presented in this article, why not tune in to Vividh Bharati and check out the facts for yourself? And, I am sure listeners would not fail to notice insipid Rafi numbers, vulgar modern numbers, programme carved to  sell a product, or if all these three are missing, then be prepared to be tortured by a repeat telecast! I think it’s time for the Vividh Bharati to have a new name: Vigyapan Bharati or Rafi Bharati! Anyway, it’s time for sincere lovers of Vividh Bharati to find solace in singing of Begum Akhtar, crooning straight from the heart “Aye Mohabbat Tere Anzam Pe Rona Aaya”.

Reference: 

Vigyapan= Commercial

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प्रसार भारती विविध भारती का नाम बदल कर रफ़ी भारती या विज्ञापन भारती क्यों नहीं कर देती?

प्रसार भारती विविध भारती का नाम बदल कर रफ़ी भारती या विज्ञापन भारती क्यों नहीं कर देती?

प्रसार भारती विविध भारती का नाम बदल कर रफ़ी भारती या विज्ञापन भारती क्यों नहीं कर देती?


कभी कभी आप चीजों को आप ये कह के गौर नहीं करते कि चलिए हो सकता है ये महज एक इत्तेफाक हो। लेकिन आप ध्यान दे तो आप पायेंगे कि सब में एक  वीभत्स पैटर्न शामिल है। कोशिश लोगो की जो इस पैटर्न को परदे के पीछे रह के चला रहे है ये यही होती है कि आपको खबर न लगने पाए मगर एक प्रेग्नेंट औरत कब तक ये झूठ बोल सकती है कि डिलीवरी जैसी कोई बात नहीं। मै खुद रफ़ी के गीतों को बहुत पसंद करता हूँ पर ये रफ़ी के नाम पर जो तमाशा विविध  भारती पर हो रहा है वो दुखद है। हद हो गयी है कि किसी न किसी बहाने रफ़ी के गीतों को प्रोग्राम कोई हो आप पे थोप दिया जा रहा है। शायद विविध भारती अपने बचे खुचे श्रोताओ को भी अपने चैनल से भगाना  चाहता है। सरकारी दिमाग ऐसे ही काम करते है।

बहुत पहले किसी महिला श्रोता ने सुंदर आवाज़ में पर बुलंद तरीके से अपनी शिकायत एक फरमायशी प्रोग्राम में रखी थी जो शायद इंदौर से थी  कि “विविध भारती पे आप जो ये लगातार नए गीत ये कह के बजा रहे कि लोगो ने आपसे कहे है ये सब मुझे सुनियोजित लगता है  क्योकि इतने बड़े पैमाने पे लगातार सिर्फ इसी टाइप के फूहड़ नए गीतों का बार बार बजना और अच्छे पुराने गीतों का बिल्कुल ही गायब हो जाना ये सिर्फ लोग ऐसा चाहते है ये ही एक वजह नहीं हो सकती।”  उस की बातो से मै पूरी तरह से इत्तेफाक रखता था क्योकि मुझे भी ऐसा एहसास हो चला  था। पर समयाभाव के कारण कुछ लिख नहीं पाया और बात आई गयी हो गयी। लेकिन अब लगता है कि विविध भारती ने सभ्य हदों को पार कर दिया है सो ख़ामोशी अब क्रिमिनल हो जायेगी।

पहले लगता था कि रायल्टी एक वजह हो सकती है कि सिर्फ रफ़ी ही रफ़ी विविध भारती के फलक पर उभरे लेकिन बात इससे भी आगे की है। इस वक्त संस्था में वही गणित काम कर रहा है कि जब सरकारे बदलती है तो आपके अपने ख़ास आदमी महत्त्वपूर्ण संस्थानों पर काबिज हो जाते है फिर कोई काम नहीं होता है सिर्फ वही बाते होती है जो प्रोपगंडा चाहता है। इस वक्त विविध भारती पर यही हो रहा है। और विविध भारती पर मार्केटिंग का भी भूत शामिल हो गया है उसकी एक झलक आप को  इस उदहारण से मिल सकती है कि आमिर खान का इंटरव्यू प्रसारित होता है “तलाश” के रिलीज़ के वक्त। क्या सरकारी संस्थाएं ऐसे काम  करती है? लेकिन विविध भारती भी इसी गंदे समीकरणों में शामिल गया ये बहुत दुखद है। क्योकि आम जनता के पास ये करीब था तो उनको सच बताने की जिम्मेदारी बनती थी या अच्छा मनोरंजन जिसमे सभी प्रतिभाशाली गीतकारो संगीतकारों, गायकों का जिक्र सामान रूप से होता पर रफ़ी नाम का ढोल पीटने का ठेका विविध भारती ने ऐसा ले लिया है कि कोई और आवाज़ उभर ही नहीं रही है। 

इससें कही अच्छा काम रेडियो सीलोन पर होता है। वे अपने देश के नहीं होते हुएं भी संगीत के प्रति ईमानदार  है, संवेदनशील है। कम सुने हुए गुणी संगीतकारों को हमेशा उभारते है उनका उल्लेख  करके, उनके अच्छे कामो का उल्लेख करके समय से। विविध भारती पर ठीक इसका उल्टा हो रहा है। कमर्शियल सर्विसेस के नाम पर अच्छे गीतों को काट पीट कर विज्ञापन बजाये जाते है। किसी को लेख की प्रमाणिकता पर संदेह हो तो विविध भारती चैनल ट्युन करके के देख ले अगर वाहियात नए गीत नहीं  बज रहे होंगे तो निश्चित ही रफ़ी का कोई गीत या विज्ञापन बज रहा होगा, मार्केटिंग चल रही होगी, कोई  पुराना प्रोग्राम रिपीट हो रहा होगा। तो क्यों नहीं प्रसार भारती विविध भारती का नाम विज्ञापन भारती या रफ़ी भारती रख देती है? विविध भारती से अपने प्रेम को लेकर बेगम अख्तर की यही  ग़ज़ल गूँज रही है कि “ए मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया”. 
 

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अटेन्शनवा: भाई किसी को खालिस सोने के बिस्किट चाहिए तो तिवारी सर से मिले अर्जेन्टी (व्यंग्य लेख )

ये सोने के बिस्कुट मै नहीं हज़म कर पाता हूँ :P

ये सोने के बिस्कुट मै नहीं हज़म कर पाता हूँ :P

मेरे कुछ मित्र भी गजब ही है। बैठे बिठाये लिखने का मसाला दे जाते है। ये तिवारी जी, लखनऊ वाले, मेरा सौभाग्य कहिये या मेरा दुर्भाग्य कि मेरे बचपन के परम मित्रो से है। तब से लेकर आज तक मुझसे गठबंधन किया बैठे है। अब बचपन में तो अच्छे बुरे की पहचान तो होती नहीं वर्ना इस तरह के खतरनाक मित्रो को मै जरा भी लिफ्ट नहीं देता हूँ। खैर ये ‘सड़ी मूँगफली स्कूल’ के काबिल हस्ताक्षर थें। इस स्कूल का असली नाम पाठको को नहीं बताऊंगा क्योकि जिनको समझना है उनके लिए इतना इशारा काफी है। कभी किताब लिखने का मौका मिला तो इस स्कूल के सभी नमूनों के बारे में विस्तार से लिखूंगा लेकिन ये इसी स्कूल की देन है कि खुली आँखों से सोना मुझे आ गया। सुबह सुबह इतने उबाऊ पीरियड में कौन इतना उच्च चेतना संपन्न था कि वो पूरे होशो हवास में रह पाता। कम से कम मै तो नहीं था। और निगम, जो पूरी सर्दी में शायद  तीन चार बार नहाने को महान कार्य समझते थें, तो बिलकुल नहीं था क्योकि उसको तो हमी सब उठाकर स्कूल लाते थें आँखों में नींद लिए। यहाँ भी कोई गांधी थें जिनके महाऊबाऊ विश्वशान्ति वाले भाषण सुबह सुबह असेंबली लाइन में सबसे आगे खड़ा होकर सुनने के कारण कुछ कुछ “अटेंशन डिफिसिट” सा हो जाता था, कही शान्ति आये ना आये पर मेरा मन जरूर अशांत हो जाता था। लगता था कि काश इस युग में भी धरती फट जाए सोचते ही मान तो कुछ देर के लिए वहा  रेस्ट कर लूं। पर किसी शापित देव सा ना सुनने लायक भी सुनने को मजबूर था। 

तो इसी तिवारी साहब ने, मेरे तमाम अशुभ ग्रहों के एक जगह आ जाने के कारण प्रतीत तो यही होता है, मुझे फोनवा करके, आवाज बदल के खालिस भयंकर डान की माफिक एक ढोंगी पाखंडी की तरह राम राम कहने के बाद मुझे सूचित किया कि  “आपके सोने के बिस्कुट आ गए है। बताये कहा डिलिवेरी करनी है। जाहिर सी बात है इस दुष्ट आत्मा से, भाई मै कहा जानता था कि तब तिवारी आवाज बदल कर बोल रहे है गोपनीय नंबर से, पूछना पड़ा कि आप बोल कौन रहे है। उधर से जवाब आया कि अरे लीजिये “आप अपने एजेंटो को नहीं पहचानते”। मुझे फिर कहना पड़ा कि आप बताते है कि कौन बोल रहे है कि मै बंद कर दू नंबर। तब उन्होंने राज खोला अरे मै तिवारी बोल रहा हूं पहचाना नहीं। एक नया नंबर मिल गया था जिसमे फ्री टॉक टाइम था तो सोचा इसका इस्तेमाल कर लूं। अब गरिया तो सकता नहीं था क्योकि वो मेरी आदत नहीं और दूसरा वो इस बोली भाषा में हिट था। वैसे ये कई धंधे आजमा चुके है सो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ लगता है इनके फील्ड में रिसेशन आ जाने क्या पता ससुरा गोल्ड बिस्कुट का डीलर बन गया हो । 

वो बहुत खुश था शोले के गब्बर की तरह मुझको डरा समझ के। लेकिन मै जिस वजह से परेशान था उसकी वजह वो नहीं थी जो तिवारी साहब समझ  रहे थें। लेखनी की वजह से मै अपने नंबर सहित काफ़ी सर्कल्स में पहचाना हुआ हूँ जिसमे खाड़ी देशो के मित्र, अपना प्रिय पडोसी पाकिस्तान भी है, के लोग शामिल है, और इसके अलावा इंटेलिजेंस सर्विसेज के लोग भी है। इन साहब की नादान हरकत, जो क़ानूनी परिभाषा के तहत जुर्म की श्रेणी में आता है पर  इनकी बोल्ड आत्मा इस नाजुक आत्मा की  इस बात को मानने से इंकार करती थी, किसी विपत्ति को जन्म दे सकती थी। खैर इनको मुझे समझाना पड़ा कि टेक्नोलाजी के इस युग में जब भाई लोग मर्द हो के भी औरत की आवाज़ में बतिया सकते है, फर्जी स्टिंग आपरेशन होते है, मुझे इस बात की परवाह तो करनी पड़ेगी न कि उधर तिवारी ही बोल रहे थें बिना अपने किसी चमचों के। चमचा का मतलब यहाँ पे फटीचर मीडिया के लोग जो आवाज़ रिकार्ड करके खबरे बनाते है या चमचा माने वो जो फिल्मे परदे में एक मेन विलेन के पीछे पीछे चलते है। खैर मेरी बात की गंभीरता का वो आशय समझ गए पर ये बताने से नहीं चूके कि हाई प्रोफाइल नम्बरों से भी वो ऐसा ही कर सकते है और कोई उनका कुछ नहीं कर सकता या ऐसा करने से कुछ होता नहीं है। 

हां आप सही कह रहे है कि कुछ नहीं होता मगर इन्ही अफवाहों के चलते सिक्योरिटी एजेंसीज की नींद हराम हो जाती है और असली वारदात के समय ये बेचारे कुछ नहीं कर पाते, महत्त्वपूर्ण ट्रेने ऐसी ही बातो के चलते समय से चल नहीं पाती, दंगो के वक्त इस तरह की बाते शोलो को और भड़काती है। अरे साहब कुछ नहीं होता है  तो पीएमओ आफिस में डीलिंग कर लेते तो क्या पता तुम्हारे सोने के बिस्कुट इस देश की दरिद्रता कुछ कम कर देते! तिवारी जी हम जैसे मुद्रा विहीन के यहाँ तो तुम्हारी डीलिंग फ्लाप हो गयी लेकिन पीएमओ आफिस से भयंकर लोग तुम्हे उठाकर तो जरूर ही ले जाते, तुम्हारे  सोने के बिस्कुट बिकते या न बिकते। नालायक कही का ये तिवारी कभी सुधर नहीं सकता। एक बचपन के मित्र की कायदे से मदद करने के बजाय लगा उसे सोने के बिस्किट खिलाने। पता नहीं तुम सोने के बिस्कुट बेचने की हिम्मत रखते हो कि नहीं लेकिन इतनी औकात तो रखते ही हो कि कम से एक मिनी ट्रक बिस्किट ही बच्चों के लिए मेरे घर भेजवा देते। कुछ मै खाता कुछ मोहल्ले के बच्चो को बटवा देता। उनकी दुआओं से तुम्हारी ज़िन्दगी संवर जाती। लेकिन आज जब एक ब्राह्मण ही दूसरे ब्राह्मण की धोती खीचने में लगा हुआ है तो तुम कैसे अपवाद बन जाते। लगे मुझ जैसे फक्कड़ आत्मा को ही सोने के बिस्कुट बेचने जो सदा से ही यही गीत गाता  रहा हो कि “कोई सोने के दिलवाला, कोई चाँदी के दिलवाला, शीशे का है मतवाले तेरा दिल, महफ़िल तेरी ये नहीं, दीवाने कही चल”

तिवारी के बारे में मेरे गाँव की पगली लड़की, और इन तिवारी साहब को इस लड़की की बात बुरी नहीं लगनी चाहिए क्योकि वो भी तिवारी ही है, बिलकुल सही कहती थी कि जब “सौ पागल मरते है तो एक तिवारी का जन्म होता है”। पता नहीं कितनी सच थी उसकी बात लेकिन तिवारी लोगो में पायी जाने वाली अराजकता को देखता हूँ तो मन इस  बात पे आकर टिक जाता है। खैर इन तिवारी साहब का निगम की ही तरह कितना बढ़िया जजमेंट सेंस है ये बताना जरूरी हो जाता है। ये बताना भी जरूरी हो जाता है कि इनको कक्षा चार से ये विलक्षण शक्ति प्राप्त थी कि कौन से लड़की किस लड़के से ज्यादा बतियाती थी। और ये न्यूज़ नमक मिर्च लगा के सब तक सर्कुलेट कर देते थें। मेरे क्लास की लड़की अगर मेरे मोहल्ले में रहती थी तो इनके पेट में दर्द जरूर होता  था। और निगम का भी होगा ये तो तय था। इन दोनों की जजमेंट शक्ति कितनी उच्च थी। अभी पता चल जाएगा। खैर मै जब अपने गाँव में जाता था तो तिवारी सिर्फ यही सूंघ पाते थें कि जैसे मै  इसी खतरनाक पगली लड़की से,जो तिवारी वर्ग में पाए जाने वाली सब महान शक्तियों से लैस थी, से बतियाने जाता था। ये तो कभी सूंघ नहीं सकते थे कि बरसात के कीचड भरे रास्ते,  भयंकर ठण्ड से भरे दिन और राते, भीषण गर्मी में बिना किसी पंखे वाले कमरे में, किसी तरह जो भी मिला वो खाकर अपने खेतो में क्या हो रहा है देखता था। हा ये उन्होंने अनुमान लगा लिया कि गंगा नदी के तट पर स्विट्ज़रलैंड की हसीन वादियों में जैसे लोग टहलते है, वैसे ही मै लेकर उसको विचरण करता हूँगा। अब लखनऊ की चमकती रोमान्टिक गलियों में पले  बढे, नाम मात्र रूप से गाँव के सामाजिक परिवेश को जानते हुए- कभी  असल ब्राह्मण बहुल्य गाँव में तो कभी रहे ना होंगे-को इससे बेहतर क्या समझ में आ सकता था। मुझे इनकी समझ से कुछ लेना देना नहीं पर तिवारी साहब ये आप जान ले कि गाँव में चाहे वो गँगा के तट हो या खेत सुबह शाम नित्य कर्म करने वाले लोगो से पटे रहते है तो कोई कैसे किसी को इस तरह रोमान्टिक तरीके से घुमा सकता  है? मै तो गाड़ी भी ड्राइव नहीं कर पता कि चल कही दूर निकल जाए ऐसा कुछ भी हो सकता। लेकिन इनको क्या और निगम को क्या। सोचने लगे तो यही सब सोच डाला। और सुनिए आप मेरे गाँव में आइये तो ये ट्राई भी मत करियेगा, हा किसी और के बारे में आप कुछ भी सोच ले ये अलग बात है, वर्ना गाँव के लोग कूट काट  डालेंगे। गाँव वाले न शहर वालो को ठीक नज़र से देखते है और शहर वाले तो शहरीपने के चलते गाँव वालो को शुरू से ही गंवार समझते रहे है।

और निगम साहब को उस उम्र में जिसमे प्यार की भावना एक नैसर्गिक प्रक्रिया होती है ये साहब तब भी भयंकर फिल्मी अंदाज़ में मुझे समझाते थे “प्यार वो करते है जिनकी जागीर होती है”। वैसे उसकी बात में कडुवी सच्चाई थी ये मै मानता हूँ पर सच नहीं थी सोचने पर। बिल्कुल सच नहीं थी। क्योकि निगम जी जागीर वाले सब कुछ कर सकते है प्रेम नहीं कर सकते। ये ज्यादा से ज्यादा इस लड़की के साथ टहलेंगे, फिर कल किसी दूसरे के साथ टहलेंगे और अंत में आपको पता चलेगा इन्होने माता पिता का सम्मान करते हुएं रीति रिवाजों के साथ किसी जागीरवाली लड़की के साथ शादी कर ली। अपवाद हो कोई वो अलग बात है पर ज्यादातर तक जागीर वालो का  इतिहास ऐसा ही रहता है प्रेम के नाम पर। वैसे निगम तिवारी से बतिया लेना क्योकि मुझसे कह रह था कि “अलीगंज सेक्टर डी”  से कपूरथला काम्प्लेक्स की दूरी कोई लन्दन से पेरिस तक जितनी नहीं थी कि जो आके अपने बचपन के मित्र का हाल चाल भी न ले सके। ये कायस्थ वर्ग के चरित्र की निशानी है कि अपने सीमित स्वार्थ से ज्यादा दूर तक नहीं सोच पाते। ये अलग बात है बाभनो से पटती भी बहुत है जो इस सोच के ठीक विपरीत होते है। 

वैसे बात सोने के बिस्किट से शुरू हुई थी तो समापन भी ऐसे ही होगा। भाई तिवारी अमीनाबाद चले जाना वहा अपने सड़ी मूंगफली स्कूल के ही एक परम मित्र रहते है अपने ही बचपन के जिनसे जब मै बातचीत करने का इच्छुक होता हूँ तो इस भय से नहीं करता हूँ कि कोई फायदा नहीं क्योकि आपने फ़ोन किया नहीं कि उधर से आवाज़ आएगी कि अरे वो तो मजलिस में गए है। बहुत अच्छा उसका बिज़नस सेन्स है। वो जरूर बिकवा देगा तुम्हारे बिस्कुट। नहीं तो इसी स्कूल के एक सज्जन खुर्रम नगर में रहते है जो फेसबुक मित्रो मे एक बेहतर क्लासिक पोज़ में मौजूद है चश्मे सहित। वहा  चले जाना तुम्हारा काम हो जाएगा। ये लोग बहुत काबिल है। मेरे जैसे साधन विहीन लेखक वर्ग के जरिये तुम अपने सोने के बिस्किट कभी नहीं बेच पाओंगे। अब ये भी धंधा चालु कर दिया है तो कम से कम धंधे में तो थोडा से बेहतर जजमेंट सेंस रखो कि कहा तुम्हारा माल बेहतर बिक सकता है। ऐसे तो तुम दिवालिया हो जाओगे। आया समझ में। और मुझसे मिलने आना तो कम से कम पारले जी वाला बिस्कुट लेते आना। बचपन से इसी बिस्कुट की लत जो लगी है। सोने के बिस्कुट हज़म  करने की लत मुझे कभी नहीं पड़ी और न पड़ेगी। और निगम तुम्हारे लिए तो यही लाइन उपयुक्त रहेगी: सोना नहीं, चांदी नहीं, अरे यार तो मिला जरा प्यार कर ले।

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